Wednesday, 23 October 2013

पूंजी का संरचनात्मक संकट और शिक्षा : यूएस परिघटना-पहली क़िस्त

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जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर
 - जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर
अनुवादः रोहित, मोहन और सुनील

(जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर मंथली रिव्यू के संपादक हैं। वे, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑरेगोन में समाजशास्त्र के प्रवक्ता और ‘द ग्रेट फाइनेंसियल क्राइसिस’(फ्रैड मैग्डोफ़ के साथ) के लेखक भी हैं। उक्त आलेख 11अप्रैल 2011 को फ्रैडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंटा कैटेरिना, फ्लोरिआनोपोलिस, ब्राजील में शिक्षा एवं मार्क्सवाद पर पांचवे ब्राजीलियन सम्मेलन (ईबीईएम) में उनके द्वारा दिए गए आधार वक्तव्य का विस्तार है। यह आलेख यहाँ पढ़ा जाना इसलिए भी मौंजू है कि आज का भारत भी बिलकुल उन्हीं प्रवृतियों के शुरूआती दौर में है जिनसे अमेरिका गुजरा है। सार्वजनिक/सरकारी शिक्षा प्रणाली तकरीबन बेकार घोषित की जा चुकी है. तमाम फाउन्डेशनों, एनजीओज ने यहाँ सुनहरा भविष्य देख भारत की 'शिक्षा व्यवस्था' को 'पटरी' पर लाने के लिए 'कमर कस' ली है. वे गाँव-गाँव, शहर-शहर में फ़ैल कर शिक्षा की नई अलख जगाने के उन्माद में हैं. इसी दौर में प्राइवेट प्लेयर्स ने स्कूलों और कॉलेजों का ऐसा जाल बिछाया है कि तकरीबन सारा मध्य वर्ग/निम्न मध्य वर्ग अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए इस जाल में बुरी तरह फंस गया है. फ़ॉस्टर ने अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था में ठीक इसी तरह की प्रवृत्तियों की तफसील से पड़ताल की है. अमेरिका में यह प्रव्रत्तियां उस चरम पर पहुँच गईं हैं जहाँ से इस समस्या की विकरालता साफ़ समझ आती है. भारत में अभी इस आलेख को पढ़ना, सचेत हो जाने के लिए जरूरी होगा. इस लम्बे आलेख को हम ४ किस्तों में यहाँ देंगे... ) 

http://www.alternet.org/files/styles/story_image/public/story_images/privatization.jpgसंयुक्त राज्य और विश्व में अन्य कई जगहों में भी सार्वजनिक शिक्षा में सुधार के लिए चले रूढि़वादी आंदोलनों का प्रचलित तौर पर मानना है कि सार्वजनिक शिक्षा आपातकलीन स्थिति में है और अपनी आंतरिक विफलताओं के चलते इसके पुर्नगठन की जरूरत है। इसके विपरीत मेरा कहना है कि सार्वजनिक शिक्षा में ह्रास उन बाहरी विरोधाभासों के चलते हैं जो पूंजीवादी समाज में स्कूली शिक्षा में अंतर्निहित हैं और हमारे समय में परिपक्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव और रूढि़वादी सुधार आंदोलनों के प्रभाव से ही बढ़ रहे हैं। जार्ज डब्लू बुश के नो चाइल्ड लेफ्ट बिहाइंड (एनबीसीएल) कानून में परिलक्षित छात्रों शिक्षकों और सार्वजनिक शिक्षण संस्थाओं का कार्पोरेट संचालित दमन अपने आप में स्कूलों की विफलता के रूप में उतना व्याख्यायित नहीं होता जितना कि पूंजीवादी व्यवस्था की बढ़ती हुई विफलताओं से, जो कि अपनी इस बड़ी समस्या का निदान सार्वजनिक षिक्षा के निजीकरण के रूप में देख रही है।
    

हम संरचनात्मक संकट के दौर में जी रहे हैं जो पूंजीवाद के एक चरण ‘वित्तीय पूंजी एकाधिकार’ के साथ जुड़ा है। इस चरण की विशेषता हैः (1) विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव (2) वित्तीयकरण की ओर नाटकीय रूख, उदाहरण के लिए आर्थिक विस्तार के लिए अटकलबाजियां (3) वैश्विक स्तर पर पूंजी का तेजी से संकेन्द्रण (और एकाधिकारिता).
विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अंतर्निहित विकास की धीमी गति का परिणाम यह है कि आज की आर्थिक दुनिया में पूरी तरह हावी विशाल निगम (जायंट कार्पोरेशंस) निवेश के लिए अपनी पारंपरिक जगहों के बाहर नए बाजारों को ढूंढने के लिए मजबूर हैं। जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था के निर्णायक तत्वों का अधिग्रहण और निजीकरण हो रहा है। नवउदारवादी पुनर्गठन एकाधिकारवादी वित्तीय पूंजी का राजनीतिक साझीदार है जिसमें राज्य तेजी से निजी हितों की बलि चढ़ रहा है।

इन परिस्थितियों में हमें इस बात पर मुश्किल से ही आश्चर्य होगा कि संयुक्त राज्य की सार्वजनिक शिक्षा को वित्तीय हलकों द्वारा एक अनछुए बाजार के तौर पर देखा जा रहा है या निजी शिक्षा उद्योग खरबों डालर के दुनिया भर के सार्वजनिक शिक्षा के बाजार को पूंजी संकेंद्रण के लिए और भी खोलने के लिए जोर दे रहा है।  क्योंकि शिक्षा कार्यबल के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिए नवउदारवादियों का इसमें  पुनर्गठन के लिए जोर बढ़ता जा रहा है।

सार्वजनिक शिक्षा में आपातकालीन स्थिति और इसके पुनर्गठन और निजीकरण की मांग को प्राथमिक तौर पर वर्तमान दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता के उत्पाद के रूप में देखा जाना चाहिए। मोटे तौर पर पूंजी का ढांचागत संकट, शिक्षा के लिए संघर्ष के रूप में परिलक्षित होता है जो कि वर्तमान व्यवस्था में आपवादिक नहीं है और इसमें अंतर्निहित देखा जा सकता है। परिणाम स्वरूप निहित स्वार्थों की लम्बी होड़ पैदा होती है जिसमें बाजार केंद्रित स्कूल व्यवस्था की स्थापना पर जोर दिया जाता है। प्रत्येक तरीके को इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है जिसमें नस्ल और वर्गों के अंतर्विरोध, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अस्थिरता भी शामिल हैं।  

पूंजीवादी शिक्षा का राजनीतिक अर्थशास्त्र

1970 के मध्य में अर्थशास्त्री सैम्युअल बावेल्स और हर्बर्ट जिंटिस ने अपनी बहुमूल्य रचना ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विश्लेषण के लिए एक उपयोगी राजनीतिक-आर्थिक ढांचा दिया। यद्यपि शुरूआत में वामपंथी हलकों में लोकप्रिय रही ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’, अत्यधिक आर्थिक निर्णयवादी होने और व्यवस्था से छात्रों एवं शिक्षा प्रदाताओं के जटिल सांस्कृतिक संबोधनों पर ध्यान न देने के कारण 1980 तक वामपंथियों की पसंद नहीं रही। अन्य वामपंथियों ने बावेल्स और जिंटिस के तर्क की अत्यधिक प्रकार्यवादी और विश्लेषण में अद्वंद्ववादी होने के कारण आलोचना की है।  हांलाकि मेरा मानना है कि ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में वो आधार मौजूद है जहां से पूंजीवादी शिक्षण के राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझा जा सकता है जैसा कि हमारे नवउदारवादी दौर में है।

बावेल्स और गिंटिस के अनुसार यदि पूंजीवाद के दबाव वाली शिक्षा को शक्तिशाली लोकतांत्रिक प्रतिरोध आंदोलनों द्वारा चुनौती नहीं दी गई तो इससे पूंजीपति वर्ग की अधिकारिता का विकास होगा जो कि उत्पादन और संकेंद्रण की आवश्यकताओं के अनुसार इसके साथ रहेगी। लेखकों का संबद्धता सिद्धांत ए जिसके अनुसार पूंजीवादी समाज शिक्षा के सामाजिक संबंध सामान्यतया उत्पादन के सामाजिक संबंधों से संवाद करते हैं, अपने आप में प्रामाणिक है। इसलिए शिक्षा सेवा उत्पादन के लिए है और उत्पादन व्यवस्था के श्रेणीबद्ध श्रमविभाजन को और ज्यादा बढ़ाती है। इस प्रकार पूंजीवादी समाज में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के दोनों प्रभावी उद्देश्यों- 1.उत्पादन के लिए श्रमिकों या श्रम शक्ति का निर्माण और 2.शिक्षा में शिक्षाकर्मियों की श्रमप्रक्रिया, को मूल रूप से वृहद अर्थव्यवस्था में उत्पादन संबंधों के अनुरूप ढाला जा रहा है।
   
इस दृष्टि से पूंजीवादी शिक्षण वैसी ही चेतना और व्यवहार विकसित करता है जो पूर्वस्थापित वर्ग और समूहों को ही पुनर्स्थापित करते हैं और इस तरह समग्र रूप में पूंजीवादी समाज में उत्पादन के सामाजिक संबंधों को मजबूती और वैधता मिलती है। श्रमजीवी और श्रमजीवी होने के लिए अभिशप्त वर्गों के विद्यार्थियों को नियमों के अनुसार व्यवहार करना सिखाया जाता है जबकि उच्चमध्यवर्ग या/और व्यावसायिक एवं प्रबंधकीय स्तर के लिए ही बने छात्रों को समाज के मूल्यों को आत्मसात करना सिखाया जाता है। (इन दोनों के बीच के लोगों को नियमों को मानने के साथ ही विश्वस्त होना भी सिखाया जाता है।)
  
प्रारंभिक एवं माध्यमिक स्तर पर शिक्षा कुछ ही हद तक वास्तविक कौशल विकास पर केंद्रित रहती है और भविष्य में रोजगार के लिए आवश्यक ज्ञान पर तो और भी कम, जो कि काम करते हुए ही या उत्तरमाध्यमिक शिक्षण (व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान और कॉलेजों) में प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार विद्यालय, शिक्षा के लिए कम जबकि व्यवहार संशोधन के लिए अधिक काम करते हैं ताकि बहुसंख्यक विद्यार्थियों को एकरस और मानकीकृत जीवन के लिए तैयार किया जा सके जिसमें अधिकांश आवश्यक रूप से अकुशल श्रमिक के रूप में रोजगार पाएंगे। दरअसल एकाधिकारी पूंजीवादी समाज के गिरे हुए कार्य वातावरण में अधिकांश रोजगार यहां तक कि स्नातक अर्हता वाले रोजगारों में भी औरपचारिक शिक्षा की कम ही आवश्यकता होती है।

संयुक्त राज्य में उच्चतम गुणवत्तायुक्त प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा सार्वजनिक विद्यालयों की जद से बाहर और बहुत कम संख्या वाले अतिसंभ्रांत निजी स्कूलों में ही प्राप्त हो सकती है। जो कि बहुत धनाड्य लोगों के बच्चों को ही समर्पित है और जिसका उद्देश्य शासक वर्ग को पैदा करना है। जैसे एनडोवर मैसाचुसेट्स में फिलिप्स ऐकेडमी, जहां जार्ज एच. डब्ल्यू. बुश और जार्ज डब्ल्यू. बुश दोनों ही पढ़े हैं, में एक साल की सिर्फ ट्यूशन फीस ही 32,000 डालर है। यहां प्रति 5 बच्चों में 1 शिक्षक है और एक संपूर्ण पाठ्यक्रम के साथ 73 प्रतिशत शिक्षक उन्नत डिग्रीधारी हैं। ऐसे स्कूल आईवी लीग के लिए रेड कार्पेट के रूप में देखे जा सकते हैं। 

इस तरह शिक्षा व्यवस्था को कई तरह से उत्पादन व्यवस्था के भीतर रोजगार की उठा-पटक, बढ़ती हुई असमानता और अलगाव से जुड़ा हुआ देखा जा सकता है। ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में विकसित यह तर्क असल में निर्णायकवादी नहीं है बल्कि यह वर्गसंघर्ष के मुद्दे को उठाता है। बावेल्स और जिंटिस के अनुसार,‘वह सीमा जिसमें पूंजीवादी व्यवस्था वास्तव में अपने लक्ष्यों को पूरा करती है समयावधि के अनुसार बदलती जाती है.... अधिकतर पूंजीवादी संबंधों को बढ़ाने और विस्तृत करने के लिए स्कूलों को प्रयोग करने की कोशिशों का शिक्षा व्यवस्था की आंतरिक गतिकी और लोकप्रिय प्रतिपक्ष दोनों के ही द्वारा विरोध हुआ है।’

