लोकसंवाद
अवाम से संवाद कायम करने की दिशा में एक प्रयास
Monday, 31 August 2020
भवानी प्रसाद
covid
भारत भर के ज्यादा से ज्यादा डॉक्टरों ने गंभीर रूप से बीमार कोविड-19 रोगियों के लिए, आमतौर पर प्लाज्मा थेरेपी के रूप में जाना जाने वाली सामान्य प्लाज्मा थेरेपी निर्धारित करना शुरू कर दिया है. प्लाज्मा एक ऐसे व्यक्ति से लिया जाता है जो बीमारी से उबर गया हो क्योंकि उसमें रोग से लड़ने वाला एंटीबॉडी होते हैं. फिर इसे उसी बीमारी से ग्रस्त रोगी में प्रत्यारोपित किया जाता है जिसकी अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडी का उत्पादन नहीं कर रही है. सैद्धांतिक रूप से इससे रोगी में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया शुरू हो जानी चाहिए. भले ही अतीत में अन्य संक्रामक रोगों के इलाज के लिए इस प्रणाली को एक चिकित्सा हस्तक्षेप के रूप में इस्तेमाल किया गया हो, लेकिन यह दर्शाने के लिए बहुत कम वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि यह कोविड-19 रोगियों की मदद करता है. भारत में प्लाज्मा उपचार प्रणाली के लिए अधिकांश नैदानिक परीक्षणों के परिणाम अभी तक जारी नहीं किए गए हैं, लेकिन चीन में एक प्रमुख परीक्षण से पता चला है कि प्लाज्मा उपचार प्रणाली का रोगियों पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा था.
चूंकि दुनिया को इस बीमारी के बारे में पता चले अभी महज आठ ही महीने हुए हैं, इसलिए डॉक्टर अपने मरीजों को जीवित रखने के लिए प्लाज्मा और कई अन्य दवाओं को प्रायोगिक उपकरणों के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.
साभार कारवां पत्रिका
Sunday, 12 November 2017
ज्ञान का महाकुंभ या कुछ और
आगे बढ़ने से पहले इसके द्वारा "ज्ञान" के प्रचार के पीछे जो पैसा टीवी चैनल वाले और प्रोग्राम के मेजबान कमा रहे हैं उसकी बात यहाँ नहीं करेंगे सिर्फ इसके द्वारा किये जा रहे प्रचार की बात ही करेंगे। इस प्रोग्राम के प्रशंसको की बातों को छोड़ देते हैं और कार्यक्रम के माध्यम से जिस तरह की बातों का अप्रत्यक्ष प्रचार मध्य वर्ग के लोगों में होता है उसकी थोड़ी संक्षिप्त चर्चा करते हैं। हर दिन की जिंदगी में टीवी-मनोरंचन-विलासिता में डूबे रहने वाले या एक सुखी जीवन के सपने देखने वाले मध्य-वर्ग के कई लोग मुख्य रूप से इस प्रोग्राम के प्रसंशक होते हैं। लोगों से सामान्य ज्ञान के सवाल पूँछकर हर सवाल के बदले में पैसे में बढ़ोत्तरी करने की जो रूपरेखा इस प्रोग्राम में तय की गई है और जिस तरह का पूरा प्रचार और माहौल इस शो के लिये तैयार किया जाता है वह अप्रत्यक्ष रूप से कई प्रकार से वर्तमान व्यवस्था के हित में एक काल्पनिक और झूठा विश्व दृश्टिकोंण लोगों के बीच स्थापित करने का काम करता हैं।
इसी क्रम में पहला सामान्य प्रचार जो इस प्रोग्राम के ताने-बाने के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में होता है वह है कि यदि आपके पास ज्ञान हो तो क्षरण-विघटन के शिकार सम्पत्ति केन्द्रित समाज में "पैसों" को बड़ी आसानी से एक कुर्सी (हाट सीट) पर बैठ कर सिर्फ सवालों का जबाव देकर कमाया जा सकता है। अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह के दृश्य और संवाद जिनमें अमिताभ बच्चन काफी प्रभावसाली ढंग से अपनी बात रखते हैं, और प्रत्याशी से सवाल करते हैं, वह वर्तमान समय की अमानवीय अंधी पूँजीवादी प्रतिस्पर्धा को सही सिद्ध करने का काम करते हैं, जिसका सामान्य असर लोगों के विचारों पर यह होता है कि जो लोग पैसे नहीं कमा पा रहे हैं, चाहे वे शारीरिक रूप से कितनी भी मेहनत करते हों, उन्हें बताया जाता है कि "ज्ञान" की कमीं के कारण वे इसी लायक हैं। मध्यवर्ग के कुछ असफल नौजवान भी इसके