Monday, 31 August 2020

भवानी प्रसाद

मुझे कोई हवा पुकार रही है
कि घर से बाहर निकलो
तुम्हारे बाहर आए बिना
एक समूची जाति एक समूचि संस्कृति 
हार रही है

मुझे हवा पुकार रही है।

सोचता हूँ सुनने की शक्ति बची है
तो चल पड़ने की भी मिल जाएगी
अकेला भी निकल पड़ा पुकार पर
तो धरती हिल जाएगी।

भवानी प्रसाद

covid

भारत भर के ज्यादा से ज्यादा डॉक्टरों ने गंभीर रूप से बीमार कोविड-19 रोगियों के लिए, आमतौर पर प्लाज्मा थेरेपी के रूप में जाना जाने वाली सामान्य प्लाज्मा थेरेपी निर्धारित करना शुरू कर दिया है. प्लाज्मा एक ऐसे व्यक्ति से लिया जाता है जो बीमारी से उबर गया हो क्योंकि उसमें रोग से लड़ने वाला एंटीबॉडी होते हैं. फिर इसे उसी बीमारी से ग्रस्त रोगी में प्रत्यारोपित किया जाता है जिसकी अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडी का उत्पादन नहीं कर रही है. सैद्धांतिक रूप से इससे रोगी में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया शुरू हो जानी चाहिए. भले ही अतीत में अन्य संक्रामक रोगों के इलाज के लिए इस प्रणाली को एक चिकित्सा हस्तक्षेप के रूप में इस्तेमाल किया गया हो, लेकिन यह दर्शाने के लिए बहुत कम वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि यह कोविड-19 रोगियों की मदद करता है. भारत में प्लाज्मा उपचार प्रणाली के लिए अधिकांश नैदानिक परीक्षणों के परिणाम अभी तक जारी नहीं किए गए हैं, लेकिन चीन में एक प्रमुख परीक्षण से पता चला है कि प्लाज्मा उपचार प्रणाली का रोगियों पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा था.

चूंकि दुनिया को इस बीमारी के बारे में पता चले अभी महज आठ ही महीने हुए हैं, इसलिए डॉक्टर अपने मरीजों को जीवित रखने के लिए प्लाज्मा और कई अन्य दवाओं को प्रायोगिक उपकरणों के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.