इनकी किताब का ऐतिहासिक भाग विस्तृत रूप से, स्कूली छात्रों के हित में व्यवस्था के भीतर स्वायत्तता बनाए रखने के लिए मुख्यतया शिक्षकों के संघर्ष के रूप में दिखाई देने वाली शिक्षा व्यवस्था की आंतरिक गतिकी और शिक्षा प्रदाताओं, अभिवावकों और नागरिकों के अधिपत्य विरोधी आंदोलनों के रूप में उभरने वाले उन आंदोलनों की चर्चा करता है जो पूंजीवादी शिक्षण के खिलाफ समय-समय पर पैदा हुए हैं। फिर भी दोनों रूपों में संघर्ष केवल सतही लगता है क्योंकि इनके द्वारा कभी भी पूंजीवादी शिक्षण के आधारभूत सिद्धांतों पर जोरदार हमले नहीं किए गए। परिणाम स्वरूप सभी जगह कॉरपोरेट ऐजेंडा हावी है।         

एकाधिकारवादी पूंजी और शिक्षा के कॉरपोरेट ढांचे का उदय-

सार्वजनिक शिक्षा के प्रति इस प्रकार के वृहत राजनैतिक आर्थिक दृष्टिकोण का महत्व इस बात में है कि इससे संयुक्त राज्य में या और कहीं भी पूंजीवादी शिक्षण के विकास को संचालित करने वाले तर्कों को समझा जा सकता है। संयुक्त राज्य में सार्वजनिक शिक्षा की शुरूआत 19वीं शताब्दी में हुई। लेकिन जिस शिक्षा व्यवस्था को हम आज जानते हैं वह 19वीं सदी के आंखिरी और 20वीं सदी के प्रारंभ में उभरी। इसका आधुनिक विकास विशाल निगम अधिपत्य वाली एकाधिकारी पूंजीवादी व्यवस्था के उभार से जुड़ा हुआ है। अनुमान है कि केवल 1898 और 1902 के बीच विनिर्माण में अमेरिकी पूंजी का ‘एक चैथाई से एक तिहाई भाग’ विलय और अधिग्रहण के माध्यम से समेकित हुआ। इनमें 1901 में 170 अलग-अलग इकाइयों के विलय से  बने यूएस स्टील का निर्माण सबसे बड़ा है। जो कि स्टील उद्योग के 65 फीसदी को नियंत्रित करने वाला पहला एक अरब डालर का निगम था। यह वृहत व्यापारिक पूंजीवाद को दर्शाने वाले कॉरपोरेट संकेंद्रण के दौर का उदाहरण है।

संग्रहण के इस नए चरण के विकास और स्थितिकरण में एक निर्णायक तत्व इसमें निहित उस गुंजाइश में था जिसे मार्क्स ‘‘पूंजी के तहत श्रम के औपचारिक दोहन’’ के बजाय ‘‘वास्तविक दोहन’’ कहना पसंद करते थे।

19वीं शताब्दी के पूंजीवाद में श्रमिक इस स्थिति में थे कि वे कार्य किए जाने के तरीकों के ज्ञान के आधार पर अपने रेंक निर्धारित कर सकते थे और इस प्रकार श्रम प्रक्रिया में काफी हद तक उनका नियंत्रण था। इसलिए श्रमप्रक्रिया में मालिकों और प्रबंधकों का नियंत्रण औपचारिक अधिक था वास्तविक कम। एकाधिकारी पूंजीवाद के उदय के साथ निगम, कार्यबल और फैक्टरीयां बड़ी होती गई और यह संभव हुआ कि श्रम के विभाजन को बढ़ाया जा सके और इस प्रकार ऊपर से नीचे तक प्रबंधकीय नियंत्रण होने लगा। इसने संकेंद्रित उद्योग जगत में एक नए वैज्ञानिक प्रबंधन, ‘टेलरिज़्म’ का रूप ले लिया। श्रमप्रक्रिया में श्रमिकों का नियंत्रण व्यवस्थित ढंग से छिन गया और प्रबंधन द्वारा ही मनमाने ढंग से नियंत्रण किया जाने लगा। इस तरह प्रबंधकीय तर्क के अनुसार श्रमिक ऊपर से आने वाले आदेषों का पालन करने भर को रह गए और उनका प्रत्येक क्षण प्रबंधन द्वारा दिए गए छोटे-छोटे विवरणों से संचालित होने लगा।

अधिकतर श्रमिकों की कार्य करने की स्थितियों में हुए ह्रास को उद्योग जगत में वैज्ञानिक प्रबंधन की शुरूआत के मुख्य परिणाम के तौर पर हैरी ब्रेवरमैन ने 1974 में ‘लेबर एंड मोनोपोली कैपिटल’ में विश्लेषित किया है। एकाधिकरिक पूंजीवादी समाज मुख्य रूप से कौशल के ध्रुवीकरण के रूप में पहचाना जाता है जिसमें अधिक संख्या में अकुशल श्रमिकों की तुलना में कार्यकुशल श्रमिकों की कम मांग होती है।
   
कॉरपोरेट द्वारा बनायी गई शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य श्रमिकों का उत्पादन कर श्रम-बाजार के इन विभिन्न चरणों को भरना था। लेकिन साथ ही वैज्ञानिक प्रबंधन को भी श्रम प्रक्रिया को निर्देशित करने के लिए देखा गया ताकि स्कूलों के भीतर शिक्षक एक नए तरीके के कॉरपोरेट प्रबंधक बन जाएं।
संयुक्त राज्य में लूइस ब्रांडीस द्वारा 1910 में अंतर्राज्यीय कॉमर्स कमिशन में की गई उस पैरवी के बाद वैज्ञानिक प्रबंधन पहले पहल व्यापक तौर पर जाना गया जिसमें उन्होंने कॉरपोरेट लाभ बढ़ाने में कुशलता निर्माण की जादुई भूमिका की प्रशंशा की। इसे 1911 में फ्रैड्रिक विंस्लो की किताब ‘टेलर्स प्रिंसिपल्स ऑफ़ साइंटिफिक मेनेजमेंट’ ने विस्तार दिया जो कि शुरूआत में ‘अमेरिकन मैगजीन’ में किस्तों में छपी थी। वैज्ञानिक प्रबंधन और दक्षता विशेषज्ञ जल्द ही कॉरपोरेट कार्यकारियों के बीच और लोकाधिकारियों दोनों के बीच प्रसिद्ध हो गए और जल्द तेजी से सार्वजनिक स्कूलों के प्रबंधन तक पहुंच गए जहां मानक परीक्षण और टेलरीकृत स्कूल एक नए स्वप्नलोकीय कॉरपोरेट मॉडल स्कूल व्यवस्था के पारिभाषिक सिद्धांत बन गए।

इस प्रकार दक्षता विशेषज्ञ हैरिंगटन एमर्सन ने 1911 में न्यूयार्क के हाईस्कूल टीचर्स एशोशिएशन को एक भाषण दिया जिसे उन्होंने ‘साइंटिफिक मेनेजमेंट एंड हाईस्कूल इफीसिएंसी’ नाम दिया। उनके बारह में से अंतिम सात सिद्धांत मानक रिकार्ड्स, योजना, मानक स्थितियां, मानकीकृत ऑपरेशन्स, मानक निर्देष, मानक और योग्यता पुरस्कार थे। 1913 में शिकागो यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्रशासन के विशेषज्ञ फ्रैंकलिन बॉबिट ने ‘द सुपरविजन ऑफ़ सिटी स्कूल्स’ में लिखा-
कार्यकर्ताओं को, किए जाने वाले कार्य के लिए विस्तृत दिशा निर्देश, लक्षित मानक, प्रयुक्त क्रियाविधियों और प्रयोग किए जाने वाले उपकरण के विषय में पूरी तरह परिचित किया जाना चाहिए..... अध्यापकों को कार्य में मौज उड़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जब कोई ऐसी विधि मिल जाए जो कि अन्य से स्पष्ट रूप से बेहतर है तो ऐसी ही विधि को प्रयोग में लाना चाहिए। इस क्रियाविधि की अनदेखी करना और अपनी उदासीनता को अध्यापकों की स्वतंत्रता के नाम पर जायज ठहरना शायद शुरूआती अनुभववाद के दौर में उचित था जब सर्वेक्षक अध्यापकों को केवल पदोन्नत करते थे और वस्तुगत् तौर पर वे मानकों और विधियों के विषय में पद और फाइलों से थोड़ी ही अधिक जानकारी रखते थे।

बॉबिट चाहते हैं कि मानकीकृत कुषल तरीकों की आवष्यकता के कारण,‘‘अध्यापकों की स्वतंत्रता आवष्य ही कुछ संकुचित की जानी चाहिए’’। बॉबिट तो ये सुझाव भी दे गए हैं कि इमला लेखन करते हुए विद्यार्थियों की स्टॉप वॉच से जांचना चाहिए ताकि लेखन सिखाने में प्रयुक्त साठ मिनट के समय को प्रयोग करने का सबसे बढि़या तरीका जाना जा सके।  इसी तरह एक प्रभावशाली शिक्षण प्रशासक और सेन फ्रैंसिस्को पब्लिक स्कूल के अधीक्षक एलवर्ट कबर्ले ने 1916 में पब्लिक स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन में लिखा ,‘‘एक तरह से हमारे स्कूल फैक्ट्रियां हैं जिनमें कच्चे माल (बच्चे) को आकार दिया जाता है और जीवन की विविध आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादों में बदला जाता है।’’
न्यूयार्क शहर में स्कूलों के जिला अधीक्षक, जोसफ एस टेलर ने 1912 में लिखाः
(1) एक नियोक्ता के तौर पर राज्य को शिक्षकों के साथ सहयोग करना चाहिए क्योंकि शिक्षक हमेशा ही शिक्षा के विज्ञान को नहीं समझता है। (2) राज्य उन विशेषज्ञों को उपलब्ध कराए जो कि शिक्षकों का पर्यवेक्षण कर पाएं और सर्वाधिक कुशल और किफायती प्रक्रियांओं के बारे में सुझाव दें। (3) व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह की कार्य प्रणाली स्कूलों में भी अपनाई जाय जिसमें दिया गया कार्य निश्चित शर्तों के साथ पूरा किया जाय। (4) जो अध्यापक दिए गए कार्य को पूर्ण करे उसे बोनस दिया जाय जो कि पैसे के रूप में ना होकर एक रेटिंग के रूप में हो जो पैसे के रूप में बदला जा सके। (5) कार्य में अक्षम लोगों को निकाल दिया जाए।
इस पद्यति में शिक्षकों की कार्यकुशलता को प्राथमिक रूप से उनके छात्रों के परीक्षण के माध्यम से मापी जानी थी। इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध से ठीक पहले मानकीकृत परीक्षणों के द्वारा मानक विकसित किए जाने पर बहुत अधिक जोर दिया गया। 1911 में नेशनल एजूकेशन एसोसिएशन (एनईए) ने स्कूलों में कुशलता की परीक्षा और मानकों पर एक कमेटी का गठन किया। जब आईक्यू टेस्टिंग और अन्य प्रच्छन्न नस्लवादी जांच के तरीकों के प्रचलन के समय ही हुआ।

कारपोरेट प्रभुत्व वाली मानकीकृत शिक्षाव्यवस्था के निर्माण के पहले प्रयास उस समय उभरे नए परोपकारी कर-मुक्त संगठनों द्वारा किए गए। एंड्रयू कार्नेगी, जॉन डी. राॅकेफेलर और हैनरी फोर्ड जैसे अरबपतियों ने निजी संगठन स्थापित किए जिनमें बड़े सामाजिक परिवर्तनों को गति देने के लिए सरकार की भूमिका को संकुचित करते हुए परोपकार के तौर पर वित्त की व्यवस्था की गई। कार्नेगी फाउण्डेशन टैस्टिंग एवं सुजननिकी दोनों में अग्रणी था। इसने 1954 के दौरान टैस्टिंग में 6,424,000 डालर का निवेश किया। 1965 में इसने नेशनल एसेसमेंट ऑफ़ ऐजूकेशनल प्रोग्राम के विकास की शुरूआत की। राॅकफेलर फाउण्डेशन ने 1930 और 1940 के दौरान ऐजूकेशनल टैस्टिंग सर्विस के निर्माण में भारी योगदान दिया।  

प्रारंभिक कॉरपोरेट शिक्षा आंदोलन की असफलता

लेकिन 19वीं शताब्दी में एकाधिकारी निगमों और परोपकारी फाउण्डेशनों के कठोर मानकों और टैस्टिंग वाले कॉरपोरेट मॉडल स्कूलों के विकास में किए गए अत्यधिक प्रयासों के बावजूद भी पब्लिक स्कूल कई तरीकों से उनके नियंत्रण के बाहर रहे। स्कूल अकसर ही प्रगतिशील शिक्षकों, अभिभावकों और समुदायों के बीच से उभरने वाले लोकतांत्रिक संघर्षों के केंद्र में रहे थे। शिक्षक काफी हद तक स्वायत्ता प्राप्त एवं स्वयं को कामगार तबके के बच्चों से जुड़ा पाने वाले और श्रम सघन क्षेत्र में कम वेतन पाने वाले पेशेवर थे। शिक्षकों के संगठन उभरे जिनके माध्यम से उन्होंने सार्वजनिक स्कूलों में वेतन और कार्यस्थितियों के बारे में न्यूनतम मोलभाव करने की स्थितियां बनाई।