प्रभाव में हीन भावना से ग्रस्त देखे जा सकते हैं। यानि मध्यवर्ग के आम आदमी के दिमाग में यह बात गहरे स्तर तक बैठा दी जाती है कि यदि वह "ज्ञान" पाने के लिये मेहनत करे तो सफ़लता प्रप्त कर सकता है। इसलिये करोड़ों लोगों की बदहाली और बेरोजगारी का मुख्य कारण उनके पास "ज्ञान" का न होना है। यानि लोगों की सोच के दायरे को संकीर्ण तो किया ही जाता है, जो अपने आसपास से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था में अपनी स्थिति के बारे में कभी नहीं सोच पाता, कि पूरे समाज के मेहनत करने वाले लोग कुछ सम्पत्ति धारी लोगों के फायदे के लिये काम कर रहे हैं, साथ ही व्यवस्था के पक्ष में कुछ अवैज्ञानिक कूपमंडूक विचार भी उनके दिमागों में भर दिये जाते हैं।
कई लोग इस प्रोग्राम में हिस्सा लोने के लिए सामान्य ज्ञान की तैयारी तक करते हैं, और जो प्रत्याशी कुछ जीत कर जाते हैं उनको भी प्रोत्साहित किया जाता है कि वे अपने "ज्ञान" प्रप्त करने की कड़ी मेहनत का हवाला दर्शकों के सामने देकर ही जाएँ। कुछ माता-पिता जीतने वाले "ज्ञानी" व्यक्ति की तारीफ करके अपने बच्चों को भी पैसे कमाने के लिए ज्ञान प्रप्त करने का उत्साहन देते हैं। कुछ बच्चे खुद ही इतने मोटिवेट हो जाते हैं कि वह सफलता (यानि कि पैसा) पाने के लिए अपने "ज्ञान" को बढ़ाने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार ऐसे प्रोग्राम लोगों के सामने सम्पत्ति केन्द्रित व्यवस्था की अराजकता और इसमें हो रहे करोड़ों लोगों के शोषण और उनके साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार की सच्चाई को जनता की नज़रों से छुपाने का काम बखूबी निभाते हैं। और हर व्यक्ति को वर्तमान अमानवीय व्यवस्था में आजीविका कमाने के लिये मची प्रत्स्पर्धा की अन्धी दौड़ में सफलता पाने के लिये झपट पड़ने की सलाह देता है। इनके माध्यम सलोगों के सामने सिद्ध किया जाता है कि इस व्यवस्था में कोई गलती नहीं है, बल्कि मुख्य दोष गरीब लोगों में "ज्ञान" की कमी का है, जिसके कारण वे गरीब हैं। इस प्रकार यह प्रोग्राम समाज में मौज़ूद वर्गों की मानवद्रोही ऐतिहासिक सच्चाई को लोगों की नज़रों में धूमिल करने के साथ एक संदेश यह भी देता हैं जो लोग आराम से विलासिता का जीवन जी रहे हैं वे अपने ज्ञान के बल पर सफल होने के कारण ऐसा कर पा रहे हैं।
इसका एक और मैसेज लोगों के बीच यह भी पहुँचता है कि ज्ञान प्रप्त करने का मुख्य उद्धेश्य समाज के लिये किसी वैज्ञानिक कार्य या अनुसंधान या किसी टेक्नोलोजी का विकास नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंदर अपने ज्ञान के बूते पर प्रतिस्पर्धा में सफल होकर अपने लिये कुछ हासिल करना होना चाहिये।
इन सभी मानव-द्रोही दृश्टिकोंणों का प्रचार मध्य वर्ग के आम लोगों और कई सिविल सर्विस, इंजीन्यरिंग या किसी अन्य प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले उन नौजवानो को काफ़ी प्रोत्साहित करता है जो विज्ञान, टेक्नोलाजी, डाक्टरी, और यहां तक कि सिविल सर्विस की तैयारी तक अपना कैरियर बनाने की मनोवृत्ति से करते हैं, जिनके लिये समाज की सर्विस करना कोई मायने नहीं रखता और जिनका उद्धेश्य सिर्फ एक व्यक्तिवादी सामाजिक पोजीसन और पैसा कमाना होता है। यह व्यक्तिवादी, समाज-द्रोही नैतिक मूल्य मध्य-वर्ग के खाये अघाये और मंदिरों-मस्जिदों में दीन पुण्य करने वाले लोगों के लिये ईश्वरीय प्रवचनों से कम नहीं होते हैं। वास्तव में यह मूल्य 1791 में हुई फ्रांसीसी क्रांति के उन पूँजीवादी मूल्यों से भी कोई मेल नहीं रखते जहाँ समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व का नारा दिया गया था। और आज कल के यह पैसा कमाने के नैतिकता के प्रचार करने वाले मूल्य वास्तव में