साभार कारवां पत्रिका

Sunday, 12 November 2017

ज्ञान का महाकुंभ या कुछ और

कौन बनेगा करोड़पति प्रोग्राम की सराहना तो जबसे यह पहली बार शुरू हुआ था तबसे कई लोगों के मुख से सुनी जा रही है। लोग कहते हैं कि देखिये यह है प्रोग्राम!! जो नौज़वानों में "ज्ञान" पाने के लिये "इच्छा" पैदा करता है। वैसे भी आजकल के स्कूलों और कालेजों में तो ज़यादा ज्ञान मिल नहीं पाता इसलिए बच्चों को टीवी के माध्यम से ही सामान्य ज्ञान देने का काम और ज्ञान पाने के प्रति "जिज्ञासा" पैदा की जा रही है!! कई पढ़े-लिखे मध्य वर्ग के माता-पिता यह कहकर इस प्रोग्राम सराहना करते हैं कि यह उनके बच्चों में "सामान्य ज्ञान" के प्रति "जागरुकता" ला रहा है। वैसे लोगों की बाते सुनकर थोड़ा विचार करने के बाद तो ऐसा लगता है कि यह प्रोग्राम ज्ञान पाने की जिज्ञासा से ज़्यादा, बिना कुछ किये मुफ्त में पैसा बनाने की जिज्ञासा को ज़्यादा बढ़ावा देता है।
आगे बढ़ने से पहले इसके द्वारा "ज्ञान" के प्रचार के पीछे जो पैसा टीवी चैनल वाले और प्रोग्राम के मेजबान कमा रहे हैं उसकी बात यहाँ नहीं करेंगे सिर्फ इसके द्वारा किये जा रहे प्रचार की बात ही करेंगे। इस प्रोग्राम के प्रशंसको की बातों को छोड़ देते हैं और कार्यक्रम के माध्यम से जिस तरह की बातों का अप्रत्यक्ष प्रचार मध्य वर्ग के लोगों में होता है उसकी थोड़ी संक्षिप्त चर्चा करते हैं। हर दिन की जिंदगी में टीवी-मनोरंचन-विलासिता में डूबे रहने वाले या एक सुखी जीवन के सपने देखने वाले मध्य-वर्ग के कई लोग मुख्य रूप से इस प्रोग्राम के प्रसंशक होते हैं। लोगों से सामान्य ज्ञान के सवाल पूँछकर हर सवाल के बदले में पैसे में बढ़ोत्तरी करने की जो रूपरेखा इस प्रोग्राम में तय की गई है और जिस तरह का पूरा प्रचार और माहौल इस शो के लिये तैयार किया जाता है वह अप्रत्यक्ष रूप से कई प्रकार से वर्तमान व्यवस्था के हित में एक काल्पनिक और झूठा विश्व दृश्टिकोंण लोगों के बीच स्थापित करने का काम करता हैं।
इसी क्रम में पहला सामान्य प्रचार जो इस प्रोग्राम के ताने-बाने के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में होता है वह है कि यदि आपके पास ज्ञान हो तो क्षरण-विघटन के शिकार सम्पत्ति केन्द्रित समाज में "पैसों" को बड़ी आसानी से एक कुर्सी (हाट सीट) पर बैठ कर सिर्फ सवालों का जबाव देकर कमाया जा सकता है। अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह के दृश्य और संवाद जिनमें अमिताभ बच्चन काफी प्रभावसाली ढंग से अपनी बात रखते हैं, और प्रत्याशी से सवाल करते हैं, वह वर्तमान समय की अमानवीय अंधी पूँजीवादी प्रतिस्पर्धा को सही सिद्ध करने का काम करते हैं, जिसका सामान्य असर लोगों के विचारों पर यह होता है कि जो लोग पैसे नहीं कमा पा रहे हैं, चाहे वे शारीरिक रूप से कितनी भी मेहनत करते हों, उन्हें बताया जाता है कि "ज्ञान" की कमीं के कारण वे इसी लायक हैं। मध्यवर्ग के कुछ असफल नौजवान भी इसके प्रभाव में हीन भावना से ग्रस्त देखे जा सकते हैं। यानि मध्यवर्ग के आम आदमी के दिमाग में यह बात गहरे स्तर तक बैठा दी जाती है कि यदि वह "ज्ञान" पाने के लिये मेहनत करे तो सफ़लता प्रप्त कर सकता है। इसलिये करोड़ों लोगों की बदहाली और बेरोजगारी का मुख्य कारण उनके पास "ज्ञान" का न होना है। यानि लोगों की सोच के दायरे को संकीर्ण तो किया ही जाता है, जो अपने आसपास से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था में अपनी स्थिति के बारे में कभी नहीं सोच पाता, कि पूरे समाज के मेहनत करने वाले लोग कुछ सम्पत्ति धारी लोगों के फायदे के लिये काम कर रहे हैं, साथ ही व्यवस्था के पक्ष में कुछ अवैज्ञानिक कूपमंडूक विचार भी उनके दिमागों में भर दिये जाते हैं।
कई लोग इस प्रोग्राम में हिस्सा लोने के लिए सामान्य ज्ञान की तैयारी तक करते हैं, और जो प्रत्याशी कुछ जीत कर जाते हैं उनको भी प्रोत्साहित किया जाता है कि वे अपने "ज्ञान" प्रप्त करने की कड़ी मेहनत का हवाला दर्शकों के सामने देकर ही जाएँ। कुछ माता-पिता जीतने वाले "ज्ञानी" व्यक्ति की तारीफ करके अपने बच्चों को भी पैसे कमाने के लिए ज्ञान प्रप्त करने का उत्साहन देते हैं। कुछ बच्चे खुद ही इतने मोटिवेट हो जाते हैं कि वह सफलता (यानि कि पैसा) पाने के लिए अपने "ज्ञान" को बढ़ाने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार ऐसे प्रोग्राम लोगों के सामने सम्पत्ति केन्द्रित व्यवस्था की अराजकता और इसमें हो रहे करोड़ों लोगों के शोषण और उनके साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार की सच्चाई को जनता की नज़रों से छुपाने का काम बखूबी निभाते हैं। और हर व्यक्ति को वर्तमान अमानवीय व्यवस्था में आजीविका कमाने के लिये मची प्रत्स्पर्धा की अन्धी दौड़ में सफलता पाने के लिये झपट पड़ने की सलाह देता है। इनके माध्यम सलोगों के सामने सिद्ध किया जाता है कि इस व्यवस्था में कोई गलती नहीं है, बल्कि मुख्य दोष गरीब लोगों में "ज्ञान" की कमी का है, जिसके कारण वे गरीब हैं। इस प्रकार यह प्रोग्राम समाज में मौज़ूद वर्गों की मानवद्रोही ऐतिहासिक सच्चाई को लोगों की नज़रों में धूमिल करने के साथ एक संदेश यह भी देता हैं जो लोग आराम से विलासिता का जीवन जी रहे हैं वे अपने ज्ञान के बल पर सफल होने के कारण ऐसा कर पा रहे हैं।
इसका एक और मैसेज लोगों के बीच यह भी पहुँचता है कि ज्ञान प्रप्त करने का मुख्य उद्धेश्य समाज के लिये किसी वैज्ञानिक कार्य या अनुसंधान या किसी टेक्नोलोजी का विकास नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंदर अपने ज्ञान के बूते पर प्रतिस्पर्धा में सफल होकर अपने लिये कुछ हासिल करना होना चाहिये।
इन सभी मानव-द्रोही दृश्टिकोंणों का प्रचार मध्य वर्ग के आम लोगों और कई सिविल सर्विस, इंजीन्यरिंग या किसी अन्य प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले उन नौजवानो को काफ़ी प्रोत्साहित करता है जो विज्ञान, टेक्नोलाजी, डाक्टरी, और यहां तक कि सिविल सर्विस की तैयारी तक अपना कैरियर बनाने की मनोवृत्ति से करते हैं, जिनके लिये समाज की सर्विस करना कोई मायने नहीं रखता और जिनका उद्धेश्य सिर्फ एक व्यक्तिवादी सामाजिक पोजीसन और पैसा कमाना होता है। यह व्यक्तिवादी, समाज-द्रोही नैतिक मूल्य मध्य-वर्ग के खाये अघाये और मंदिरों-मस्जिदों में दीन पुण्य करने वाले लोगों के लिये ईश्वरीय प्रवचनों से कम नहीं होते हैं। वास्तव में यह मूल्य 1791 में हुई फ्रांसीसी क्रांति के उन पूँजीवादी मूल्यों से भी कोई मेल नहीं रखते जहाँ समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व का नारा दिया गया था। और आज कल के यह पैसा कमाने के नैतिकता के प्रचार करने वाले मूल्य वास्तव में उन नैतिक मूल्यों से भी कोसों दूर हैं जो हमारे बचपन में नैतिक शिक्षा और पौराणिक कथाओं या धार्मिक ग्रन्थों में दिये जाते थे। वैसे आजकल जिस प्रकार का लूट-मार पूरी दुनिया की प्रतिक्रियावादी पूँजीवादी साम्राज्यवादी ताकतों ने मचा रही है उसमें इसी प्रकार के मूल्यो का प्रचार संभव है और व्यवस्था की आवश्यकता भी है। और इसमे 1791 में उठाये गये उन मानवतावादी मूल्यों की भी अपेक्षा नहीं की जा सकती जिसमे हर व्यक्ति के लिए समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व का नारा दिया गया था। वैसे सम्पत्ति आधारित समाज में यह संभव भी नहीं है कि मेनस्ट्रीम मीडिया, जो स्वयं पैसे वालों का भोपू है वह प्रगतिशील विचारों का प्रचार लोगों के बीच करेगा।
कुछ लोग कहेंगे कि यह मनगढ़ंत बाते हैं, लेकिन वास्तव में इन सभी मूल्यों का संप्रेषण करने के लिये प्रोग्राम में किसी संवाद या किसी दृश्य की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह प्रोग्राम देखने वाले व्यक्ति के स्वयं के विचारों के माध्यम से इस तरह का पूरा ताना बाना उसके सामने खड़ा कर देता है। नहीं तो ज्ञान के बदले में एक करोड़ का उपहार देकर आम लोगों के सामने क्या उदाहरण प्रत्तुत किया जा सकता है, यह इन सच्चाई को "मनगढ़ंत" कहने वाले लोगों से पूँछना चाहिये।
अब, इन मूल्यों के बीच पल रहे लोगों की बात करें तो पूरी व्यवस्था एक ओर इस तरह के मानवताद्रोही कूपमंडूक विचारों का प्रचार करके लोगों को प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे का दुश्मन और उसके विचारों के दायरे को सिकोड़कर पैसा कमाने की व्यक्तिवादी सोच तक सीमित करती है, और जब यही लोग भष्मासुर की तरह पैसा कमाने के लिये भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और सामाजिक व्यवस्था की जड़ों को खोदने लगते हैं तो पूँजीवाद के नीति-निर्माता, सामाजिक कार्यकर्ता और ए.जी.ओ. पंथी हाय तौबा मचाते-फिरते हैं, कि हमें इस व्यवस्था को साफ सुथरे लोगों की ज़रूरत है, सभी को एकजुट होकर खड़े होना चाहिए। और मजे की बात तो यह है कि यह लोग मध्यवर्ग के उन्हीं लोगों को साथ लेकर सफाई करने का सपना देखते हैं और कुछ नैतिकता की नसीहते देते हुए दिखते हैं, जो स्वयं किसी मौके की तलास में रहते हैं कि कैसे ज़्यादा सफ़ल बना जाये और कैसे करोड़ों रुपया किसी तरह कहीं से बिना काम के सिर्फ "ज्ञान" की बदौलत मिल जाये।
इस प्रकार के प्रोग्रामों का खूब प्रचार किया जाता है और मध्यवर्ग के लोगों में खूब सफलता इन्हें मिलती है। ऐसी परिस्थितियों में भेंड़चाल की मनोवृत्ति पैदा करने के लिये जिस तरह से लगातार प्रयास किये जा रहे हैं, उसके बीच कुछ संभावना संप्पन्न प्रगतिशील नौजवानो को समाज को परिवर्तन की दिशा में आगे ले जाने के लिये, और रूढ़िवादी विचारधारा का विरोध करने के लिए हमें विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है। वैसे यह व्यवस्था स्वयं ही अपने भष्मासुर इन व्यक्तिवादी लोगों के रूप में पैदा कर रही है जिनके खुले मानवद्रोही काम सभी के सामने पूरी व्यवस्था की पोल ख़ुद ही खोल देते हैं। और मंदी के माहौल में महंगाई, बेरोज़गारी और भविष्य कीअनिश्तचतता के बीच नौजवानों को स्वयं ही इस व्यवस्था का विकल्प तलासने की इच्छा पैदा कर देती है।