पूंजीवादी शिक्षा की परिणामी व्यवस्था में बहुत गंभीर खामियां थी। एक गहरे रूप में बंटे हुए समाज के तौर पर संयुक्त राज्य संस्थागत रूप से नस्लवादी बना रहा। जैसा कि 2005 में आई जाॅनाथन कोजोल की किताब ‘द शेम ऑफ़ द नेशन’ में संयुक्त राज्य के स्कूलों में नस्लीय स्तरीकरण में दिखता है। 20  पाठ्यक्रम के स्तर को अकसर कॉरपोरेट्स के द्वारा की जाने वाली अकुशल और नम्य श्रमशक्ति की मांग के हिसाब से गिराया गया है। फिर भी, प्रगतिशील अध्यापक सभी बाधाओं के बावजूद बच्चों की वास्तविक जरूरतों के लिए व्यवस्था के बुरे पहलुओं के खिलाफ लडे़। अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ टीचर्स की पत्रिका ‘द अमेरिकन टीचर’ ने 1912 में स्कूलों में वैज्ञानिक प्रबंधन के खिलाफ एक आलेख छापा। जिसमें लिखा थाः
संगठनों और स्कूलों के तरीकों ने वाणिज्यिक उद्यमों का रूप ले लिया है जिनसे हमारा आर्थिक जीवन पहचाना जाता है। हमने ‘बड़े उद्योगपतियों’ के घमंड को स्वीकार लिया है, साथ ही उनके योग्यता के मानकों को भी बिना प्रश्न किए स्वीकारा है। हमने शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों के परिणाम का मानक ‘कीमत और उत्पाद’ के रूप में स्वीकार कर लिया है जैसे कि किसी फैक्ट्री या डिपार्टमेंट स्टोर में होता है। लेकिन चूंकि शिक्षा का वास्ता व्यक्तित्वों से है, इसलिए यह किसी मानकीकृत निर्माण प्रक्रिया की तरह नहीं है। शिक्षा की क्षमता को छात्रों के प्रति घंटे के वेतन के आधार पर नहीं बल्कि मानवतावाद, काम कर सकने और प्रोत्साहन करने को बढ़ाने की क्षमता के रूप में मापना चाहिए।

शिक्षा की साख बनी रही क्योंकि शिक्षक, अभिवावकों और समुदाय के सदस्यों के द्वारा अकसर ही पूंजीवादी शिक्षण के जोर का विरोध किया है। बदलती परिस्थितियों ने प्रगतिशील शिक्षा आंदोलनों की कड़ी को उभारा।  जैसे कि 1920 और 30 के दशक में जॉन डेवी से जुड़ा हुआ लोकतांत्रिक और प्रायोगिक शिक्षा आंदोलन, सिविल राइट आंदोलन के दौर में स्कूल अलगाव विरोधी आंदोलन, 1960 और 70 के दशक मुफ्त शिक्षा आंदोलन। 1916 में ‘डैमोक्रेसी इन ऐजूकेशन’ में कहा ‘शिक्षा, किसी बड़े दायरे की सीखने की प्रणाली की अधीनस्थ जैसी कोई विशेषीकृत प्रक्रिया नहीं है। शिक्षण का सर्वोत्तम रूप जीवन से ही सीखने की प्रवृत्ति और उन परिस्थियों का निर्माण है जिससे कि सभी लोग जीवन की प्रक्रिया में ही सीख सकें।’

1916 में रेडिकल न्यूयार्क टीचर्स यूनियन (टीयू) का अभ्युदय हुआ। अभिवावकों और समुदायों दोनों के साथ गठजोड़ बनाते हुए टीयू नस्लीयविभेद और गरीबी के खिलाफ, इन्हें विद्यार्थियों की सफलता में मुख्य बाधा मानते हुए लड़ा। इस प्रकार के शिक्षा दर्शन का लक्ष्य पूरे समाज के रूपांतरण की जरूरत पर जोर देना था। आज के ‘सामाजिक आंदोलन एकतावाद’ के समरूप शक्तिशाली विकल्प को प्रस्तुत करने वाले टीयू का अस्तित्व शीतयुद्ध के दौर में वामपंथियों के नाम पर खत्म कर दिया गया। इग्यारह सौ के करीब स्कूल कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया और चार सौ से ज्यादा लोगों को बाहर निकाल दिया गया। 1950 में न्यूयार्क बोर्ड ऑफ़ ऐजूकेशन ने स्कूलों में टीयू की गतिविधि को प्रतिबंधित करने के लिए कुख्यात टीमोन रिज्योल्युशन अपनाया।

हालांकि इन प्रगतिशील शिक्षा आंदोलनों में से कोई भी अमेरिका में प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा में वास्तविक उद्धार की दिशा में बदलाव करने में सफल नहीं हुआ और 20वीं शताब्दी के अंत में शिक्षा में व्याप्त असमानता, गरीबी, संस्थागत् नस्लवाद और आर्थिक मंदी के प्रभावों से शिक्षा को बचा पाने में सफल नहीं हुआ। लेकिन ये आंदोलन सार्वजनिक क्षेत्र में शिक्षा में बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने और भविष्य में समतावादी शिक्षा की संभावनाओं की उमींदों को संरक्षित रखने में सफल हुए। 