उन नैतिक मूल्यों से भी कोसों दूर हैं जो हमारे बचपन में नैतिक शिक्षा और पौराणिक कथाओं या धार्मिक ग्रन्थों में दिये जाते थे। वैसे आजकल जिस प्रकार का लूट-मार पूरी दुनिया की प्रतिक्रियावादी पूँजीवादी साम्राज्यवादी ताकतों ने मचा रही है उसमें इसी प्रकार के मूल्यो का प्रचार संभव है और व्यवस्था की आवश्यकता भी है। और इसमे 1791 में उठाये गये उन मानवतावादी मूल्यों की भी अपेक्षा नहीं की जा सकती जिसमे हर व्यक्ति के लिए समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व का नारा दिया गया था। वैसे सम्पत्ति आधारित समाज में यह संभव भी नहीं है कि मेनस्ट्रीम मीडिया, जो स्वयं पैसे वालों का भोपू है वह प्रगतिशील विचारों का प्रचार लोगों के बीच करेगा।
कुछ लोग कहेंगे कि यह मनगढ़ंत बाते हैं, लेकिन वास्तव में इन सभी मूल्यों का संप्रेषण करने के लिये प्रोग्राम में किसी संवाद या किसी दृश्य की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह प्रोग्राम देखने वाले व्यक्ति के स्वयं के विचारों के माध्यम से इस तरह का पूरा ताना बाना उसके सामने खड़ा कर देता है। नहीं तो ज्ञान के बदले में एक करोड़ का उपहार देकर आम लोगों के सामने क्या उदाहरण प्रत्तुत किया जा सकता है, यह इन सच्चाई को "मनगढ़ंत" कहने वाले लोगों से पूँछना चाहिये।
अब, इन मूल्यों के बीच पल रहे लोगों की बात करें तो पूरी व्यवस्था एक ओर इस तरह के मानवताद्रोही कूपमंडूक विचारों का प्रचार करके लोगों को प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे का दुश्मन और उसके विचारों के दायरे को सिकोड़कर पैसा कमाने की व्यक्तिवादी सोच तक सीमित करती है, और जब यही लोग भष्मासुर की तरह पैसा कमाने के लिये भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और सामाजिक व्यवस्था की जड़ों को खोदने लगते हैं तो पूँजीवाद के नीति-निर्माता, सामाजिक कार्यकर्ता और ए.जी.ओ. पंथी हाय तौबा मचाते-फिरते हैं, कि हमें इस व्यवस्था को साफ सुथरे लोगों की ज़रूरत है, सभी को एकजुट होकर खड़े होना चाहिए। और मजे की बात तो यह है कि यह लोग मध्यवर्ग के उन्हीं लोगों को साथ लेकर सफाई करने का सपना देखते हैं और कुछ नैतिकता की नसीहते देते हुए दिखते हैं, जो स्वयं किसी मौके की तलास में रहते हैं कि कैसे ज़्यादा सफ़ल बना जाये और कैसे करोड़ों रुपया किसी तरह कहीं से बिना काम के सिर्फ "ज्ञान" की बदौलत मिल जाये।
इस प्रकार के प्रोग्रामों का खूब प्रचार किया जाता है और मध्यवर्ग के लोगों में खूब सफलता इन्हें मिलती है। ऐसी परिस्थितियों में भेंड़चाल की मनोवृत्ति पैदा करने के लिये जिस तरह से लगातार प्रयास किये जा रहे हैं, उसके बीच कुछ संभावना संप्पन्न प्रगतिशील नौजवानो को समाज को परिवर्तन की दिशा में आगे ले जाने के लिये, और रूढ़िवादी विचारधारा का विरोध करने के लिए हमें विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है। वैसे यह व्यवस्था स्वयं ही अपने भष्मासुर इन व्यक्तिवादी लोगों के रूप में पैदा कर रही है जिनके खुले मानवद्रोही काम सभी के सामने पूरी व्यवस्था की पोल ख़ुद ही खोल देते हैं। और मंदी के माहौल में महंगाई, बेरोज़गारी और भविष्य कीअनिश्तचतता के बीच नौजवानों को स्वयं ही इस व्यवस्था का विकल्प तलासने की इच्छा पैदा कर देती है।
साभार :-स्पार्क आफ चेंज ब्लाग
Friday, 15 August 2014
बाबा नागार्जुन
बाबा नागार्जुन के शब्दों में आज़ादी
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला
जहां भी टिकट मिला
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्बीस
उसीका पन्द्रह अगस्त है
बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है…
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है?