साभार :-स्पार्क आफ चेंज ब्लाग

Friday, 15 August 2014

बाबा नागार्जुन

बाबा नागार्जुन के शब्दों में आज़ादी 

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्‍कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्‍चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला
जहां भी टिकट मिला
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्‍बीस
उसीका पन्‍द्रह अगस्‍त है
बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्‍त है…
कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्‍त है?
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्‍त है
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्‍त है
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्‍त है
पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मास्‍टर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
बच्‍चे की छाती में कै ठो हाड़ है!
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है
ग़रीबों की बस्‍ती में उखाड़ है, पछाड़ है
धत् तेरी, धत् तेरी, कुच्‍छों नहीं! कुच्‍छों नहीं
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
ताड़ के पत्‍ते हैं, पत्‍तों के पंखे हैं
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है
कुच्‍छों नहीं, कुच्‍छों नहीं…
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!
किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है!
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है!
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्‍त है
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्‍त है
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्‍त है…

Tuesday, 26 November 2013

रियलिटी शो की रियलिटी

आजकल टेलीविज़न पर रियलिटी शो की भरमार है | सन १९४८ में एलन फाँट नाम के ब्यक्ति के दिमाग में रियलिटी शो बनाने का विचार आया और कैंडिड कैमरा नाम से रियलिटी शो बना | इसके बाद कई शो बने | भारत में रियलिटी शो का इतिहास करीब दो दशक पुराना है | ३ दिसंबर १९९३ को पहला रियलिटी शो अन्ताक्षरी शुरू हुवा जिसके ६०० एपिसोड प्रशारित हुए | १९९५ में संगीत पर आधारित कार्यक्रम सारेगामा आया और इस कार्यक्रम से फिल्म उद्योग को कुछ अच्छे गायक भी मिले | २००० में एक नया रियलिटी शो आया कौन बनेगा करोडपति जिसमे शदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने होस्ट की भूमिका निभायी | यह शो एक अमेरिकी शो से प्रेरित था , इसके बाद तो सभी चैनलों में रियलिटी शो प्रशारित करने की होड़ सी शुरू हो गयी और दस का दम,सवाल दस करोड़ का,इंडियन आयडल आदि तमाम तरह के रियलिटी शो आने लगे |
  एक समय था जब टेलीविजन पर मनोरंजन के नाम समाचार,चित्रहार,और सप्ताह में एक फिल्म दिखाई जाती थी और रात को १० बजे टीबी के कार्यक्रम बंद हो जाते थे | लेकिन अब चौबीसों घंटे कार्यक्रम चलते रहते हैं और चैनलों की भरमार हो गयी है |१९८४ से १९९१ तक टेलीविजन पर लगभग ठीक- ठाक प्रोग्राम दिखाए गए | १९९१ के बाद टेलीविजन ड्राइंगरूम से बेडरूम में घुस गया और निजी जीवन में ताकझांक करने लगा | सच का सामना,राखी का स्वयंबर,इमोशनल अत्याचार,बिग बॉस जैसे रियलिटी शो प्रसारित  होने लगे और दर्शक उपभोक्ता में तब्दील हो गए | कर्यक्रमो में विविधता का दौर शुरू हो गया और सब कुछ बाजार के द्वारा तय होने लगा,जिसके फलस्वरूप टेलीविजन के कार्यक्रमों से मूल्य और नैतिकता गायब हो गयी |
   अब सवाल पैदा होता है कि रियालिटी शो में क्या  सब कुछ रियल होता है ?और ये रियलिटी शो किस सन्दर्भ में रियल हैं ? प्रेमचंद,शरदचंद,राहुल व अन्य प्रगतिशील लेखकों ने अपनी रचनावो के माध्यम से समाज का जो वास्तविक चित्रण किया है ये शो क्या इसी तरह की वास्तविकता दिखाते हैं ? ये रियलिटी शो कोई भी वास्तविकता नहीं दिखाते बल्कि पैसे के लिए लालच ये सन्देश परोसते है | जब असल ज़िंदगी में रियल कुछ नहीं रह गया तो इन रियलिटी शो में क्या होगा |