साभार-पत्रकार praxis

पूंजी का संरचनात्मक संकट और शिक्षा : यूएस परिघटना : दूसरी क़िस्त http://www.laika-verlag.de/sites/default/files/JohnBellamyFoster.png जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर - जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर अनुवादः रोहित, मोहन और सुनील जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर मंथली रिव्यू के संपादक हैं। वे, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑरेगोन में समाजशास्त्र के प्रवक्ता और चर्चित पुस्तक ‘द ग्रेट फाइनेंसियल क्राइसिस’(फ्रैड मैग्डोफ़ के साथ) के लेखक हैं। उक्त आलेख 11अप्रैल 2011 को फ्रैडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंटा कैटेरिना, फ्लोरिआनोपोलिस, ब्राजील में शिक्षा एवं मार्क्सवाद पर पांचवे ब्राजीलियन सम्मेलन (ईबीईएम) में उनके द्वारा दिए गए आधार वक्तव्य का विस्तार है। इस लम्बे आलेख को हम ४ किस्तों में यहाँ दे रहे हैं. यह दूसरी क़िस्त है... (पहली के लिए यहाँ क्लिक करें) -सं. आर्थिक ठहराव और सार्वजनिक शिक्षा पर हमले 1974-75 के बीच शुरू हुई मंदी के साथ आर्थिक ठहराव की शुरूआत और अभूतपूर्व रूप से निरंतर गिर रहे आर्थिक विकास ने चीजों को निर्णायक रूप से बदतर कर दिया था। 1970 से संयुक्त राज्य में दशक दर दशक गिर रहे वास्तविक आर्थिक विकास से शिक्षा पर दबाव लगातार बढ़ता गया। 1960 और शुरूआती 1970 के दौर में के-12 शिक्षा पर जो खर्च लगातार बढ़कर कर 1975 में जीडीपी के 4.1 प्रतिशत तक पहुंचा, एक दशक बाद ही 1985 में गिर कर 3.6 प्रतिशत रह गया। स्थानीय सरकारों से सार्वजनिक स्कूलों को मिलने वाला राजस्व बड़े पैमाने पर हुए संपत्ति कर में हुए बदलाव के चलते 1965 में 53 प्रतिशत से घटकर 1985 में 44 प्रतिशत जा पहुंचा। नतीजतन राज्य स्तर पर फंडिंग और अधिक केंद्रीकृत हो गई। इस बीच स्कूलों को वृहद समाज में बढ़ रहे घाटे को झेलने करने को मजबूर किया गया। संयुक्त राज्य में गरीबी में जी रहे बच्चों की संख्या 1973 में 14.4 प्रतिशत से 1993 तक 22.7 प्रतिशत हो गई जबकि इन गरीब बच्चों में अत्यधिक गरीब बच्चे जोकि आधिकारिक गरीबी दर में आधे हैं, का कुल अनुपात 1975 में 30 प्रतिशत से बढ़कर 1993 में 40 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया। सार्वजनिक स्कूलों में तेजी से गरीब बच्चों की बढ़ती संख्या का दबाव स्कूल के सीमित संसाधनों पर भी पड़ा। नवउदारवादी दौर में स्कूलों की इन बिगड़ती दशाओं के बावजूद मानकों और मूल्यांकन पर जोर देते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के खर्चो में कटौती की गई। स्कूलों को और अधिक बाजार और कॉरपोरेट के संचालन में ढकेला गया और वाउचर और चार्टर सहित कई रूढि़वादी विकल्पों की पहल कर तेजी से निजीकृत किया गया। स्कूल-वाउचर का प्रस्ताव पहले-पहल 1962 में मिल्टन फैडमैन की किताब ‘कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम’ से लोकप्रिय हुआ जिसमें सरकार द्वारा अभिवावकों को उनके बच्चों की सार्वजनिक शिक्षा के मूल्य के बराबर के वाउचर देने का प्रस्ताव था जिससे वे अपने बच्चे को अपनी पसंद के स्कूल में भेज सकें। इसका मुख्य लक्ष्य निजी शिक्षा को सरकारी सब्सिडी मुहैया कराना था। यह सार्वजनिक शिक्षा पर सीधा हमला था। वहीं सार्वजनिक वित्तपोषित लेकिन निजी प्रबंधन वाले चार्टर स्कूल जोकि शिक्षा विभाग द्वारा न चलाए जाने के बावजूद भी तकनीकी रूप से सार्वजनिक स्कूल थे, 1980 तक शिक्षा के निजीकरण के सूक्ष्म तरीके के उदाहरण के तौर पर दिखाई दिए। 1980 में सार्वजनिक शिक्षा के विरुद्ध, कॉरपोरेट हितों का पैरोकार एक शक्तिशाली रूढि़वादी राजनीतिक गठबंधन खड़ा किया गया। रोनाल्ड रीगन ने कार्टर प्रशासन के दौरान कैबिनेट स्तर पर गठित यूएस सार्वजनिक विभाग को समाप्त करने की इच्छा बार-बार जताते हुए वाउचर शिक्षा के लिए जोर लगाया। रीगन ने शिक्षा पर एक राष्ट्रीय आयोग गठित किया जिसने ‘ए नेशन एट रिस्क’ शीर्षक वाली अपनी रिपोर्ट 1983 में रखी। जिसका सार था कि यूएस शिक्षा व्यवस्था अपने स्वयं के अंतर्विरोधों के कारण असफल हो रही है। (धीमे आर्थिक विकास, बढ़ती हुई असमानता और गरीबी का इसमें कोई जिक्र नहीं था।) ‘अ नेशन एट रिस्क’ के अनुसार ‘‘यदि किसी गैरहितैषी शक्ति ने अमेरिका में मौजूद वर्तमान औसत दर्जे की शिक्षण प्रणाली को थोपा होता तो हम इसे आसानी से एक युद्ध से जुड़ा हुआ कृत्य मान लेते। यह मौजूद है क्योंकि हमने इसे होने दिया है। हम वास्तव में विचारहीन, एकांगी शैक्षिक निरस्त्रीकरण का कृत्य कर रहे हैं।’’ बड़े शीतयुद्ध सैन्य ढांचे की शुरूआत करने वाले रीगन प्रशासन ने अमीरों और निगमों को करों में छूट देते हुए, स्कूलों को मिलने वाली संघीय मदद की कटौती को, आसमान छूते हुए संघीय घाटे की लफ्फाजी के आधार पर सही ठहराया। इस कटौती में कम आय वाले विभागों को स्कूलों के लिए मिलने वाली मदद में 50 प्रतिशत कटौती भी सम्मिलित थी। 1980 के दशक अंत और 90 की शुरूआत में नाटकीय रूप से कठोर मानक, उत्तरदायित्व और मूल्यांकन प्रणाली की ओर एकाएक बदलाव देखा गया जिनका अनुसरण केनटुकी और टैक्सास जैसे राज्यों में (बाद में गवर्नर जार्ज डब्लू बुश के अधीन) जबरन किया गया। जार्ज एच डब्लू बुश और क्लिंटन प्रशासन के दौरान शिक्षा सुधारों की यही दिशा रही और जार्ज डब्लू बुश के राष्ट्रपति काल में यह प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के रूपांतरण के लिए विभाजक रेखा के रूप में स्थापित हो गई। 2001 में शपथग्रहण के तीन दिन के बाद ही बुश ने अपने एनसीबीएल कार्यक्रम को जाहिर किया। 8 जनवरी 2002 को पास एनसीएलबी विधेयक सैकड़ों पेजों का है पर अवधारणागत् रूप में इसके सात मुख्य अवयव हैंः (1) प्रत्येक राज्य को अपने मूल्यांकन और प्रदर्शन के तीन स्तर (बुनियादी, प्रवीणता और आधुनिक) विकसित करने थे। जिसमें राज्यों को प्रवीणता के अपने मानक तय करने थे। (2) संघीय शिक्षा निधि को प्राप्त करने के लिए राज्यों को छात्रों का वार्षिक मूल्यांकन उनके वाचन और गणित में प्रवीणता के आधार पर तीन से आठ ग्रेड तक करना था और हासिल किए गए अंकों को निम्न आर्थिक स्तर, नस्ल, नृजातीयता, विकलांगता स्तर और अंग्रेजी की कम कुशलता के आधार पर विभाजित करना था। (3) प्रत्येक राज्य को एक समयरेखा देनी थी जिससे यह दिखाया जाय कि 2014 तक उसके 100 फीसदी छात्र कुशलता को प्राप्त कर लें। (4) सभी स्कूलों और विद्यालयी विभागों को प्रत्येक विभाजित उपसमूह में 2014 तक सौ प्रतिशत कुशलता प्राप्त करने संबंधी पर्याप्त वार्षिक प्रगति (एवाईपी) को प्रदर्षित करने के आदेश दिए गए। (5) जो विद्यालय सभी उपसमूहों के लिए पर्याप्त वार्षिक प्रगति प्राप्त नहीं कर पाएंगे उन पर आगामी प्रत्येक वर्ष में भारी दंड लगाया जाएगा। चौथे वर्ष में स्कूल में सुधार के कदम उठाए जाएंगे जिसके तहत पाठ्यक्रम परिवर्तन, स्टाफ परिवर्तन या सत्रावधि में वृद्धि की जाएगी। यदि स्कूल अब भी पर्याप्त वार्षिक प्रगति नहीं दे पाए तो पांचवे साल में उसे पुनर्गठित किया जाएगा। (6) पुनर्गठित किए जाने वाले स्कूल को पांच विकल्प दिए जाएंगे जिनका परिणाम अनिवार्य रूप से एक ही होगाः (ए) स्कूल को चार्टर स्कूल में बदल दिया जाएगा। (बी) प्रधानाचार्य और स्टाफ को बदल दिया जाएगा (सी) स्कूल का प्रबंधन निजी हाथों में दे दिया जाएगा। (डी) राज्य स्कूल का नियंत्रण छोड़ देगा (ई) विद्यालयी प्रशासन का व्यापक पुनर्गठन (अधिकांश स्कूल और स्कूली विभाग अपेक्षाकृत कम सुनिष्चित विकल्प होने के कारण आखिरी विकल्प को चुनने के लिए बाध्य थे ताकि अन्य विकल्पों को टाला जा सके।) (7) प्रत्येक राज्य को नेशनल एसेसमेंट ऑफ़ एजूकेशनल प्रोग्रेस नामक एक संघीय परीक्षा में प्रतिभाग करना था जो वैसे तो स्कूल और स्कूली विभागों पर कोई प्रभाव नहीं डालती थी परंतु राज्य की मूल्यांकन प्रणाली में बाहरी नियंत्रण के लिए बनाई गई थी। एनसीएलबी के तहत पुनर्गठन का दबाव झेलने वाले स्कूलों की संख्या साल दर साल बढ़ती गई। 2007-08 में देश भर में पैंतीस हजार स्कूल पुनर्गठन की प्रक्रिया या योजना स्थिति में लाए गए। यह पिछले साल की तुलना में सीधे 50 फीसदी ज्यादा था। 2010 में संयुक्त राज्य में कई स्कूल एनसीएलबी के नियमों के तहत एवाईपी बनाने में असफल रहे और इनकी संख्या पिछले वर्ष के 33 प्रतिशत की तुलना में 38 प्रतिशत जा पहुंची। एनसीएलबी ने स्कूलों और अध्यापकों पर नए भार और अपेक्षाओं को तो बढ़ाया लेकिन यूएस सरकार द्वारा प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर खर्च होने वाले जीडीपी के प्रतिशत को नहीं बढ़ाया गया। यह खर्च 1990 के दशक में बढ़ाया गया था। 2001 में एनसीएलबी की ठीक शुरूआत के समय यह खर्च बढ़ते हुए जीडीपी का 4.2 प्रतिशत पहुंचा जो कि इसका अधिकतम था। यह खर्च एनसीएलबी के बाद के वर्षों में केवल घटता ही गया और 2006 में 4.0 तक पहुंच गया जो कि 1975 के खर्च के बराबर था। एनसीएलबी विधेयक बिना बजट का आबंटन किए एक ऐसी व्यवस्था थोपता है जिसमें राज्य द्वारा संचालित सार्वजनिक स्कूल बिना संसाधनों के बड़ी अतिरिक्त लागत को झेलने के लिए विवश होते हैं। बाउल्डर, कॉलरेडो में स्थित नेशनल ऐजूकेशन पालिसी सेंटर के प्रबंध निदेशक और वरमान्ट में स्कूलों के पूर्व अधीक्षक ‘विलियम मैथिस’ ने यह आंकलन किया कि एनसीएलबी के के-12 शिक्षा के राष्ट्रीय बजट में अभी के मुकाबले 20-30 फीसदी की बढ़ोत्तरी करनी होगी। लेकिन शिक्षानिधि के मामूली तौर पर बढ़ने के बजाय यह या तो स्थिर रही या और भी गिरी और यह बात जीडीपी के प्रतिशत और नागरिक सरकार के खर्च दोनों में देखी गई। राज्य संचालित बड़े शहरी स्कूलों में से न्यूयार्क शहर के ‘मेयर माइकल ब्लूमबर्ग स्कूल’ में एनसीएलबी शैली से किया गया सुधार सर्वाधिक चर्चित रहा। अरबपति ब्लूमबर्ग अपने 18 अरब डालरों के साथ 2011 के संयुक्त राज्य में व्यक्तिगत् धनाड्यों की सूची में तेरहवें स्थान पर है। इन्होंने यह अरबों डालर वित्तीय समाचार मीडिया के साम्राज्य के विकास से ‘ब्लूमबर्ग एलपी’ के जरिए से कमाया। अपनी प्रचार अभियान सामग्री में ब्लूमबर्ग ने घोषणा की कि स्कूल ‘आपातकाल की स्थिति’ में हैं। मेयर के अपने चुनाव के दौरान उसने तेजी से के-12 शिक्षा को कॉरपोरेट वित्तीय दिशा की ओर बदलने की बात कही। वाचन और गणित की परीक्षाओं में अंक प्राप्ति की ओर मुख्य जोर था जब्कि पाठ्यक्रम के अन्य विषयों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया। असफल रहे सार्वजनिक स्कूलों को चार्टर स्कूलों में तब्दील कर दिया गया। हालांकि ब्लूमबर्ग के स्कूलों के पुनर्गठन और निजीकरण के बावजूद संघीय एनएईपी परिक्षा से पता चलता है कि न्यूयार्क शहर में 2003 से 2007 के दौरान वाचन या गणित में कोई महत्वपूर्ण सफलता नहीं हासिल हुई।\ साहसपूर्ण परोपकार और मूल्य-वर्धित शिक्षा ब्लूमबर्ग अकेला अरबपति नहीं था जिसे स्कूलों के सुधारों ने आकर्षित किया। वित्त और सूचना पूंजी के एकाधिकार की 21वीं सदी में उच्च कॉरपोरेट हलकों में यह विशवास पैदा हुआ है कि अब शिक्षा का वैज्ञानिक तकनीकी और वित्तीय क्षेत्रों के समान ही पूरी तरह से प्रबंधन किया जा सकता है, जिससे (1) शिक्षकों की श्रम प्रक्रिया का नियंत्रण (2) अधिक विभेदित और एकरस श्रमशक्ति के निर्माण के लिए अधीनस्थ शिक्षा और (3) सार्वजनिक शिक्षा का निजीकरण (जहां तक बिना गंभीर प्रतिरोधों के हो सके) संभव हो जाएगा। डिजिटल युग में नौकरशाहीकरण, ट्रैकिंग और परीक्षण पहले की तुलना में अधिक आसान हो गए थे। शिक्षण की श्रमप्रक्रिया का केंद्रीकरण ही इस प्रक्रिया का मकसद था ताकि शिक्षा विज्ञान को लागू करने का तरीका क्लासिक वैज्ञानिक प्रबंधन की तरह शिक्षकों से छीनकर उच्चाधिकारियों को सौंप दिया जाय। सार्वजनिक स्कूलों को शिक्षकों के बजाय तकनीक पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया गया यह उस टेलरवादी योजना के नए संस्करण के अनुरूप था जिसमें शिक्षकों को तेजतर्रार मषीनों के उपांगों के रूप में देखा गया था। वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित शिक्षा का जो स्वप्न 20 वीं सदी में पूरी तरह हकीकत में नहीं बदल सका अंततः 21वीं सदी के डिजीटल पूंजीवाद में पहुंच के भीतर लग रहा था। जार्ज एच डब्लू बुश प्रशासन में सहायक शिक्षा सचिव रहे डिआन रेविच कहते हैं ‘‘तकनीकी विकास के चलते यह संभव हुआ है कि कई राज्य और जिले विशिष्ट छात्र के अंक और उससे संबंधित अध्यापक की जानकारी रख सकें और इसके आधार पर शिक्षक को छात्र की उन्नति और अवनति के लिए जवाबदेह बना सकें।’’ नए रूढि़वादी शिक्षा सुधार आंदोलन का मुख्य नारा मूल्यवर्धित शिक्षा था और छात्रों में वर्धित मूल्य के आधार पर शिक्षकों की क्षमता का मूल्यांकन और इसी गुण के आधार पर उनको भुगतान होना था। इस तरह मूल्यवर्धन, पूंजी के विकास के लिए छद्म रूप में परीक्षा में अंक बढ़ाने से अधिक कुछ नहीं था। इक्कीसवीं सदी के कॉरपोरेट स्कूल सुधार आंदोलन का नेतृत्व, जिसने सरकार की भूमिका को हाशिये पर धकेल दिया, चार बड़े परोपकारी फाउंडेशनों से आया जो एकाधिकारी वित्तीय सूचना और खुदरा पूंजी के मुख्य प्रतिनिधि थे। ये चार फाउंडेशन हैंः (1) द बिल एंड मैलिंडा गेट्स फाउंडेशन (2) द वैल्टन फैमिली फाउंडेशन (3) द एली एंड एडिटी ब्राड फाउंडेशन और (4) द माइकल एंड सुसैन डैल फाउंडेशन। ये नए किस्म के फाउंडेशन हैं जिन्हें ‘वैंचर परोपकार’ (ये नाम वैंचर कैपिटलिज्म से लिया गया है।) का नाम दिया गया और ‘‘परोपकारी पूंजीवाद‘‘ भी कहा गया। परोपकारी पूंजीवाद को उनकी आक्रामक निवेश केंद्रित तौर तरीकों के आधार पर पहले के फाउंडेशनों से अलग किया जाता है। पारंपरिक अनुदान से बचते हुए पैसे को सीधे चुने हुए प्रोजक्टों में डाला जाता है। एक मूल्यवर्धित कार्यप्रणाली अपनाई गई है जिसमें व्यापार के समान ही तुरंत परिणामों की अपेक्षा की जाती है। अपनी कर मुक्त स्थिति के बावजूद ‘परोपकारी पूंजीवादी’ सरकारी नीतियों को सीधे प्रभावित करने के लिए व्यग्र दिखाइ देते हैं। माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स द्वारा बनाए गए ‘द गेट्स फाउंडेशन’ की संपत्ति 2010 में 33 अरब अमेरीकी डालर थी जो कि वित्तीय पूंजीपति वारेन बफे से 30 अरब डालर के वार्षिक योगदान के साथ और बढ़ गई। 2008 में वॉलमार्ट स्टोर्स के मालिकों के वॉलटन फाउंडेशन के पास दो अरब डालर की संपत्ति थी। 1999 में अपने उद्यम सनअमेरीका (जो कि बाद में दिवालिया हुआ और जिसे 18 अरब डालर का बेलआउट पैकेज दिया गया) को बेचने वाले रियल एस्टेट वित्तीय अरबपति एली ब्राड द ब्राड फाउंडेशन के निदेशक हैं जिसकी 2008 में कुल संपत्ति 1.4 अरब डालर है। जबकि डैल के संस्थापक और सीईओ माइकल डैल के द माइकल एंड सुसैन डैल फाउंडेशन की संपत्ति 2006 में लगभग एक अरब डालर से अधिक थी। डैल फाउंडेशन के क्रियाकलाप डैल (कंपनी) की गतिविधियों से जुड़ी हुई रही जो कि सार्वजनिक स्कूलों को बाजार के तौर पर देखने वाली तकनीक आधारित कंपनियों में से प्रमुख है। डैल फाउंडेशन तीन अन्य परोपकारी पूंजीवादी संगठनों के साथ साथ ही काम करता है (गेट्स और बोर्ड फाउंडेशन इसके बड़े दानदाता हैं)। यह प्रदर्शन के प्रबंधन पर विशेष जोर देता है। जोकि सूचना तकनीकी को स्कूलों में जवाबदेही का आधार बनाने पर केंद्रित है। यह सीधे तौर पर शिक्षा बाजार के डैल के अपने आर्थिक हितों से जुड़ा हुआ है। क्योंकि डैल, एप्पल के बाद के-12 स्कूलों में तकनीकी हार्डवेयर सुविधाएं मुहैया कराने वाली दूसरी कंपनी है। द डैल फाउंडेशन दावा करता है कि वो स्कूल के बेहतर प्रबंधन के लिए शहरी स्कूलों की, सूचना के एकत्रीकरण विश्लेषण और प्रतिवेदन में तकनीक के इस्तेमाल में मदद कर रहा है। यह चार्टर स्कूलों में लाभ आधारित शिक्षा प्रबंधन संगठनों और चार्टर स्कूलों के रियल एस्टेट डेवलेपमेंट का बड़ा समर्थक है। शिक्षणेत्तर क्षेत्रों (जैसे व्यापार, कानून, सेना आदि) से पेशेवरों की भर्ती करते हुए नवउदारवादी पूंजीवादी शिक्षा सुधार के लिए नए कैडर के प्रशिक्षण में ब्राड फाउंडेशन अव्वल है। इसका लक्ष्य उन्हें उस कैडर को स्कूल के उच्च प्रबंधन स्टाफ और स्कूल अधीक्षण में स्थान देना है। द ब्राड सेंटर फॉर द मेनेजमेंट ऑफ़ स्कूल सिस्टम्स के दो कार्यक्रम मुख्य हैः (1) द ब्राड सुपरिटेंडेंट्स ऐकेडमी, जिसमें स्कूल सुपरिटेंडेंट्स को प्रशिक्षण दिया जाता है और बड़े शहरों में औहदे दिलाए जाते हैं। (2)द ब्राड रेजीडेंसी इन अर्बन एजूकेशन जो कि अपने स्नातकों को स्कूली विभागों में उच्च स्तरीय प्रबंधकीय औहदे दिलाने के लिए स्थापित की गई है। ब्राड फाउंडेशन अपने स्नातकों को वेतन की पेशकश करते हुए और इस तरह उन्हें कठिन दौर से गुजर रहे स्कूलों के लिए आकर्षक बनाते हुए ऐसी नियुक्तियों में तेजी लाता है और स्कूल बोर्डों को उच्च कारपोरेट की सेवाओं को लेने के अवसर देता है। ब्राड के स्नातकों की सेवाएं लेकर स्कूली विभाग ब्राड फाउंडेशन से अतिरिक्त धन लेने के लायक बन जाते हैं। ब्राड इंस्टिट्यूट फॉर स्कूल बोर्ड्स का मिशन स्कूल बोर्ड के देश भर से चुने हुए सदस्यों को पुनः प्रशिक्षण देकर उन्हें स्कूलों के कॉरपोरेट प्रबंधन मॉडल के अनुरूप ढालना है। इसकी आधिकारिक वैबसाइट के अनुसार 2009 में ब्राड ऐकेडमी के स्नातकों द्वारा शहरी स्कूलों के अधीक्षक के पदों में से 43 फीसदी पर नियुक्ति पाई गई। द ब्राड फाउंडेशन शिक्षा के निजीकरण का कट्टर समर्थक है। विशेष रूप से इसकी दिलचस्पी शिक्षक संघों को तोड़ने, शिक्षकों के लिए योग्यता भुगतान की व्यवस्था स्थापित करने और सामान्यतया शिक्षा को गैरपेषेवर रूप देने में है ताकि इसे शुद्ध व्यावसायिक तौर पर श्रमशक्ति का सर्वहाराकरण करते हुए चलाया जा सके। 2009 में ऐली ब्राड ने न्यूयार्क में एक भाशण के दौरान कहा “हम पढ़ाने के तरीके और पाठ्यक्रम अथवा इनमें से किसी के बारे में कुछ भी नहीं जानते। परंतु हम प्रबंधन और शासन के बारे में जानते हैं।“ नाओमी क्लेन के शब्दों में कहें तो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का विध्वंस कर इसका निजीकरण करने की कोशिश द्वारा ब्रोड फाउन्डेशन ‘झटका सिद्धांत’ को बढ़ावा दे रहा है, यह ‘विनाशक पूंजीवाद’ का ही एक रूप है। अप्रैल 2009 में सिएटल एज्युकेशन ने ‘कैसे जानें कि आपके स्कूल में ब्रोड वाइरस आ चुका है’ नाम से अपनी वेबसाइट पर अभिभावकों हेतु एक निर्देशिका प्रकाशित की। ब्रोड वाइरस के लक्षणों में से हैः आपके जिले में अचानक स्कूल बंद होने लगते हैं... जिला अभिलेखों तथा वक्तव्यों में ‘औपलब्ध्कि असफलता’ तथा ‘औपलब्धिक असफलता की भरपाई’ जैसे मुहावरों का प्रयोग बढ़ जाता है... अचानक से बाहरी वैज्ञानिक सलाहकारों की आमद बढ़ जाती है। निजी चार्टर स्कूलों में बदले गए सार्वजनिक स्कूलों की संख्या बढ़ जाती है... गणित की सरल किताब लागू की जाती है... शायद भाषा की भी सरल किताब लागू की जाए... जिला प्रशासन घोषित करता है कि जिले की इकलौती समस्या शिक्षक हैं। आपके बच्चों पर तरह-तरह की परीक्षाएं लाद दी जाती हैं... आपके स्कूल की परिषद स्टॉकहोम सिन्ड्रोम के लक्षण दिखाने लगती है। वे एक राय से सुपरिन्टेंडेंट के पीछे-पीछे मतदान करने लगते हैं। सुपरिंटेंडेंट तथा उसकी रणनीतिक योजना के लिए ब्रोड तथा गेट्स फाउन्डेशन की ओर से मदद आने लगती है। गेट्स फाउन्डेशन आपके जिले की तकनीकी सामग्री या चार्टर स्कूलों में शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने हेतु इमदाद मुहैया करवाती है। वॉलमार्ट कॉरपोरेशन ने अपना धंधा श्रमिकों को कम वेतन देकर फैलाया है। यह यूनियनों की विद्वेषपूर्ण विरोधी है तथा इसने खुदरा क्षेत्र में खुद को एकाधिकारी शक्ति बना लिया है- वाल्टन फाउण्डेशन इसी के नज़रिये को अभिव्यक्त करती है। यह हर संभव तरीके से शिक्षा पर सार्वजनक क्षेत्र के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है। इसके तरीके हैं- शिक्षक संघों पर हमले करना, निजी चार्टरों को बढ़ावा देना, स्कूल चयन इत्यादि। रेविच कहते हैं- ‘‘वाल्टन परिवार फाउण्डेशन के योगदान की समीक्षा करने पर जाहिर होता है कि यह परिवार सार्वजनिक क्षेत्र के विकल्प पैदा करना, उन्हें मज़बूत करना तथा उन विकल्पों को बढ़ावा देना चाहता है। उनका एजेन्डा है चुनाव, प्रतिस्पर्ध और निजीकक़