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है!
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!
पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है
ग़रीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है
धत् तेरी, धत् तेरी, कुच्छों नहीं! कुच्छों नहीं
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है
कुच्छों नहीं, कुच्छों नहीं…
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है!
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है…
Tuesday, 26 November 2013
रियलिटी शो की रियलिटी
एक समय था जब टेलीविजन पर मनोरंजन के नाम समाचार,चित्रहार,और सप्ताह में एक फिल्म दिखाई जाती थी और रात को १० बजे टीबी के कार्यक्रम बंद हो जाते थे | लेकिन अब चौबीसों घंटे कार्यक्रम चलते रहते हैं और चैनलों की भरमार हो गयी है |१९८४ से १९९१ तक टेलीविजन पर लगभग ठीक- ठाक प्रोग्राम दिखाए गए | १९९१ के बाद टेलीविजन ड्राइंगरूम से बेडरूम में घुस गया और निजी जीवन में ताकझांक करने लगा | सच का सामना,राखी का स्वयंबर,इमोशनल अत्याचार,बिग बॉस जैसे रियलिटी शो प्रसारित होने लगे और दर्शक उपभोक्ता में तब्दील हो गए | कर्यक्रमो में विविधता का दौर शुरू हो गया और सब कुछ बाजार के द्वारा तय होने लगा,जिसके फलस्वरूप टेलीविजन के कार्यक्रमों से मूल्य और नैतिकता गायब हो गयी |
अब सवाल पैदा होता है कि रियालिटी शो में क्या सब कुछ रियल होता है ?और ये रियलिटी शो किस सन्दर्भ में रियल हैं ? प्रेमचंद,शरदचंद,राहुल व अन्य प्रगतिशील लेखकों ने अपनी रचनावो के माध्यम से समाज का जो वास्तविक चित्रण किया है ये शो क्या इसी तरह की वास्तविकता दिखाते हैं ? ये रियलिटी शो कोई भी वास्तविकता नहीं दिखाते बल्कि पैसे के लिए लालच ये सन्देश परोसते है | जब असल ज़िंदगी में रियल कुछ नहीं रह गया तो इन रियलिटी शो में क्या होगा |
एक अध्ययन के अनुसार रियलिटी शो में दिखाई जाने वाली कहानी और बिषयबस्तु का युवावों के मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है | वे ग्लैमर से भरी चकाचौंध दुनिया को हकीकत समझ बैठते हैं जबकि हकीकत में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,फलस्वरूप वे कुंथाग्रष्त हो जाते हैं | वयस्कों के बाद चैनल की टीआरपी बढ़ने के लिए अब बच्चों के लिए भी रियलिटी शो बनने लगे हैं , जो बच्चों से उनका बचपना छीन रहे हैं व उनको कुंठाग्रस्त और स्वार्थी बना रहे हैं |गरीबी के चलते गरीब जनता के बच्चे बालशोषण और बालमजदूरी का शिकार होते थे | लेकिन अब इन रियलिटी शो के जरिये सभ्रांत परिवारों के बच्चों का भी शोषण हो रहा है | रातों रात अमीर बनने की ललक के चलते बच्चे माँ-बाप की कुंठा व असफल माँ-बाप की सफलता की सीढ़ी बन रहे हैं |