     एक अध्ययन के अनुसार रियलिटी शो में दिखाई जाने वाली कहानी और बिषयबस्तु का युवावों के मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है | वे ग्लैमर से भरी चकाचौंध दुनिया को हकीकत समझ बैठते हैं जबकि हकीकत में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,फलस्वरूप वे कुंथाग्रष्त हो जाते हैं | वयस्कों के बाद चैनल की टीआरपी बढ़ने के लिए अब बच्चों के लिए भी रियलिटी शो बनने लगे हैं , जो बच्चों से उनका बचपना छीन रहे हैं व उनको कुंठाग्रस्त और स्वार्थी बना रहे हैं |गरीबी के चलते गरीब जनता के बच्चे बालशोषण और  बालमजदूरी का शिकार होते थे | लेकिन अब इन रियलिटी शो के जरिये सभ्रांत परिवारों के बच्चों का भी शोषण हो रहा है | रातों रात अमीर बनने की ललक के चलते बच्चे माँ-बाप की कुंठा व असफल माँ-बाप की सफलता की सीढ़ी बन रहे हैं |
   रियलिटी शो के नाम पर बच्चों से भद्दा डांस,घिनौने संबाद, द्विअर्थी गाने गवाए जाते हैं क्या ये सही तरीका उनकी प्रतिभा को आकाने का ? इस छोटी सी उम्र में दुनिया के सामने उनकी रैगिंग की जाती है | बचपन में ही उन पर असफलता का तमगा लगा दिया जाता है,जिस बोझ के साथ उसे जिन्दगी जीनी होती है | देशभर में लाखों बच्चे इस शो में हिस्सा लेते हैं और जीतने वाले दस से ज्यादा नहीं होते हैं | देखा जय तो ये एक प्रकार का लाट्रीशो है | ये शो बालश्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए खूब चल रहे हैं | असफलता के डर के कारण इन बच्चों में अनेक प्रकार के मनोविकार पैदा हो जाते हैं | अचानक मिली सफलता को ये कभी-कभी पचा नहीं पाते एक दो साल तक ये ग्लैमर की दुनिया में जगमगाते हैं परन्तु कुछ समय बाद गुम हो जाते हैं | बच्चों को यहाँ लम्बी अवधी तक अलग रखा जाता है,दबाव और चिंता के माहौल में रहने व आराम की कमी के कारण इनमे अनिंद्रा आदि की कमी हो जाती है | शिशुरोग विशेषज्ञों के अनुसार शूटिंग के दौरान तेज रोशनी का सामना करना पड़ता है जिसका उनके शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | बच्चो को सजाने सवांरने के दौरान उनके चहरे पर जो कॉस्मेटिक लगाया जाता है उससे उनकी कोमल त्वचा को नुकसान होता है |
  जितने भी रियलिटी शो द्ल्खाये जाते हैं उनमे अपशब्द,गन्दी राजनीतिव अन्य हत्कंडे अपनाकर खूब दर्शक बटोरे जाते हैं और चैनल की टीआरपी बढ़ायी जाति है | दूसरी तरफ देखें तो इन कार्यक्रमों के पीछे बाजार अपना काम करता रहता है | हुनरमंदों को हुनर सिखाने के प्रदर्शन का मंच मुहैया कराते, रियलिटी शो में हिस्सा लेने की तैयारियों के प्रशिक्षण के बाज़ार महानगरों से कस्बों तक फ़ैल रहे हैं | एक अनुमान के अनुसार बीते दस सालों में दस हजार से भी ज्यादा प्रशिक्षण केंद्र खुले हैं जहाँ रियलिटी शो के लिए संभावित प्रतियोगी तैयार किये जाती हैं |रियलिटी शो के पीछे एक बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो रहा है | एक तरफ शो में हिस्सा लेने बावत तैयारियों से जुड़े कोचिंग संस्थान हैं तो किताब ,सीडी से लेकर कई दूससे उत्पाद भी | रियलिटी शो को अपने कुल राजस्व का ३० से ४० प्रतिशत मोबाइल एसएमएस से मिल जाता है | महत्वपूर्ण प्रशन ये है कि इन शो के नाम पर सिर्फ कारोबार हो रहा है बाकी कच्छ नहीं |टेलीविजन चैनलों को कम मेहनत में विज्ञापनों के बाजार में बड़ा हिस्सा बटोरने के लिए ये शो मुफीद लगते हैं |

    इस प्रकार के कार्यक्रम जो अपसंस्कृति परोस रहें हैं इन्हें  संगठित प्रयास करके रोकना  होगा |

Sunday, 24 November 2013

पूँजी का संरचनात्मक संकट और शिक्षा

संयुक्त राज्य और विश्व में अन्य कई जगहों में भी सार्वजनिक शिक्षा में सुधार के लिए चले रूढि़वादी आंदोलनों का प्रचलित तौर पर मानना है कि सार्वजनिक शिक्षा आपातकलीन स्थिति में है और अपनी आंतरिक विफलताओं के चलते इसके पुर्नगठन की जरूरत है। इसके विपरीत मेरा कहना है कि सार्वजनिक शिक्षा में ह्रास उन बाहरी विरोधाभासों के चलते हैं जो पूंजीवादी समाज में स्कूली शिक्षा में अंतर्निहित हैं और हमारे समय में परिपक्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव और रूढि़वादी सुधार आंदोलनों के प्रभाव से ही बढ़ रहे हैं। जार्ज डब्लू बुश के नो चाइल्ड लेफ्ट बिहाइंड (एनबीसीएल) कानून में परिलक्षित छात्रों शिक्षकों और सार्वजनिक शिक्षण संस्थाओं का कार्पोरेट संचालित दमन अपने आप में स्कूलों की विफलता के रूप में उतना व्याख्यायित नहीं होता जितना कि पूंजीवादी व्यवस्था की बढ़ती हुई विफलताओं से, जो कि अपनी इस बड़ी समस्या का निदान सार्वजनिक षिक्षा के निजीकरण के रूप में देख रही है।
    

हम संरचनात्मक संकट के दौर में जी रहे हैं जो पूंजीवाद के एक चरण ‘वित्तीय पूंजी एकाधिकार’ के साथ जुड़ा है। इस चरण की विशेषता हैः (1) विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव (2) वित्तीयकरण की ओर नाटकीय रूख, उदाहरण के लिए आर्थिक विस्तार के लिए अटकलबाजियां (3) वैश्विक स्तर पर पूंजी का तेजी से संकेन्द्रण (और एकाधिकारिता).
विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अंतर्निहित विकास की धीमी गति का परिणाम यह है कि आज की आर्थिक दुनिया में पूरी तरह हावी विशाल निगम (जायंट कार्पोरेशंस) निवेश के लिए अपनी पारंपरिक जगहों के बाहर नए बाजारों को ढूंढने के लिए मजबूर हैं। जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था के निर्णायक तत्वों का अधिग्रहण और निजीकरण हो रहा है। नवउदारवादी पुनर्गठन एकाधिकारवादी वित्तीय पूंजी का राजनीतिक साझीदार है जिसमें राज्य तेजी से निजी हितों की बलि चढ़ रहा है।

इन परिस्थितियों में हमें इस बात पर मुश्किल से ही आश्चर्य होगा कि संयुक्त राज्य की सार्वजनिक शिक्षा को वित्तीय हलकों द्वारा एक अनछुए बाजार के तौर पर देखा जा रहा है या निजी शिक्षा उद्योग खरबों डालर के दुनिया भर के सार्वजनिक शिक्षा के बाजार को पूंजी संकेंद्रण के लिए और भी खोलने के लिए जोर दे रहा है।  क्योंकि शिक्षा कार्यबल के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिए नवउदारवादियों का इसमें  पुनर्गठन के लिए जोर बढ़ता जा रहा है।
 
सार्वजनिक शिक्षा में आपातकालीन स्थिति और इसके पुनर्गठन और निजीकरण की मांग को प्राथमिक तौर पर वर्तमान दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता के उत्पाद के रूप में देखा जाना चाहिए। मोटे तौर पर पूंजी का ढांचागत संकट, शिक्षा के लिए संघर्ष के रूप में परिलक्षित होता है जो कि वर्तमान व्यवस्था में आपवादिक नहीं है और इसमें अंतर्निहित देखा जा सकता है। परिणाम स्वरूप निहित स्वार्थों की लम्बी होड़ पैदा होती है जिसमें बाजार केंद्रित स्कूल व्यवस्था की स्थापना पर जोर दिया जाता है। प्रत्येक तरीके को इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है जिसमें नस्ल और वर्गों के अंतर्विरोध, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अस्थिरता भी शामिल हैं।  