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जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर
 - जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर
अनुवादः रोहित, मोहन  और सुनील

जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर मंथली रिव्यू के संपादक हैं। वे, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑरेगोन में समाजशास्त्र के प्रवक्ता और चर्चित पुस्तक ‘द ग्रेट फाइनेंसियल क्राइसिस’(फ्रैड मैग्डोफ़ के साथ) के लेखक हैं। उक्त आलेख 11अप्रैल 2011 को फ्रैडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंटा कैटेरिना, फ्लोरिआनोपोलिस, ब्राजील में शिक्षा एवं मार्क्सवाद पर पांचवे ब्राजीलियन सम्मेलन (ईबीईएम) में उनके द्वारा दिए गए आधार वक्तव्य का विस्तार है।  इस लम्बे आलेख को हम ४ किस्तों में यहाँ दे रहे हैं. यह दूसरी क़िस्त है... (पहली के लिए यहाँ क्लिक करें)
-सं.


आर्थिक ठहराव और सार्वजनिक शिक्षा पर हमले

1974-75 के बीच शुरू हुई मंदी के साथ आर्थिक ठहराव की शुरूआत और अभूतपूर्व रूप से निरंतर गिर रहे आर्थिक विकास ने चीजों को निर्णायक रूप से बदतर कर दिया था। 1970 से संयुक्त राज्य में दशक दर दशक गिर रहे वास्तविक आर्थिक विकास से शिक्षा पर दबाव लगातार बढ़ता गया। 1960 और शुरूआती1970 के दौर में के-12 शिक्षा पर जो खर्च लगातार बढ़कर कर 1975 में जीडीपी के 4.1 प्रतिशत तक पहुंचा, एक दशक बाद ही 1985 में गिर कर 3.6प्रतिशत रह गया। स्थानीय सरकारों से सार्वजनिक स्कूलों को मिलने वाला राजस्व बड़े पैमाने पर हुए संपत्ति कर में हुए बदलाव के चलते 1965 में 53प्रतिशत से घटकर 1985 में 44 प्रतिशत जा पहुंचा। नतीजतन राज्य स्तर पर फंडिंग और अधिक केंद्रीकृत हो गई।

इस बीच स्कूलों को वृहद समाज में बढ़ रहे घाटे को झेलने करने को मजबूर किया गया। संयुक्त राज्य में गरीबी में जी रहे बच्चों की संख्या 1973 में 14.4प्रतिशत से 1993 तक 22.7 प्रतिशत हो गई जबकि इन गरीब बच्चों में अत्यधिक गरीब बच्चे जोकि आधिकारिक गरीबी दर में आधे हैंका कुल अनुपात 1975 में 30 प्रतिशत से बढ़कर 1993 में 40 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया। सार्वजनिक स्कूलों में तेजी से गरीब बच्चों की बढ़ती संख्या का दबाव स्कूल के सीमित संसाधनों पर भी पड़ा।

नवउदारवादी दौर में स्कूलों की इन बिगड़ती दशाओं के बावजूद मानकों और मूल्यांकन पर जोर देते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के खर्चो में कटौती की गई। स्कूलों को और अधिक बाजार और कॉरपोरेट के संचालन में ढकेला गया और वाउचर और चार्टर सहित कई रूढि़वादी विकल्पों की पहल कर तेजी से निजीकृत किया गया। स्कूल-वाउचर का प्रस्ताव पहले-पहल 1962 में मिल्टन फैडमैन की किताब कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम’ से लोकप्रिय हुआ जिसमें सरकार द्वारा अभिवावकों को उनके बच्चों की सार्वजनिक शिक्षा के मूल्य के बराबर के वाउचर देने का प्रस्ताव था जिससे वे अपने बच्चे को अपनी पसंद के स्कूल में भेज सकें। इसका मुख्य लक्ष्य निजी शिक्षा को सरकारी सब्सिडी मुहैया कराना था। यह सार्वजनिक शिक्षा पर सीधा हमला था। वहीं सार्वजनिक वित्तपोषित लेकिन निजी प्रबंधन वाले चार्टर स्कूल जोकि शिक्षा विभाग द्वारा न चलाए जाने के बावजूद भी तकनीकी रूप से सार्वजनिक स्कूल थे, 1980 तक शिक्षा के निजीकरण के सूक्ष्म तरीके के उदाहरण के तौर पर दिखाई दिए।

1980 में सार्वजनिक शिक्षा के विरुद्धकॉरपोरेट हितों का पैरोकार एक शक्तिशाली रूढि़वादी राजनीतिक गठबंधन खड़ा किया गया। रोनाल्ड रीगन ने कार्टर प्रशासन के दौरान कैबिनेट स्तर पर गठित यूएस सार्वजनिक विभाग को समाप्त करने की इच्छा बार-बार जताते हुए वाउचर शिक्षा के लिए जोर लगाया। रीगन ने शिक्षा पर एक राष्ट्रीय आयोग गठित किया जिसने ए नेशन एट रिस्क’ शीर्षक वाली अपनी रिपोर्ट1983 में रखी। जिसका सार था कि यूएस शिक्षा व्यवस्था अपने स्वयं के अंतर्विरोधों के कारण असफल हो रही है। (धीमे आर्थिक विकास,बढ़ती हुई असमानता और गरीबी का इसमें कोई जिक्र नहीं था।) अ नेशन एट रिस्क’ के अनुसार ‘‘यदि किसी गैरहितैषी शक्ति ने अमेरिका में मौजूद वर्तमान औसत दर्जे की शिक्षण प्रणाली को थोपा होता तो हम इसे आसानी से एक युद्ध से जुड़ा हुआ कृत्य मान लेते। यह मौजूद है क्योंकि हमने इसे होने दिया है। हम वास्तव में विचारहीनएकांगी शैक्षिक निरस्त्रीकरण का कृत्य कर रहे हैं।’’
          
बड़े शीतयुद्ध सैन्य ढांचे की शुरूआत करने वाले रीगन प्रशासन ने अमीरों और निगमों को करों में छूट देते हुएस्कूलों को मिलने वाली संघीय मदद की कटौती कोआसमान छूते हुए संघीय घाटे की लफ्फाजी के आधार पर सही ठहराया। इस कटौती में कम आय वाले विभागों को स्कूलों के लिए मिलने वाली मदद में 50 प्रतिशत कटौती भी सम्मिलित थी। 1980 के दशक अंत और 90 की शुरूआत में नाटकीय रूप से कठोर मानकउत्तरदायित्व और मूल्यांकन प्रणाली की ओर एकाएक बदलाव देखा गया जिनका अनुसरण केनटुकी और टैक्सास जैसे राज्यों में (बाद में गवर्नर जार्ज डब्लू बुश के अधीन) जबरन किया गया। जार्ज एच डब्लू बुश और क्लिंटन प्रशासन के दौरान शिक्षा सुधारों की यही दिशा रही और जार्ज डब्लू बुश के राष्ट्रपति काल में यह प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के रूपांतरण के लिए विभाजक रेखा के रूप में स्थापित हो गई।
     