रियलिटी शो के नाम पर बच्चों से भद्दा डांस,घिनौने संबाद, द्विअर्थी गाने गवाए जाते हैं क्या ये सही तरीका उनकी प्रतिभा को आकाने का ? इस छोटी सी उम्र में दुनिया के सामने उनकी रैगिंग की जाती है | बचपन में ही उन पर असफलता का तमगा लगा दिया जाता है,जिस बोझ के साथ उसे जिन्दगी जीनी होती है | देशभर में लाखों बच्चे इस शो में हिस्सा लेते हैं और जीतने वाले दस से ज्यादा नहीं होते हैं | देखा जय तो ये एक प्रकार का लाट्रीशो है | ये शो बालश्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए खूब चल रहे हैं | असफलता के डर के कारण इन बच्चों में अनेक प्रकार के मनोविकार पैदा हो जाते हैं | अचानक मिली सफलता को ये कभी-कभी पचा नहीं पाते एक दो साल तक ये ग्लैमर की दुनिया में जगमगाते हैं परन्तु कुछ समय बाद गुम हो जाते हैं | बच्चों को यहाँ लम्बी अवधी तक अलग रखा जाता है,दबाव और चिंता के माहौल में रहने व आराम की कमी के कारण इनमे अनिंद्रा आदि की कमी हो जाती है | शिशुरोग विशेषज्ञों के अनुसार शूटिंग के दौरान तेज रोशनी का सामना करना पड़ता है जिसका उनके शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | बच्चो को सजाने सवांरने के दौरान उनके चहरे पर जो कॉस्मेटिक लगाया जाता है उससे उनकी कोमल त्वचा को नुकसान होता है |
जितने भी रियलिटी शो द्ल्खाये जाते हैं उनमे अपशब्द,गन्दी राजनीतिव अन्य हत्कंडे अपनाकर खूब दर्शक बटोरे जाते हैं और चैनल की टीआरपी बढ़ायी जाति है | दूसरी तरफ देखें तो इन कार्यक्रमों के पीछे बाजार अपना काम करता रहता है | हुनरमंदों को हुनर सिखाने के प्रदर्शन का मंच मुहैया कराते, रियलिटी शो में हिस्सा लेने की तैयारियों के प्रशिक्षण के बाज़ार महानगरों से कस्बों तक फ़ैल रहे हैं | एक अनुमान के अनुसार बीते दस सालों में दस हजार से भी ज्यादा प्रशिक्षण केंद्र खुले हैं जहाँ रियलिटी शो के लिए संभावित प्रतियोगी तैयार किये जाती हैं |रियलिटी शो के पीछे एक बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो रहा है | एक तरफ शो में हिस्सा लेने बावत तैयारियों से जुड़े कोचिंग संस्थान हैं तो किताब ,सीडी से लेकर कई दूससे उत्पाद भी | रियलिटी शो को अपने कुल राजस्व का ३० से ४० प्रतिशत मोबाइल एसएमएस से मिल जाता है | महत्वपूर्ण प्रशन ये है कि इन शो के नाम पर सिर्फ कारोबार हो रहा है बाकी कच्छ नहीं |टेलीविजन चैनलों को कम मेहनत में विज्ञापनों के बाजार में बड़ा हिस्सा बटोरने के लिए ये शो मुफीद लगते हैं |
Sunday, 24 November 2013
पूँजी का संरचनात्मक संकट और शिक्षा
हम संरचनात्मक संकट के दौर में जी रहे हैं जो पूंजीवाद के एक चरण ‘वित्तीय पूंजी एकाधिकार’ के साथ जुड़ा है। इस चरण की विशेषता हैः (1) विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव (2) वित्तीयकरण की ओर नाटकीय रूख, उदाहरण के लिए आर्थिक विस्तार के लिए अटकलबाजियां (3) वैश्विक स्तर पर पूंजी का तेजी से संकेन्द्रण (और एकाधिकारिता).