पूंजीवादी शिक्षा का राजनीतिक अर्थशास्त्र

1970 के मध्य में अर्थशास्त्री सैम्युअल बावेल्स और हर्बर्ट जिंटिस ने अपनी बहुमूल्य रचना ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विश्लेषण के लिए एक उपयोगी राजनीतिक-आर्थिक ढांचा दिया। यद्यपि शुरूआत में वामपंथी हलकों में लोकप्रिय रही ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’, अत्यधिक आर्थिक निर्णयवादी होने और व्यवस्था से छात्रों एवं शिक्षा प्रदाताओं के जटिल सांस्कृतिक संबोधनों पर ध्यान न देने के कारण 1980 तक वामपंथियों की पसंद नहीं रही। अन्य वामपंथियों ने बावेल्स और जिंटिस के तर्क की अत्यधिक प्रकार्यवादी और विश्लेषण में अद्वंद्ववादी होने के कारण आलोचना की है।  हांलाकि मेरा मानना है कि ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में वो आधार मौजूद है जहां से पूंजीवादी शिक्षण के राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझा जा सकता है जैसा कि हमारे नवउदारवादी दौर में है।

बावेल्स और गिंटिस के अनुसार यदि पूंजीवाद के दबाव वाली शिक्षा को शक्तिशाली लोकतांत्रिक प्रतिरोध आंदोलनों द्वारा चुनौती नहीं दी गई तो इससे पूंजीपति वर्ग की अधिकारिता का विकास होगा जो कि उत्पादन और संकेंद्रण की आवश्यकताओं के अनुसार इसके साथ रहेगी। लेखकों का संबद्धता सिद्धांत ए जिसके अनुसार पूंजीवादी समाज शिक्षा के सामाजिक संबंध सामान्यतया उत्पादन के सामाजिक संबंधों से संवाद करते हैं, अपने आप में प्रामाणिक है। इसलिए शिक्षा सेवा उत्पादन के लिए है और उत्पादन व्यवस्था के श्रेणीबद्ध श्रमविभाजन को और ज्यादा बढ़ाती है। इस प्रकार पूंजीवादी समाज में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के दोनों प्रभावी उद्देश्यों- 1.उत्पादन के लिए श्रमिकों या श्रम शक्ति का निर्माण और 2.शिक्षा में शिक्षाकर्मियों की श्रमप्रक्रिया, को मूल रूप से वृहद अर्थव्यवस्था में उत्पादन संबंधों के अनुरूप ढाला जा रहा है।
   
इस दृष्टि से पूंजीवादी शिक्षण वैसी ही चेतना और व्यवहार विकसित करता है जो पूर्वस्थापित वर्ग और समूहों को ही पुनर्स्थापित करते हैं और इस तरह समग्र रूप में पूंजीवादी समाज में उत्पादन के सामाजिक संबंधों को मजबूती और वैधता मिलती है। श्रमजीवी और श्रमजीवी होने के लिए अभिशप्त वर्गों के विद्यार्थियों को नियमों के अनुसार व्यवहार करना सिखाया जाता है जबकि उच्चमध्यवर्ग या/और व्यावसायिक एवं प्रबंधकीय स्तर के लिए ही बने छात्रों को समाज के मूल्यों को आत्मसात करना सिखाया जाता है। (इन दोनों के बीच के लोगों को नियमों को मानने के साथ ही विश्वस्त होना भी सिखाया जाता है।)
  
प्रारंभिक एवं माध्यमिक स्तर पर शिक्षा कुछ ही हद तक वास्तविक कौशल विकास पर केंद्रित रहती है और भविष्य में रोजगार के लिए आवश्यक ज्ञान पर तो और भी कम, जो कि काम करते हुए ही या उत्तरमाध्यमिक शिक्षण (व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान और कॉलेजों) में प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार विद्यालय, शिक्षा के लिए कम जबकि व्यवहार संशोधन के लिए अधिक काम करते हैं ताकि बहुसंख्यक विद्यार्थियों को एकरस और मानकीकृत जीवन के लिए तैयार किया जा सके जिसमें अधिकांश आवश्यक रूप से अकुशल श्रमिक के रूप में रोजगार पाएंगे। दरअसल एकाधिकारी पूंजीवादी समाज के गिरे हुए कार्य वातावरण में अधिकांश रोजगार यहां तक कि स्नातक अर्हता वाले रोजगारों में भी औरपचारिक शिक्षा की कम ही आवश्यकता होती है।

संयुक्त राज्य में उच्चतम गुणवत्तायुक्त प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा सार्वजनिक विद्यालयों की जद से बाहर और बहुत कम संख्या वाले अतिसंभ्रांत निजी स्कूलों में ही प्राप्त हो सकती है। जो कि बहुत धनाड्य लोगों के बच्चों को ही समर्पित है और जिसका उद्देश्य शासक वर्ग को पैदा करना है। जैसे एनडोवर मैसाचुसेट्स में फिलिप्स ऐकेडमी, जहां जार्ज एच. डब्ल्यू. बुश और जार्ज डब्ल्यू. बुश दोनों ही पढ़े हैं, में एक साल की सिर्फ ट्यूशन फीस ही 32,000 डालर है। यहां प्रति 5 बच्चों में 1 शिक्षक है और एक संपूर्ण पाठ्यक्रम के साथ 73 प्रतिशत शिक्षक उन्नत डिग्रीधारी हैं। ऐसे स्कूल आईवी लीग के लिए रेड कार्पेट के रूप में देखे जा सकते हैं। 
 
इस तरह शिक्षा व्यवस्था को कई तरह से उत्पादन व्यवस्था के भीतर रोजगार की उठा-पटक, बढ़ती हुई असमानता और अलगाव से जुड़ा हुआ देखा जा सकता है। ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में विकसित यह तर्क असल में निर्णायकवादी नहीं है बल्कि यह वर्गसंघर्ष के मुद्दे को उठाता है। बावेल्स और जिंटिस के अनुसार,‘वह सीमा जिसमें पूंजीवादी व्यवस्था वास्तव में अपने लक्ष्यों को पूरा करती है समयावधि के अनुसार बदलती जाती है.... अधिकतर पूंजीवादी संबंधों को बढ़ाने और विस्तृत करने के लिए स्कूलों को प्रयोग करने की कोशिशों का शिक्षा व्यवस्था की आंतरिक गतिकी और लोकप्रिय प्रतिपक्ष दोनों के ही द्वारा विरोध हुआ है।’