2001 में शपथग्रहण के तीन दिन के बाद ही बुश ने अपने एनसीबीएल कार्यक्रम को जाहिर किया। जनवरी 2002 को पास एनसीएलबी विधेयक सैकड़ों पेजों का है पर अवधारणागत् रूप में इसके सात मुख्य अवयव हैंः (1) प्रत्येक राज्य को अपने मूल्यांकन और प्रदर्शन के तीन स्तर (बुनियादीप्रवीणता और आधुनिक) विकसित करने थे। जिसमें राज्यों को प्रवीणता के अपने मानक तय करने थे। (2) संघीय शिक्षा निधि को प्राप्त करने के लिए राज्यों को छात्रों का वार्षिक मूल्यांकन उनके वाचन और गणित में प्रवीणता के आधार पर तीन से आठ ग्रेड तक करना था और हासिल किए गए अंकों को निम्न आर्थिक स्तरनस्लनृजातीयताविकलांगता स्तर और अंग्रेजी की कम कुशलता के आधार पर विभाजित करना था। (3) प्रत्येक राज्य को एक समयरेखा देनी थी जिससे यह दिखाया जाय कि 2014 तक उसके 100फीसदी छात्र कुशलता को प्राप्त कर लें। (4) सभी स्कूलों और विद्यालयी विभागों को प्रत्येक विभाजित उपसमूह में 2014 तक सौ प्रतिशत कुशलता प्राप्त करने संबंधी पर्याप्त वार्षिक प्रगति (एवाईपी) को प्रदर्षित करने के आदेश दिए गए। (5) जो विद्यालय सभी उपसमूहों के लिए पर्याप्त वार्षिक प्रगति प्राप्त नहीं कर पाएंगे उन पर आगामी प्रत्येक वर्ष में भारी दंड लगाया जाएगा। चौथे वर्ष में स्कूल में सुधार के कदम उठाए जाएंगे जिसके तहत पाठ्यक्रम परिवर्तनस्टाफ परिवर्तन या सत्रावधि में वृद्धि की जाएगी। यदि स्कूल अब भी पर्याप्त वार्षिक प्रगति नहीं दे पाए तो पांचवे साल में उसे पुनर्गठित किया जाएगा। (6) पुनर्गठित किए जाने वाले स्कूल को पांच विकल्प दिए जाएंगे जिनका परिणाम अनिवार्य रूप से एक ही होगाः (ए) स्कूल को चार्टर स्कूल में बदल दिया जाएगा। (बी) प्रधानाचार्य और स्टाफ को बदल दिया जाएगा (सी) स्कूल का प्रबंधन निजी हाथों में दे दिया जाएगा। (डी) राज्य स्कूल का नियंत्रण छोड़ देगा (ई) विद्यालयी प्रशासन का व्यापक पुनर्गठन (अधिकांश स्कूल और स्कूली विभाग अपेक्षाकृत कम सुनिष्चित विकल्प होने के कारण आखिरी विकल्प को चुनने के लिए बाध्य थे ताकि अन्य विकल्पों को टाला जा सके।) (7) प्रत्येक राज्य को नेशनल एसेसमेंट ऑफ़ एजूकेशनल प्रोग्रेस नामक एक संघीय परीक्षा में प्रतिभाग करना था जो वैसे तो स्कूल और स्कूली विभागों पर कोई प्रभाव नहीं डालती थी परंतु राज्य की मूल्यांकन प्रणाली में बाहरी नियंत्रण के लिए बनाई गई थी।

एनसीएलबी के तहत पुनर्गठन का दबाव झेलने वाले स्कूलों की संख्या साल दर साल बढ़ती गई। 2007-08 में देश भर में पैंतीस हजार स्कूल पुनर्गठन की प्रक्रिया या योजना स्थिति में लाए गए। यह पिछले साल की तुलना में सीधे 50 फीसदी ज्यादा था। 2010 में संयुक्त राज्य में कई स्कूल एनसीएलबी के नियमों के तहत एवाईपी बनाने में असफल रहे और इनकी संख्या पिछले वर्ष के 33 प्रतिशत की तुलना में 38 प्रतिशत जा पहुंची।

एनसीएलबी ने स्कूलों और अध्यापकों पर नए भार और अपेक्षाओं को तो बढ़ाया लेकिन यूएस सरकार द्वारा प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर खर्च होने वाले जीडीपी के प्रतिशत को नहीं बढ़ाया गया। यह खर्च 1990 के दशक में बढ़ाया गया था। 2001 में एनसीएलबी की ठीक शुरूआत के समय यह खर्च बढ़ते हुए जीडीपी का 4.2 प्रतिशत पहुंचा जो कि इसका अधिकतम था। यह खर्च एनसीएलबी के बाद के वर्षों में केवल घटता ही गया और 2006 में 4.0 तक पहुंच गया जो कि 1975 के खर्च के बराबर था।

एनसीएलबी विधेयक बिना बजट का आबंटन किए एक ऐसी व्यवस्था थोपता है जिसमें राज्य द्वारा संचालित सार्वजनिक स्कूल बिना संसाधनों के बड़ी अतिरिक्त लागत को झेलने के लिए विवश होते हैं। बाउल्डरकॉलरेडो में स्थित नेशनल ऐजूकेशन पालिसी सेंटर के प्रबंध निदेशक और वरमान्ट में स्कूलों के पूर्व अधीक्षक विलियम मैथिस’ ने यह आंकलन किया कि एनसीएलबी के के-12 शिक्षा के राष्ट्रीय बजट में अभी के मुकाबले 20-30 फीसदी की बढ़ोत्तरी करनी होगी। लेकिन शिक्षानिधि के मामूली तौर पर बढ़ने के बजाय यह या तो स्थिर रही या और भी गिरी और यह बात जीडीपी के प्रतिशत और नागरिक सरकार के खर्च दोनों में देखी गई।

राज्य संचालित बड़े शहरी स्कूलों में से न्यूयार्क शहर के मेयर माइकल ब्लूमबर्ग स्कूल’ में एनसीएलबी शैली से किया गया सुधार सर्वाधिक चर्चित रहा। अरबपति ब्लूमबर्ग अपने 18 अरब डालरों के साथ 2011 के संयुक्त राज्य में व्यक्तिगत् धनाड्यों की सूची में तेरहवें स्थान पर है। इन्होंने यह अरबों डालर वित्तीय समाचार मीडिया के साम्राज्य के विकास से ब्लूमबर्ग एलपी’ के जरिए से कमाया। अपनी प्रचार अभियान सामग्री में ब्लूमबर्ग ने घोषणा की कि स्कूल आपातकाल की स्थिति’ में हैं। मेयर के अपने चुनाव के दौरान उसने तेजी से के-12 शिक्षा को कॉरपोरेट वित्तीय दिशा की ओर बदलने की बात कही। वाचन और गणित की परीक्षाओं में अंक प्राप्ति की ओर मुख्य जोर था जब्कि पाठ्यक्रम के अन्य विषयों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया। असफल रहे सार्वजनिक स्कूलों को चार्टर स्कूलों में तब्दील कर दिया गया। हालांकि ब्लूमबर्ग के स्कूलों के पुनर्गठन और निजीकरण के बावजूद संघीय एनएईपी परिक्षा से पता चलता है कि न्यूयार्क शहर में 2003 से 2007 के दौरान वाचन या गणित में कोई महत्वपूर्ण सफलता नहीं हासिल हुई।\             

साहसपूर्ण परोपकार और मूल्य-वर्धित शिक्षा

ब्लूमबर्ग अकेला अरबपति नहीं था जिसे स्कूलों के सुधारों ने आकर्षित किया। वित्त और सूचना पूंजी के एकाधिकार की 21वीं सदी में उच्च कॉरपोरेट हलकों में यह विशवास पैदा हुआ है कि अब शिक्षा का वैज्ञानिक तकनीकी और वित्तीय क्षेत्रों के समान ही पूरी तरह से प्रबंधन किया जा सकता हैजिससे (1) शिक्षकों की श्रम प्रक्रिया का नियंत्रण (2) अधिक विभेदित और एकरस श्रमशक्ति के निर्माण के लिए अधीनस्थ शिक्षा और (3) सार्वजनिक शिक्षा का निजीकरण (जहां तक बिना गंभीर प्रतिरोधों के हो सके) संभव हो जाएगा। डिजिटल युग में नौकरशाहीकरणट्रैकिंग और परीक्षण पहले की तुलना में अधिक आसान हो गए थे। शिक्षण की श्रमप्रक्रिया का केंद्रीकरण ही इस प्रक्रिया का मकसद था ताकि शिक्षा विज्ञान को लागू करने का तरीका क्लासिक वैज्ञानिक प्रबंधन की तरह शिक्षकों से छीनकर उच्चाधिकारियों को सौंप दिया जाय।

सार्वजनिक स्कूलों को शिक्षकों के बजाय तकनीक पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया गया यह उस टेलरवादी योजना के नए संस्करण के अनुरूप था जिसमें शिक्षकों को तेजतर्रार मषीनों के उपांगों के रूप में देखा गया था। 

वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित शिक्षा का जो स्वप्न 20 वीं सदी में पूरी तरह हकीकत में नहीं बदल सका अंततः 21वीं सदी के डिजीटल पूंजीवाद में पहुंच के भीतर लग रहा था। जार्ज एच डब्लू बुश प्रशासन में सहायक शिक्षा सचिव रहे डिआन रेविच कहते हैं ‘‘तकनीकी विकास के चलते यह संभव हुआ है कि कई राज्य और जिले विशिष्ट छात्र के अंक और उससे संबंधित अध्यापक की जानकारी रख सकें और इसके आधार पर शिक्षक को छात्र की उन्नति और अवनति के लिए जवाबदेह बना सकें।’’ नए रूढि़वादी शिक्षा सुधार आंदोलन का मुख्य नारा मूल्यवर्धित शिक्षा था और छात्रों में वर्धित मूल्य के आधार पर शिक्षकों की क्षमता का मूल्यांकन और इसी गुण के आधार पर उनको भुगतान होना था। इस तरह मूल्यवर्धनपूंजी के विकास के लिए छद्म रूप में परीक्षा में अंक बढ़ाने से अधिक कुछ नहीं था।   

इक्कीसवीं सदी के कॉरपोरेट स्कूल सुधार आंदोलन का नेतृत्व, जिसने सरकार की भूमिका को हाशिये पर धकेल दियाचार बड़े परोपकारी फाउंडेशनों से आया जो एकाधिकारी वित्तीय सूचना और खुदरा पूंजी के मुख्य प्रतिनिधि थे। ये चार फाउंडेशन हैंः (1) द बिल एंड मैलिंडा गेट्स फाउंडेशन (2) द वैल्टन फैमिली फाउंडेशन (3) द एली एंड एडिटी ब्राड फाउंडेशन और (4) द माइकल एंड सुसैन डैल फाउंडेशन। ये नए किस्म के फाउंडेशन हैं जिन्हें वैंचर परोपकार’ (ये नाम वैंचर कैपिटलिज्म से लिया गया है।) का नाम दिया गया और ‘‘परोपकारी पूंजीवाद‘‘भी कहा गया।  परोपकारी पूंजीवाद को उनकी आक्रामक निवेश केंद्रित तौर तरीकों के आधार पर पहले के फाउंडेशनों से अलग किया जाता है। पारंपरिक अनुदान से बचते हुए पैसे को सीधे चुने हुए प्रोजक्टों में डाला जाता है। एक मूल्यवर्धित कार्यप्रणाली अपनाई गई है जिसमें व्यापार के समान ही तुरंत परिणामों की अपेक्षा की जाती है। अपनी कर मुक्त स्थिति के बावजूद परोपकारी पूंजीवादी’ सरकारी नीतियों को सीधे प्रभावित करने के लिए व्यग्र दिखाइ देते हैं।

माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स द्वारा बनाए गए द गेट्स फाउंडेशन’ की संपत्ति 2010 में 33 अरब अमेरीकी डालर थी जो कि वित्तीय पूंजीपति वारेन बफे से 30 अरब डालर के वार्षिक योगदान के साथ और बढ़ गई। 2008 में वॉलमार्ट स्टोर्स के मालिकों के वॉलटन फाउंडेशन के पास दो अरब डालर की संपत्ति थी। 1999 में अपने उद्यम सनअमेरीका (जो कि बाद में दिवालिया हुआ और जिसे 18 अरब डालर का बेलआउट पैकेज दिया गया) को बेचने वाले रियल एस्टेट वित्तीय अरबपति एली ब्राड द ब्राड फाउंडेशन के निदेशक हैं जिसकी 2008 में कुल संपत्ति 1.4 अरब डालर है। जबकि डैल के संस्थापक और सीईओ माइकल डैल के द माइकल एंड सुसैन डैल फाउंडेशन की संपत्ति 2006में लगभग एक अरब डालर से अधिक थी।   