पूंजीवादी शिक्षा का राजनीतिक अर्थशास्त्र
एकाधिकारवादी पूंजी और शिक्षा के कॉरपोरेट ढांचे का उदय-
कार्यकर्ताओं को, किए जाने वाले कार्य के लिए विस्तृत दिशा निर्देश, लक्षित मानक, प्रयुक्त क्रियाविधियों और प्रयोग किए जाने वाले उपकरण के विषय में पूरी तरह परिचित किया जाना चाहिए..... अध्यापकों को कार्य में मौज उड़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जब कोई ऐसी विधि मिल जाए जो कि अन्य से स्पष्ट रूप से बेहतर है तो ऐसी ही विधि को प्रयोग में लाना चाहिए। इस क्रियाविधि की अनदेखी करना और अपनी उदासीनता को अध्यापकों की स्वतंत्रता के नाम पर जायज ठहरना शायद शुरूआती अनुभववाद के दौर में उचित था जब सर्वेक्षक अध्यापकों को केवल पदोन्नत करते थे और वस्तुगत् तौर पर वे मानकों और विधियों के विषय में पद और फाइलों से थोड़ी ही अधिक जानकारी रखते थे।
(1) एक नियोक्ता के तौर पर राज्य को शिक्षकों के साथ सहयोग करना चाहिए क्योंकि शिक्षक हमेशा ही शिक्षा के विज्ञान को नहीं समझता है। (2) राज्य उन विशेषज्ञों को उपलब्ध कराए जो कि शिक्षकों का पर्यवेक्षण कर पाएं और सर्वाधिक कुशल और किफायती प्रक्रियांओं के बारे में सुझाव दें। (3) व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह की कार्य प्रणाली स्कूलों में भी अपनाई जाय जिसमें दिया गया कार्य निश्चित शर्तों के साथ पूरा किया जाय। (4) जो अध्यापक दिए गए कार्य को पूर्ण करे उसे बोनस दिया जाय जो कि पैसे के रूप में ना होकर एक रेटिंग के रूप में हो जो पैसे के रूप में बदला जा सके। (5) कार्य में अक्षम लोगों को निकाल दिया जाए।
प्रारंभिक कॉरपोरेट शिक्षा आंदोलन की असफलता
संगठनों और स्कूलों के तरीकों ने वाणिज्यिक उद्यमों का रूप ले लिया है जिनसे हमारा आर्थिक जीवन पहचाना जाता है। हमने ‘बड़े उद्योगपतियों’ के घमंड को स्वीकार लिया है, साथ ही उनके योग्यता के मानकों को भी बिना प्रश्न किए स्वीकारा है। हमने शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों के परिणाम का मानक ‘कीमत और उत्पाद’ के रूप में स्वीकार कर लिया है जैसे कि किसी फैक्ट्री या डिपार्टमेंट स्टोर में होता है। लेकिन चूंकि शिक्षा का वास्ता व्यक्तित्वों से है, इसलिए यह किसी मानकीकृत निर्माण प्रक्रिया की तरह नहीं है। शिक्षा की क्षमता को छात्रों के प्रति घंटे के वेतन के आधार पर नहीं बल्कि मानवतावाद, काम कर सकने और प्रोत्साहन करने को बढ़ाने की क्षमता के रूप में मापना चाहिए।
Wednesday, 23 October 2013
पूंजी का संरचनात्मक संकट और शिक्षा : यूएस परिघटना-पहली क़िस्त
| जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर |
(जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर मंथली रिव्यू के संपादक हैं। वे, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑरेगोन में समाजशास्त्र के प्रवक्ता और ‘द ग्रेट फाइनेंसियल क्राइसिस’(फ्रैड मैग्डोफ़ के साथ) के लेखक भी हैं। उक्त आलेख 11अप्रैल 2011 को फ्रैडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंटा कैटेरिना, फ्लोरिआनोपोलिस, ब्राजील में शिक्षा एवं मार्क्सवाद पर पांचवे ब्राजीलियन सम्मेलन (ईबीईएम) में उनके द्वारा दिए गए आधार वक्तव्य का विस्तार है। यह आलेख यहाँ पढ़ा जाना इसलिए भी मौंजू है कि आज का भारत भी बिलकुल उन्हीं प्रवृतियों के शुरूआती दौर में है जिनसे अमेरिका गुजरा है। सार्वजनिक/सरकारी शिक्षा प्रणाली तकरीबन बेकार घोषित की जा चुकी है. तमाम फाउन्डेशनों, एनजीओज ने यहाँ सुनहरा भविष्य देख भारत की 'शिक्षा व्यवस्था' को 'पटरी' पर लाने के लिए 'कमर कस' ली है. वे गाँव-गाँव, शहर-शहर में फ़ैल कर शिक्षा की नई अलख जगाने के उन्माद में हैं. इसी दौर में प्राइवेट प्लेयर्स ने स्कूलों और कॉलेजों का ऐसा जाल बिछाया है कि तकरीबन सारा मध्य वर्ग/निम्न मध्य वर्ग अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए इस जाल में बुरी तरह फंस गया है. फ़ॉस्टर ने अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था में ठीक इसी तरह की प्रवृत्तियों की तफसील से पड़ताल की है. अमेरिका में यह प्रव्रत्तियां उस चरम पर पहुँच गईं हैं जहाँ से इस समस्या की विकरालता साफ़ समझ आती है. भारत में अभी इस आलेख को पढ़ना, सचेत हो जाने के लिए जरूरी होगा. इस लम्बे आलेख को हम ४ किस्तों में यहाँ देंगे... )
हम संरचनात्मक संकट के दौर में जी रहे हैं जो पूंजीवाद के एक चरण ‘वित्तीय पूंजी एकाधिकार’ के साथ जुड़ा है। इस चरण की विशेषता हैः (1) विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव (2) वित्तीयकरण की ओर नाटकीय रूख, उदाहरण के लिए आर्थिक विस्तार के लिए अटकलबाजियां (3) वैश्विक स्तर पर पूंजी का तेजी से संकेन्द्रण (और एकाधिकारिता).