इनकी किताब का ऐतिहासिक भाग विस्तृत रूप से, स्कूली छात्रों के हित में व्यवस्था के भीतर स्वायत्तता बनाए रखने के लिए मुख्यतया शिक्षकों के संघर्ष के रूप में दिखाई देने वाली शिक्षा व्यवस्था की आंतरिक गतिकी और शिक्षा प्रदाताओं, अभिवावकों और नागरिकों के अधिपत्य विरोधी आंदोलनों के रूप में उभरने वाले उन आंदोलनों की चर्चा करता है जो पूंजीवादी शिक्षण के खिलाफ समय-समय पर पैदा हुए हैं। फिर भी दोनों रूपों में संघर्ष केवल सतही लगता है क्योंकि इनके द्वारा कभी भी पूंजीवादी शिक्षण के आधारभूत सिद्धांतों पर जोरदार हमले नहीं किए गए। परिणाम स्वरूप सभी जगह कॉरपोरेट ऐजेंडा हावी है।         

एकाधिकारवादी पूंजी और शिक्षा के कॉरपोरेट ढांचे का उदय-

सार्वजनिक शिक्षा के प्रति इस प्रकार के वृहत राजनैतिक आर्थिक दृष्टिकोण का महत्व इस बात में है कि इससे संयुक्त राज्य में या और कहीं भी पूंजीवादी शिक्षण के विकास को संचालित करने वाले तर्कों को समझा जा सकता है। संयुक्त राज्य में सार्वजनिक शिक्षा की शुरूआत 19वीं शताब्दी में हुई। लेकिन जिस शिक्षा व्यवस्था को हम आज जानते हैं वह 19वीं सदी के आंखिरी और 20वीं सदी के प्रारंभ में उभरी। इसका आधुनिक विकास विशाल निगम अधिपत्य वाली एकाधिकारी पूंजीवादी व्यवस्था के उभार से जुड़ा हुआ है। अनुमान है कि केवल 1898 और 1902 के बीच विनिर्माण में अमेरिकी पूंजी का ‘एक चैथाई से एक तिहाई भाग’ विलय और अधिग्रहण के माध्यम से समेकित हुआ। इनमें 1901 में 170 अलग-अलग इकाइयों के विलय से  बने यूएस स्टील का निर्माण सबसे बड़ा है। जो कि स्टील उद्योग के 65 फीसदी को नियंत्रित करने वाला पहला एक अरब डालर का निगम था। यह वृहत व्यापारिक पूंजीवाद को दर्शाने वाले कॉरपोरेट संकेंद्रण के दौर का उदाहरण है।

संग्रहण के इस नए चरण के विकास और स्थितिकरण में एक निर्णायक तत्व इसमें निहित उस गुंजाइश में था जिसे मार्क्स ‘‘पूंजी के तहत श्रम के औपचारिक दोहन’’ के बजाय ‘‘वास्तविक दोहन’’ कहना पसंद करते थे।

19वीं शताब्दी के पूंजीवाद में श्रमिक इस स्थिति में थे कि वे कार्य किए जाने के तरीकों के ज्ञान के आधार पर अपने रेंक निर्धारित कर सकते थे और इस प्रकार श्रम प्रक्रिया में काफी हद तक उनका नियंत्रण था। इसलिए श्रमप्रक्रिया में मालिकों और प्रबंधकों का नियंत्रण औपचारिक अधिक था वास्तविक कम। एकाधिकारी पूंजीवाद के उदय के साथ निगम, कार्यबल और फैक्टरीयां बड़ी होती गई और यह संभव हुआ कि श्रम के विभाजन को बढ़ाया जा सके और इस प्रकार ऊपर से नीचे तक प्रबंधकीय नियंत्रण होने लगा। इसने संकेंद्रित उद्योग जगत में एक नए वैज्ञानिक प्रबंधन, ‘टेलरिज़्म’ का रूप ले लिया। श्रमप्रक्रिया में श्रमिकों का नियंत्रण व्यवस्थित ढंग से छिन गया और प्रबंधन द्वारा ही मनमाने ढंग से नियंत्रण किया जाने लगा। इस तरह प्रबंधकीय तर्क के अनुसार श्रमिक ऊपर से आने वाले आदेषों का पालन करने भर को रह गए और उनका प्रत्येक क्षण प्रबंधन द्वारा दिए गए छोटे-छोटे विवरणों से संचालित होने लगा।

अधिकतर श्रमिकों की कार्य करने की स्थितियों में हुए ह्रास को उद्योग जगत में वैज्ञानिक प्रबंधन की शुरूआत के मुख्य परिणाम के तौर पर हैरी ब्रेवरमैन ने 1974 में ‘लेबर एंड मोनोपोली कैपिटल’ में विश्लेषित किया है। एकाधिकरिक पूंजीवादी समाज मुख्य रूप से कौशल के ध्रुवीकरण के रूप में पहचाना जाता है जिसमें अधिक संख्या में अकुशल श्रमिकों की तुलना में कार्यकुशल श्रमिकों की कम मांग होती है।
   
कॉरपोरेट द्वारा बनायी गई शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य श्रमिकों का उत्पादन कर श्रम-बाजार के इन विभिन्न चरणों को भरना था। लेकिन साथ ही वैज्ञानिक प्रबंधन को भी श्रम प्रक्रिया को निर्देशित करने के लिए देखा गया ताकि स्कूलों के भीतर शिक्षक एक नए तरीके के कॉरपोरेट प्रबंधक बन जाएं।
 
संयुक्त राज्य में लूइस ब्रांडीस द्वारा 1910 में अंतर्राज्यीय कॉमर्स कमिशन में की गई उस पैरवी के बाद वैज्ञानिक प्रबंधन पहले पहल व्यापक तौर पर जाना गया जिसमें उन्होंने कॉरपोरेट लाभ बढ़ाने में कुशलता निर्माण की जादुई भूमिका की प्रशंशा की। इसे 1911 में फ्रैड्रिक विंस्लो की किताब ‘टेलर्स प्रिंसिपल्स ऑफ़ साइंटिफिक मेनेजमेंट’ ने विस्तार दिया जो कि शुरूआत में ‘अमेरिकन मैगजीन’ में किस्तों में छपी थी। वैज्ञानिक प्रबंधन और दक्षता विशेषज्ञ जल्द ही कॉरपोरेट कार्यकारियों के बीच और लोकाधिकारियों दोनों के बीच प्रसिद्ध हो गए और जल्द तेजी से सार्वजनिक स्कूलों के प्रबंधन तक पहुंच गए जहां मानक परीक्षण और टेलरीकृत स्कूल एक नए स्वप्नलोकीय कॉरपोरेट मॉडल स्कूल व्यवस्था के पारिभाषिक सिद्धांत बन गए।