डैल फाउंडेशन के क्रियाकलाप डैल (कंपनी) की गतिविधियों से जुड़ी हुई रही जो कि सार्वजनिक स्कूलों को बाजार के तौर पर देखने वाली तकनीक आधारित कंपनियों में से प्रमुख है। डैल फाउंडेशन तीन अन्य परोपकारी पूंजीवादी संगठनों के साथ साथ ही काम करता है (गेट्स और बोर्ड फाउंडेशन इसके बड़े दानदाता हैं)। यह प्रदर्शन के प्रबंधन पर विशेष जोर देता है। जोकि सूचना तकनीकी को स्कूलों में जवाबदेही का आधार बनाने पर केंद्रित है।

यह सीधे तौर पर शिक्षा बाजार के डैल के अपने आर्थिक हितों से जुड़ा हुआ है। क्योंकि डैलएप्पल के बाद के-12 स्कूलों में तकनीकी हार्डवेयर सुविधाएं मुहैया कराने वाली दूसरी कंपनी है। द डैल फाउंडेशन दावा करता है कि वो स्कूल के बेहतर प्रबंधन के लिए शहरी स्कूलों कीसूचना के एकत्रीकरण विश्लेषण और प्रतिवेदन में तकनीक के इस्तेमाल में मदद कर रहा है।

यह चार्टर स्कूलों में लाभ आधारित शिक्षा प्रबंधन संगठनों और चार्टर स्कूलों के रियल एस्टेट डेवलेपमेंट का बड़ा समर्थक है।

शिक्षणेत्तर क्षेत्रों (जैसे व्यापारकानूनसेना आदि) से पेशेवरों की भर्ती करते हुए नवउदारवादी पूंजीवादी शिक्षा सुधार के लिए नए कैडर के प्रशिक्षण में ब्राड फाउंडेशन अव्वल है। इसका लक्ष्य उन्हें उस कैडर को स्कूल के उच्च प्रबंधन स्टाफ और स्कूल अधीक्षण में स्थान देना है। द ब्राड सेंटर फॉर द मेनेजमेंट ऑफ़ स्कूल सिस्टम्स के दो कार्यक्रम मुख्य हैः (1) द ब्राड सुपरिटेंडेंट्स ऐकेडमीजिसमें स्कूल सुपरिटेंडेंट्स को प्रशिक्षण दिया जाता है और बड़े शहरों में औहदे दिलाए जाते हैं। (2)द ब्राड रेजीडेंसी इन अर्बन एजूकेशन जो कि अपने स्नातकों को स्कूली विभागों में उच्च स्तरीय प्रबंधकीय औहदे दिलाने के लिए स्थापित की गई है। ब्राड फाउंडेशन अपने स्नातकों को वेतन की पेशकश करते हुए और इस तरह उन्हें कठिन दौर से गुजर रहे स्कूलों के लिए आकर्षक बनाते हुए ऐसी नियुक्तियों में तेजी लाता है और स्कूल बोर्डों को उच्च कारपोरेट की सेवाओं को लेने के अवसर देता है। ब्राड के स्नातकों की सेवाएं लेकर स्कूली विभाग ब्राड फाउंडेशन से अतिरिक्त धन लेने के लायक बन जाते हैं। ब्राड इंस्टिट्यूट फॉर स्कूल बोर्ड्स का मिशन स्कूल बोर्ड के देश भर से चुने हुए सदस्यों को पुनः प्रशिक्षण देकर उन्हें स्कूलों के कॉरपोरेट प्रबंधन मॉडल के अनुरूप ढालना है।

इसकी आधिकारिक वैबसाइट के अनुसार 2009 में ब्राड ऐकेडमी के स्नातकों द्वारा शहरी स्कूलों के अधीक्षक के पदों में से 43 फीसदी पर नियुक्ति पाई गई। द ब्राड फाउंडेशन शिक्षा के निजीकरण का कट्टर समर्थक है। विशेष रूप से इसकी दिलचस्पी शिक्षक संघों को तोड़ने,शिक्षकों के लिए योग्यता भुगतान की व्यवस्था स्थापित करने और सामान्यतया शिक्षा को गैरपेषेवर रूप देने में है ताकि इसे शुद्ध व्यावसायिक तौर पर श्रमशक्ति का सर्वहाराकरण करते हुए चलाया जा सके। 2009 में ऐली ब्राड ने न्यूयार्क में एक भाशण के दौरान कहाहम पढ़ाने के तरीके और पाठ्यक्रम अथवा इनमें से किसी के बारे में कुछ भी नहीं जानते। परंतु हम प्रबंधन और शासन के बारे में जानते हैं।
        
नाओमी क्लेन के शब्दों में कहें तो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का विध्वंस कर इसका निजीकरण करने की कोशिश द्वारा ब्रोड फाउन्डेशनझटका सिद्धांत’ को बढ़ावा दे रहा हैयह विनाशक पूंजीवाद’ का ही एक रूप है। अप्रैल 2009 में सिएटल एज्युकेशन ने कैसे जानें कि आपके स्कूल में ब्रोड वाइरस आ चुका है’ नाम से अपनी वेबसाइट पर अभिभावकों हेतु एक निर्देशिका प्रकाशित की। ब्रोड वाइरस के लक्षणों में से हैः

आपके जिले में अचानक स्कूल बंद होने लगते हैं... जिला अभिलेखों तथा वक्तव्यों में औपलब्ध्कि असफलता’ तथा औपलब्धिक असफलता की भरपाई’ जैसे मुहावरों का प्रयोग बढ़ जाता है... अचानक से बाहरी वैज्ञानिक सलाहकारों की आमद बढ़ जाती है। निजी चार्टर स्कूलों में बदले गए सार्वजनिक स्कूलों की संख्या बढ़ जाती है... गणित की सरल किताब लागू की जाती है... शायद भाषा की भी सरल किताब लागू की जाए... जिला प्रशासन घोषित करता है कि जिले की इकलौती समस्या शिक्षक हैं। आपके बच्चों पर तरह-तरह की परीक्षाएं लाद दी जाती हैं... आपके स्कूल की परिषद स्टॉकहोम सिन्ड्रोम के लक्षण दिखाने लगती है। वे एक राय से सुपरिन्टेंडेंट के पीछे-पीछे मतदान करने लगते हैं। सुपरिंटेंडेंट तथा उसकी रणनीतिक योजना के लिए ब्रोड तथा गेट्स फाउन्डेशन की ओर से मदद आने लगती है। गेट्स फाउन्डेशन आपके जिले की तकनीकी सामग्री या चार्टर स्कूलों में शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने हेतु इमदाद मुहैया करवाती है।

वॉलमार्ट कॉरपोरेशन ने अपना धंधा श्रमिकों को कम वेतन देकर फैलाया है। यह यूनियनों की विद्वेषपूर्ण विरोधी है तथा इसने खुदरा क्षेत्र में खुद को एकाधिकारी शक्ति बना लिया है- वाल्टन फाउण्डेशन इसी के नज़रिये को अभिव्यक्त करती है। यह हर संभव तरीके से शिक्षा पर सार्वजनक क्षेत्र के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है। इसके तरीके हैं- शिक्षक संघों पर हमले करनानिजी चार्टरों को बढ़ावा देनास्कूल चयन इत्यादि। रेविच कहते हैं- ‘‘वाल्टन परिवार फाउण्डेशन के योगदान की समीक्षा करने पर जाहिर होता है कि यह परिवार सार्वजनिक क्षेत्र के विकल्प पैदा करनाउन्हें मज़बूत करना 
तथा उन विकल्पों को बढ़ावा देना चाहता है। उनका एजेन्डा है चुनावप्रतिस्पर्ध और निजीकरण।

साभार-पत्रकार praxis 


...अगली क़िस्त में जारी

Tuesday, 22 October 2013

नन्दी की पीठ का कूबड़

(गाँव केवार्षिक मेले काअवसर है। उसमें जानवरों की खरीद-फरोख्त का अच्छा कारोबार होगा। गाँव के मुखियाका बेटा रामसुबह-सुबह अपने नन्दी बैल को चराने ले जाता है। शाम को नन्दी जानवरों की जलूस की अगुवाई करेगा। जंगल के एक छोर पर तालाब है। धीरे-धीरे वहाँ बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे राम के बहुत से मित्र इकट्ठे हो जाते हैं। वे सभी एक सवाल काजवाब खोजने की कोशिश करते हैं - भारतीय बैलों के पीठ पर कूबड़ क्यों होता है?)