पूंजीवादी शिक्षा का राजनीतिक अर्थशास्त्र
एकाधिकारवादी पूंजी और शिक्षा के कॉरपोरेट ढांचे का उदय-
कार्यकर्ताओं को, किए जाने वाले कार्य के लिए विस्तृत दिशा निर्देश, लक्षित मानक, प्रयुक्त क्रियाविधियों और प्रयोग किए जाने वाले उपकरण के विषय में पूरी तरह परिचित किया जाना चाहिए..... अध्यापकों को कार्य में मौज उड़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जब कोई ऐसी विधि मिल जाए जो कि अन्य से स्पष्ट रूप से बेहतर है तो ऐसी ही विधि को प्रयोग में लाना चाहिए। इस क्रियाविधि की अनदेखी करना और अपनी उदासीनता को अध्यापकों की स्वतंत्रता के नाम पर जायज ठहरना शायद शुरूआती अनुभववाद के दौर में उचित था जब सर्वेक्षक अध्यापकों को केवल पदोन्नत करते थे और वस्तुगत् तौर पर वे मानकों और विधियों के विषय में पद और फाइलों से थोड़ी ही अधिक जानकारी रखते थे।
(1) एक नियोक्ता के तौर पर राज्य को शिक्षकों के साथ सहयोग करना चाहिए क्योंकि शिक्षक हमेशा ही शिक्षा के विज्ञान को नहीं समझता है। (2) राज्य उन विशेषज्ञों को उपलब्ध कराए जो कि शिक्षकों का पर्यवेक्षण कर पाएं और सर्वाधिक कुशल और किफायती प्रक्रियांओं के बारे में सुझाव दें। (3) व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह की कार्य प्रणाली स्कूलों में भी अपनाई जाय जिसमें दिया गया कार्य निश्चित शर्तों के साथ पूरा किया जाय। (4) जो अध्यापक दिए गए कार्य को पूर्ण करे उसे बोनस दिया जाय जो कि पैसे के रूप में ना होकर एक रेटिंग के रूप में हो जो पैसे के रूप में बदला जा सके। (5) कार्य में अक्षम लोगों को निकाल दिया जाए।
प्रारंभिक कॉरपोरेट शिक्षा आंदोलन की असफलता
संगठनों और स्कूलों के तरीकों ने वाणिज्यिक उद्यमों का रूप ले लिया है जिनसे हमारा आर्थिक जीवन पहचाना जाता है। हमने ‘बड़े उद्योगपतियों’ के घमंड को स्वीकार लिया है, साथ ही उनके योग्यता के मानकों को भी बिना प्रश्न किए स्वीकारा है। हमने शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों के परिणाम का मानक ‘कीमत और उत्पाद’ के रूप में स्वीकार कर लिया है जैसे कि किसी फैक्ट्री या डिपार्टमेंट स्टोर में होता है। लेकिन चूंकि शिक्षा का वास्ता व्यक्तित्वों से है, इसलिए यह किसी मानकीकृत निर्माण प्रक्रिया की तरह नहीं है। शिक्षा की क्षमता को छात्रों के प्रति घंटे के वेतन के आधार पर नहीं बल्कि मानवतावाद, काम कर सकने और प्रोत्साहन करने को बढ़ाने की क्षमता के रूप में मापना चाहिए।
साभार-पत्रकार praxis