इस प्रकार दक्षता विशेषज्ञ हैरिंगटन एमर्सन ने 1911 में न्यूयार्क के हाईस्कूल टीचर्स एशोशिएशन को एक भाषण दिया जिसे उन्होंने ‘साइंटिफिक मेनेजमेंट एंड हाईस्कूल इफीसिएंसी’ नाम दिया। उनके बारह में से अंतिम सात सिद्धांत मानक रिकार्ड्स, योजना, मानक स्थितियां, मानकीकृत ऑपरेशन्स, मानक निर्देष, मानक और योग्यता पुरस्कार थे। 1913 में शिकागो यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्रशासन के विशेषज्ञ फ्रैंकलिन बॉबिट ने ‘द सुपरविजन ऑफ़ सिटी स्कूल्स’ में लिखा-
कार्यकर्ताओं को, किए जाने वाले कार्य के लिए विस्तृत दिशा निर्देश, लक्षित मानक, प्रयुक्त क्रियाविधियों और प्रयोग किए जाने वाले उपकरण के विषय में पूरी तरह परिचित किया जाना चाहिए..... अध्यापकों को कार्य में मौज उड़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जब कोई ऐसी विधि मिल जाए जो कि अन्य से स्पष्ट रूप से बेहतर है तो ऐसी ही विधि को प्रयोग में लाना चाहिए। इस क्रियाविधि की अनदेखी करना और अपनी उदासीनता को अध्यापकों की स्वतंत्रता के नाम पर जायज ठहरना शायद शुरूआती अनुभववाद के दौर में उचित था जब सर्वेक्षक अध्यापकों को केवल पदोन्नत करते थे और वस्तुगत् तौर पर वे मानकों और विधियों के विषय में पद और फाइलों से थोड़ी ही अधिक जानकारी रखते थे।

बॉबिट चाहते हैं कि मानकीकृत कुषल तरीकों की आवष्यकता के कारण,‘‘अध्यापकों की स्वतंत्रता आवष्य ही कुछ संकुचित की जानी चाहिए’’। बॉबिट तो ये सुझाव भी दे गए हैं कि इमला लेखन करते हुए विद्यार्थियों की स्टॉप वॉच से जांचना चाहिए ताकि लेखन सिखाने में प्रयुक्त साठ मिनट के समय को प्रयोग करने का सबसे बढि़या तरीका जाना जा सके।  इसी तरह एक प्रभावशाली शिक्षण प्रशासक और सेन फ्रैंसिस्को पब्लिक स्कूल के अधीक्षक एलवर्ट कबर्ले ने 1916 में पब्लिक स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन में लिखा ,‘‘एक तरह से हमारे स्कूल फैक्ट्रियां हैं जिनमें कच्चे माल (बच्चे) को आकार दिया जाता है और जीवन की विविध आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादों में बदला जाता है।’’
न्यूयार्क शहर में स्कूलों के जिला अधीक्षक, जोसफ एस टेलर ने 1912 में लिखाः
(1) एक नियोक्ता के तौर पर राज्य को शिक्षकों के साथ सहयोग करना चाहिए क्योंकि शिक्षक हमेशा ही शिक्षा के विज्ञान को नहीं समझता है। (2) राज्य उन विशेषज्ञों को उपलब्ध कराए जो कि शिक्षकों का पर्यवेक्षण कर पाएं और सर्वाधिक कुशल और किफायती प्रक्रियांओं के बारे में सुझाव दें। (3) व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह की कार्य प्रणाली स्कूलों में भी अपनाई जाय जिसमें दिया गया कार्य निश्चित शर्तों के साथ पूरा किया जाय। (4) जो अध्यापक दिए गए कार्य को पूर्ण करे उसे बोनस दिया जाय जो कि पैसे के रूप में ना होकर एक रेटिंग के रूप में हो जो पैसे के रूप में बदला जा सके। (5) कार्य में अक्षम लोगों को निकाल दिया जाए।
इस पद्यति में शिक्षकों की कार्यकुशलता को प्राथमिक रूप से उनके छात्रों के परीक्षण के माध्यम से मापी जानी थी। इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध से ठीक पहले मानकीकृत परीक्षणों के द्वारा मानक विकसित किए जाने पर बहुत अधिक जोर दिया गया। 1911 में नेशनल एजूकेशन एसोसिएशन (एनईए) ने स्कूलों में कुशलता की परीक्षा और मानकों पर एक कमेटी का गठन किया। जब आईक्यू टेस्टिंग और अन्य प्रच्छन्न नस्लवादी जांच के तरीकों के प्रचलन के समय ही हुआ।

कारपोरेट प्रभुत्व वाली मानकीकृत शिक्षाव्यवस्था के निर्माण के पहले प्रयास उस समय उभरे नए परोपकारी कर-मुक्त संगठनों द्वारा किए गए। एंड्रयू कार्नेगी, जॉन डी. राॅकेफेलर और हैनरी फोर्ड जैसे अरबपतियों ने निजी संगठन स्थापित किए जिनमें बड़े सामाजिक परिवर्तनों को गति देने के लिए सरकार की भूमिका को संकुचित करते हुए परोपकार के तौर पर वित्त की व्यवस्था की गई। कार्नेगी फाउण्डेशन टैस्टिंग एवं सुजननिकी दोनों में अग्रणी था। इसने 1954 के दौरान टैस्टिंग में 6,424,000 डालर का निवेश किया। 1965 में इसने नेशनल एसेसमेंट ऑफ़ ऐजूकेशनल प्रोग्राम के विकास की शुरूआत की। राॅकफेलर फाउण्डेशन ने 1930 और 1940 के दौरान ऐजूकेशनल टैस्टिंग सर्विस के निर्माण में भारी योगदान दिया।  

प्रारंभिक कॉरपोरेट शिक्षा आंदोलन की असफलता

लेकिन 19वीं शताब्दी में एकाधिकारी निगमों और परोपकारी फाउण्डेशनों के कठोर मानकों और टैस्टिंग वाले कॉरपोरेट मॉडल स्कूलों के विकास में किए गए अत्यधिक प्रयासों के बावजूद भी पब्लिक स्कूल कई तरीकों से उनके नियंत्रण के बाहर रहे। स्कूल अकसर ही प्रगतिशील शिक्षकों, अभिभावकों और समुदायों के बीच से उभरने वाले लोकतांत्रिक संघर्षों के केंद्र में रहे थे। शिक्षक काफी हद तक स्वायत्ता प्राप्त एवं स्वयं को कामगार तबके के बच्चों से जुड़ा पाने वाले और श्रम सघन क्षेत्र में कम वेतन पाने वाले पेशेवर थे। शिक्षकों के संगठन उभरे जिनके माध्यम से उन्होंने सार्वजनिक स्कूलों में वेतन और कार्यस्थितियों के बारे में न्यूनतम मोलभाव करने की स्थितियां बनाई।