रामः नन्दी! यह बताओ कि बैलों की पीठ पर ही कूबड़ क्यों होता है? जरा भैंस को देखो। औरउधर घोड़े को देखो। उनकी पीठ तोएकदम चपटी है।
भी राम काकुत्ता मोती दौड़ताऔर हाँफता हुआआया। मोती ने कहा, ‘भौंभौं! क्या तुम्हें पता है - जब मैं बिल्ली को पकड़ने दौड़ता हूँ तो वो अपनी पीठमेहराब जैसे ऊपर उठाती है। नन्दी की पीठ के साथ भी शायद यही हुआ होगा। उसे किसी ने डराया होगा।’ उसके बाद मोती और नन्दी पानी पीने चले गए।
टर! टर! टर!’ मेंढक पानी से कूदते हुए टर्राया। हमारे बहादुर नन्दी को डरानाकाफी मुश्किल काम है। कुछ दिन पहले शेर ने पूरा दम लगाया फिर भी उसे भगा नहींपाया। अब सब देखो - मैं कैसे फूलकर कुप्पा होता हूँ। मुझे लगता है कि नन्दी ने मेरी तरह ही अपने कूबड़ में हवा भर ली होगी।
यह सुनकर बूढ़ा नाग, पीपल के पेड़ की जड़ के बिल में से बाहर निकला। हिस! हिस! उसने फुँफकारते हुए कहा, हवा से सिर्फ छाती भरती हैपीठ नहीं। मैंने एक बारमोटा चूहा निगला और फिर मैं पूरे हफ्ते सोता रहा। तब मेरा शरीर भी बीच में फूलगया था। नन्दी ने भी जरूर कोई मोटी चीज निगली होगी।
हा! हा! हा!’ भालू चीखते हुए जंगल में से बाहर आया। नन्दी हमेशा छोटी-छोटी चीजें ही खाता है। तुम्हें क्या लगता है-  उसने एक बड़ा कद्दू निगला है? पिछले साल मैंने मधुमक्खियों के छत्ते से शहद चुराया था। उसके बाद मधुमक्खियों ने मुझे जम करकाटा। उससे मेरा चेहरा एक तरफ बुरी तरह से फूल गया। मुझे लगता है कि हमारे नन्दी को भी किसी ने काटा होगा।
इसी बीच बंदर भी पीपल के पेड़ से कूदता हुआ नीचे आया। खों! खों! खों! देखो इस पेड़ के फल खाने के बाद मेरे नीचे के गाल किस तरह फूल जाते हैं। नन्दी घास चरता है। उसने जरूर उस घास को अपने कूबड़ में उसे छिपाया होगा। छिपी घास को ही वो बाद में धीरे-धीरे करके चबायेगा। देखो वो कैसे घास की जुगाली कर रहा है?’
तुम आखिर एक लालची बंदर की तरह ही बोले,’ राम ने कहा। देखोनन्दी का कूबड़ हमेशा एक-जैसा ही रहता है। फल खाने के बाद तुम्हारे गाल एकदम पिचक जाते हैं। पर नन्दी का कूबड़ बिल्कुल एक-समान ही रहता है।
नन्दी ने कहा, ‘मुझे लगता था कि जिस प्रकार सभी बैलों के सींग होते हैं वैसे हीसभी बैलों का कूबड़ भी होता होगा। कल मुझे जिला स्तरीय प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कारमिला। वहाँ पर यूरोप से लाये कुछ बैल भी थे। मुझे वो बैल कुछ अजीब लगे! उनके न तो सींग थे और उनकी पीठ भी एकदम चपटीसपाट थी। यूरोप के बैल एक-दूसरे सेफुसफुसाकर कह रहे थे, ‘जरा देखो उस कुबड़े बैल को, जिसे हला ईनाम मिला है! मुझे इस सबके पीछे मनुष्य की ही कारिस्तानी नजर आती है। पीठ में कूबड़ के कारण बैलपर हल का जुआ अच्छी तरह बैठता है। कूबड़ के कारण ही मैं हल और बैलगाड़ी कोबेहतर तरीके से खींच पाता हूँ। यूरोप के बैलों ने मुझे बताया - उनके देशों में जुताई के लिए पहले घोड़ों का उपयोग होता था। अब खेतों की जुताई मशीनों द्वारा की जाती है।
राम ने इससेअसहमति जतायीःइस पुस्तक के अनुसार भगवान शिव नन्दी की सवारीकरते हैं। भगवान ने नन्दी की पीठ पर कूबड़ इस लिए बनाया जिससे वो उसपर झुककर कुछआराम कर सकें। देखो, इस चित्र मेंभगवान कितनी आसानी से नन्दी पर सवारी कर रहे हैं। हमारे गाँव का कुलदेवता तो स्वयं यह पीपल का पेड़ है। चलो, अब पीपल के पेड़ से ही नन्दी के कूबड़ का कारण पूछते हैं।
बूढ़े पीपल के पेड़ ने उत्तर दियाः नन्दी ने सही ही कहा। मनुष्य ने बैलों कोअपने लिए बनाया है। इंसानों ने ही मोती जैसे कुत्ते बनाए हैं। इंसानों ने ही धान औरगेहूँ बनाया है। साथ-साथ, मनुष्य ने खुद को भी बनाया है।
रामः यह कैसे सम्भव है? हमारा नया घर पिछले वर्ष बना था। कई लोगों ने उसेमिलकर बनाया था। उसके लिए पेड़ों को काटा गया। फिर लट्ठों और तख्तों को लम्बाई मेंकाटा गया। इसके लिए कई लोगों को मेहनत करनी पड़ी। उसके बाद पूरे फ्रेम को कीलें ठोक कर जोड़ा गया। मैंने छत पर फूस बिछाने में अपने पिताजी की मदद की। परंतु हमने नन्दी को कैसे बनाया? वो छोटे बछड़े जैसा पैदा हुआ था और तभी से उसके पीठपर कूबड़ है। दो साल पहले मोती एकदम छोटा पिल्ला था। मैंने बस इतना ही किया। माँसे निगाह बचाकर अपनी थाली में से मोती को कुछ अपना खाना खिलाया। हमने तो मोती को कुत्ता नहीं बनाया। अनाज पैदा करने के लिए हमने खेत में सिर्फ बीज बोए। इससे, बस चार महीने में हमें उसी प्रकार का बहुत सारा और अनाज मिला। हमने तो वो अनाज नहीं बनाया।
पीपल का पेड़ः राम तुम एक बहुत होशियार लड़के हो। यही सीखने का अच्छातरीका है - बस प्रश्न पूछते रहो। तब तक प्रश्न पूछो जब तक तुम सच की जड़ तकनहीं पहुँचो। अब ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें वही बताने जा रहा हूँ जिसे मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। आज से हजारों साल पहले मनुष्य लगभग उसी तरह रहते थे जैसेआज तुम्हारा मित्र बंदर रहता है। वे भोजन और फलों के लिए पेड़ों पर चढ़ते। वो बेर और कुकुरमुत्ते तोड़ते। वे जमीन के अंदर से कंद खोदकर निकालते। मनुष्य बिल्कुलभालू की तरह ही शहद इकट्ठा करते। वे कभी-कभी भालू की तरह ही अपने पंजों सेमछलियों का शिकार करते। वे मांस के लिए अन्य जानवरों का शिकार करते। तब न तोआग थी, न हल और न ही घर और झोपडि़याँ। तब गाँव भी नहीं थे। फिर ग्राम देवताका सवाल ही पैदा नहीं होता है। लोग इधर-उधर से भोजन एकत्र कर अपना जीवन चलाते थे। परंतु अब लोग अपना भोजन उगाते हैं।
रामः पर अगर हम इस प्रकार जी सकते थे तो फिर हमने क्यों भोजन उगाया?देखो मेरे पिता और बड़ा भाई खेतों पर कितनी मेहनत करते हैं। क्या हम इतनी मेहनत किए बिना जिन्दा नहीं रह सकते?’
पीपल का पेड़ः हर समय पर्याप्त मात्रा में भोजन इकट्ठा करना सम्भव नहीं होता है। कभी-कभी सूखा पड़ता है जिससे नदी-नाले सूख जाते हैं। मछलियाँ मर जाती हैं।शिकारी जानवर दूर-दराज चले जाते हैं। फल भी नहीं मिलते हैं। एक बात और है - पूरे साल भर चीजें इकट्ठी करना सम्भव नहीं होता है। इंसान को भोजन इकट्ठा करके उसे संभाल-संजोकर रखना सीखना पड़ा। बारिश के बाद की फसल अक्सर बहुत अच्छी होती है। आप पूरे साल उस फसल का अनाज खा सकते हैं। अगर अधिक उपज होगी तो उससे ज्यादा लोग जीवित रह पायेंगे। मैं अपनी सबसे ऊपर की टहनी से पाँच बड़े गाँवोंको देख सकता हूँ। पुराने जमाने में इस पूरे इलाके में मुझे पाँच लोग भी नजर नहीं आते थे।
रामः ठीक है। पर लोगों ने मेरे मोती जैसे कुत्ते क्यों बनाए?’
पीपल का पेड़ः पुराने जमाने में शिकार के समय भेड़िये भी आदमियों की तरह शिकार का पीछा करते थे। यह देख मनुष्यों ने कुछ भेडि़यों के बच्चों को पाला। इनमें सेअधिकतर बड़े होकर दुबारा जंगली भेड़िये बने और चले गए। परंतु उनमें से कुछ मनुष्यों के साथ रहने लगे। वे लोगों के लिए शिकार का पीछा करने लगे। इसके बदले में लोग उन्हें बचा हुआ मांस और हड्डियाँ खाने को देते। इस प्रकार जंगली भेड़िये पालतू बने।अब हम उन्हें कुत्ते के नाम से जानते हैं।
रामः मुझे खुशी है कि लोगों ने ऐसा किया। अगर मोती नहीं होता तो मैं भला क्या करता? परंतु नन्दी की पीठ पर कूबड़ किस तरह आया? शायद वो शुरू से ही था। मुझे अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला।
पीपल का पेड़ः मनुष्यों के लिए जंगली हिरणों का लगातार पीछा करना काफीकठिन काम था। गाय-बैल भी जंगली जीव थे। परंतु वो धीमी गति से चलते थे। मनुष्यमांस के लिए उनका पीछा करते। कुछ समय बाद उन्होंने मोती की तरह ही कुछ गाय-बैल के बछड़ों को भी पालतू बनाया। इसके लिए उन्होंने सबसे तगड़े बछड़ों को चुना। उनमें से कुछ की पीठ पर छोटा कूबड़ था। कूबड़ के कारण लोगों को अधिक मांस मिलता था। इसके लिए वो लगातार कूबड़ वाले बछड़ों को चुनते रहे और उन्हें भरपेट खाने को देते रहे। इससे धीरे-धीरे कूबड़ बड़ा होने लगा। मनुष्यों को कूबड़ वाले गाय-बैलों को पालतू बनाना ज्यादा आसान लगा। गायें दूध देतीं। अब धीरे-धीरे लोग शिकार करने की बजाए गाय-बैल पालने लगे। इस तरह धीरे-धीरे नन्दी जैसेबड़े कूबड़ वाले बैलविकसित हुए।
रामः यह तो बहुत होशियारी की बात है। पर यह अनाज कैसे विकसित हुए?’
पीपल का पेड़ः सदियों पहले मैंने लोगों को भूख मिटाने के लिए पत्ते और घास के बीज खाते हुए देखा था। इसके अलावा खाने को कुछ और नहीं था। धीरे-धीरे उन्होंने सबसे मोटे बीजों को छाँट कर अलग किया। सभी घासें एक-जैसी नहीं होती हैं। लोगों ने पाया कि अच्छी घासें सबसे मुलायम और नर्म मिट्टी में ही अच्छी उगती हैं। मुलायम मिट्टी सभी जगह नहीं मिलती है। परंतु अगर कंद को एक नुकीली छड़ से खोदकर निकाला जाए तो अगले साल उस जगह पर अच्छी घास उगेगी। इसी कारण लोगों ने मोटी घास के बीजों को बोने के लिए जमीन में गड्ढे खोदने शुरू किए। लोग अगलीफसल के लिए हमेशा सबसे मोटे बीज ही बोते।
रामः हम अनाज के बीजों को तो इस तरह नहीं बोते हैं। हम हल से खेत जोतते हैं। लोगों ने हल का उपयोग करना कैसे सीखा?’
पीपल का पेड़ः से सीखने में उन्हें बहुत समय लगा। पहले उन्होंने नुकीली छड़ से जमीन की सतह को खुरचा। परंतु उससे कोई खास फायदा नहीं हुआ। वैसे, कच्चाअनाज खाने में बहुत अच्छा नहीं होता। इसके लिए इंसान ने आग की जानकारी हासिल की। शुरू में उन्हें जंगल की भीषण आग से डर लगता था। वे आग और जंगली जीवोंको देखकर डर से भागते थे। फिर उन्होंने खाना पकाना सीखा। वे आग से मिट्टी के बर्तनपका पाये। जमीन की गहरी जुताई के लिए उन्हें ऐसी चीज की जरूरत थी जो अधिकताकत से खींच सके। तब उन्होंने हल के टेढ़े फल को खींचने के लिए बैलों का इस्तेमालकरना शुरू किया। हल को खींचने के लिए मनुष्य को बड़े जानवरों की जरूरत थी।इसलिए उन्होंने जानवरों को मांस के लिए मारना बंद किया। इस प्रकार उन्हें नन्दी जैसेबढि़या और ताकतवर बैल मिले।
रामः जरा कल्पना करो मेरे नन्दी को मारने की! कितनी बेवकूफी की बात है। पर अभी आपने मनुष्य द्वारा खुद अपने निर्माण का जिक्र किया था।
पीपल का पेड़ः मैंने अभी तुम्हें बताया कि किस प्रकार मनुष्य को आग नेभयभीत करना बंद किया। शुरू में लोग आग को भगवान के रूप में पूजते थे। धीरे-धीरेइंसानों ने आग बनाना सीखी। इसके लिए उन्होंने दो सूखी लकडि़यों को आपस में रगड़ा।फिर उन्होंने मुझे और नन्दी को पूजना शुरू किया। हमने मनुष्य को भोजन दिया। मेरेफल अभी भी खाने योग्य हैं। परंतु अब लोगों को मेरे छोटे भाई अंजीर के फल ज्यादास्वादिष्ट लगते हैं। अंजीर आकार में बड़ी और मीठी होती हैं। वैसे अंजीर का पेड़ छोटाऔर कमजोर होता है। उसे अच्छी मिट्टी की जरूरत होती है। और साथ में ढेर पानी की भी। जंगल की सफाई, कटाई हुई। लेकिन मैं भाग्यवश बच गया। कई बार जंगल में आगलगी और मेरे परिवार के तमाम सदस्य मारे गए। मैं कई बार बाल-बाल बचा। लोगआज भी आग, नन्दी और मेरी पूजा करते हैं। पर अब यह पूजा-उपासना कम हो रही है। हमने मनुष्य को नहीं बनाया। मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ।
रामः फिर किसने बनाया?’
पीपल का पेड़ः वर्तमान मनुष्य को खुद उसने ही बनाया है। शुरू में वो छोटा औरबंदर जैसा अच्छा दोस्त था। परंतु वो निस्सहाय था। आग के बाद उसने धातुओं कोखोजा। पहले तांबा। फिर लोहा। उससे पहले मनुष्य ने पत्थरों के औजार बनाए। लोगों नेशिकार के लिए तीर-कमान बनाए। उन्होंने भोजन को संचित कर सुरक्षित रखने के लिए टोकरियाँ और चमड़े के थैले बनाए। मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल बनाए। इस प्रकार लोगों को अधिक भोजन मिल पाया। खेती-बाड़ी की कठिन मेहनत ने मनुष्य को बलवानबनाया। लोग अपने सिर पर भारी बोझ ढोने लगे। इस कारण लोग सीधे खड़े होकर चलने लगे। लोगों ने झोपडि़याँ और घर बनाये। वे कपड़े पहनने लगे। पुराने जमाने मेंकई बड़े-बूढ़े मनुष्य भी मेरी छाँव तले नंगे रहते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम बचपन मेंनंग-धड़ंग घूमते थे।
रामः गर्मी के दिनों में मुझे अभी भी कपड़े बिल्कुल नहीं सुहाते हैं। परंतु मेरी माँ मुझे नंग-धड़ंग दौड़ने से मना करती हैं। अब मुझे आप एक बात और बतायें। यहभगवान कब आये?’
पीपल का पेड़ः पहले लोगों ने चीजों के उगने के बारे में जाना। उन्होंने उगती चीजों को अपने उपयोग के लिए इकट्ठा किया। इससे लोगों को लगा कि सभी चीजों को कोई महान माता जन्म देती है। हम अभी भी कहते हैं, ‘पृथ्वी हमारी माता है।’ फिरइंसान ने इकट्ठी की गई चीजों से कहीं ज्यादा चीजें खुद बनाना सीखीं। तब उसने सोचा, ‘मुझे भी किसी ने बनाया होगा?’ तब इंसानों ने भगवान को जन्म दिया। लोगों ने कहा, ‘भगवान ने हर चीज बनायी है।’ परंतु मुझे असली सच पता है। मैं मनुष्य के सभी भगवानों से अधिक बूढ़ा हूँ। मैंने मनुष्य को स्वयं खुद का निर्माण करते हुए देखा है। उसे अभी इस काम को और आगे बढ़ाना है। वो कभी-कभी मनुष्य जाति के अन्य लोगों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार करता है।
अब शाम ढलने लगी थी। राम की माँ एक टोकरी में लाल फूल लेकर आयीं। उन्होंने टोकरी को तालाब के किनारे रखा। फिर उन्होंने बूढ़े पीपल के पेड़ के सामने झुककर उसका नमन किया। राम की मित्र मंडली वहाँ से खिसक ली। माँ ने कहा, राम,इधर आओ। जल्दी तैयार हो। आज रात को नन्दी को जलूस में सबसे आगे रहना है। तुम्हें पता है कि नन्दी अन्य गाय-बैलों से पहले पैदा हुआ था। चलो, नन्दी को घर ले चलकर उसे सजायें।