पूंजीवादी शिक्षा की परिणामी व्यवस्था में बहुत गंभीर खामियां थी। एक गहरे रूप में बंटे हुए समाज के तौर पर संयुक्त राज्य संस्थागत रूप से नस्लवादी बना रहा। जैसा कि 2005 में आई जाॅनाथन कोजोल की किताब ‘द शेम ऑफ़ द नेशन’ में संयुक्त राज्य के स्कूलों में नस्लीय स्तरीकरण में दिखता है। 20  पाठ्यक्रम के स्तर को अकसर कॉरपोरेट्स के द्वारा की जाने वाली अकुशल और नम्य श्रमशक्ति की मांग के हिसाब से गिराया गया है। फिर भी, प्रगतिशील अध्यापक सभी बाधाओं के बावजूद बच्चों की वास्तविक जरूरतों के लिए व्यवस्था के बुरे पहलुओं के खिलाफ लडे़। अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ टीचर्स की पत्रिका ‘द अमेरिकन टीचर’ ने 1912 में स्कूलों में वैज्ञानिक प्रबंधन के खिलाफ एक आलेख छापा। जिसमें लिखा थाः
संगठनों और स्कूलों के तरीकों ने वाणिज्यिक उद्यमों का रूप ले लिया है जिनसे हमारा आर्थिक जीवन पहचाना जाता है। हमने ‘बड़े उद्योगपतियों’ के घमंड को स्वीकार लिया है, साथ ही उनके योग्यता के मानकों को भी बिना प्रश्न किए स्वीकारा है। हमने शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों के परिणाम का मानक ‘कीमत और उत्पाद’ के रूप में स्वीकार कर लिया है जैसे कि किसी फैक्ट्री या डिपार्टमेंट स्टोर में होता है। लेकिन चूंकि शिक्षा का वास्ता व्यक्तित्वों से है, इसलिए यह किसी मानकीकृत निर्माण प्रक्रिया की तरह नहीं है। शिक्षा की क्षमता को छात्रों के प्रति घंटे के वेतन के आधार पर नहीं बल्कि मानवतावाद, काम कर सकने और प्रोत्साहन करने को बढ़ाने की क्षमता के रूप में मापना चाहिए।

शिक्षा की साख बनी रही क्योंकि शिक्षक, अभिवावकों और समुदाय के सदस्यों के द्वारा अकसर ही पूंजीवादी शिक्षण के जोर का विरोध किया है। बदलती परिस्थितियों ने प्रगतिशील शिक्षा आंदोलनों की कड़ी को उभारा।  जैसे कि 1920 और 30 के दशक में जॉन डेवी से जुड़ा हुआ लोकतांत्रिक और प्रायोगिक शिक्षा आंदोलन, सिविल राइट आंदोलन के दौर में स्कूल अलगाव विरोधी आंदोलन, 1960 और 70 के दशक मुफ्त शिक्षा आंदोलन। 1916 में ‘डैमोक्रेसी इन ऐजूकेशन’ में कहा ‘शिक्षा, किसी बड़े दायरे की सीखने की प्रणाली की अधीनस्थ जैसी कोई विशेषीकृत प्रक्रिया नहीं है। शिक्षण का सर्वोत्तम रूप जीवन से ही सीखने की प्रवृत्ति और उन परिस्थियों का निर्माण है जिससे कि सभी लोग जीवन की प्रक्रिया में ही सीख सकें।’

1916 में रेडिकल न्यूयार्क टीचर्स यूनियन (टीयू) का अभ्युदय हुआ। अभिवावकों और समुदायों दोनों के साथ गठजोड़ बनाते हुए टीयू नस्लीयविभेद और गरीबी के खिलाफ, इन्हें विद्यार्थियों की सफलता में मुख्य बाधा मानते हुए लड़ा। इस प्रकार के शिक्षा दर्शन का लक्ष्य पूरे समाज के रूपांतरण की जरूरत पर जोर देना था। आज के ‘सामाजिक आंदोलन एकतावाद’ के समरूप शक्तिशाली विकल्प को प्रस्तुत करने वाले टीयू का अस्तित्व शीतयुद्ध के दौर में वामपंथियों के नाम पर खत्म कर दिया गया। इग्यारह सौ के करीब स्कूल कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया और चार सौ से ज्यादा लोगों को बाहर निकाल दिया गया। 1950 में न्यूयार्क बोर्ड ऑफ़ ऐजूकेशन ने स्कूलों में टीयू की गतिविधि को प्रतिबंधित करने के लिए कुख्यात टीमोन रिज्योल्युशन अपनाया।

हालांकि इन प्रगतिशील शिक्षा आंदोलनों में से कोई भी अमेरिका में प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा में वास्तविक उद्धार की दिशा में बदलाव करने में सफल नहीं हुआ और 20वीं शताब्दी के अंत में शिक्षा में व्याप्त असमानता, गरीबी, संस्थागत् नस्लवाद और आर्थिक मंदी के प्रभावों से शिक्षा को बचा पाने में सफल नहीं हुआ। लेकिन ये आंदोलन सार्वजनिक क्षेत्र में शिक्षा में बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने और भविष्य में समतावादी शिक्षा की संभावनाओं की उमींदों को संरक्षित रखने में सफल हुए।  

Wednesday, 23 October 2013

पूंजी का संरचनात्मक संकट और शिक्षा : यूएस परिघटना-पहली क़िस्त

http://www.laika-verlag.de/sites/default/files/JohnBellamyFoster.png
जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर
 - जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर
अनुवादः रोहित, मोहन और सुनील

(जॉन बेलेमी फ़ॉस्टर मंथली रिव्यू के संपादक हैं। वे, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑरेगोन में समाजशास्त्र के प्रवक्ता और ‘द ग्रेट फाइनेंसियल क्राइसिस’(फ्रैड मैग्डोफ़ के साथ) के लेखक भी हैं। उक्त आलेख 11अप्रैल 2011 को फ्रैडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंटा कैटेरिना, फ्लोरिआनोपोलिस, ब्राजील में शिक्षा एवं मार्क्सवाद पर पांचवे ब्राजीलियन सम्मेलन (ईबीईएम) में उनके द्वारा दिए गए आधार वक्तव्य का विस्तार है। यह आलेख यहाँ पढ़ा जाना इसलिए भी मौंजू है कि आज का भारत भी बिलकुल उन्हीं प्रवृतियों के शुरूआती दौर में है जिनसे अमेरिका गुजरा है। सार्वजनिक/सरकारी शिक्षा प्रणाली तकरीबन बेकार घोषित की जा चुकी है. तमाम फाउन्डेशनों, एनजीओज ने यहाँ सुनहरा भविष्य देख भारत की 'शिक्षा व्यवस्था' को 'पटरी' पर लाने के लिए 'कमर कस' ली है. वे गाँव-गाँव, शहर-शहर में फ़ैल कर शिक्षा की नई अलख जगाने के उन्माद में हैं. इसी दौर में प्राइवेट प्लेयर्स ने स्कूलों और कॉलेजों का ऐसा जाल बिछाया है कि तकरीबन सारा मध्य वर्ग/निम्न मध्य वर्ग अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए इस जाल में बुरी तरह फंस गया है. फ़ॉस्टर ने अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था में ठीक इसी तरह की प्रवृत्तियों की तफसील से पड़ताल की है. अमेरिका में यह प्रव्रत्तियां उस चरम पर पहुँच गईं हैं जहाँ से इस समस्या की विकरालता साफ़ समझ आती है. भारत में अभी इस आलेख को पढ़ना, सचेत हो जाने के लिए जरूरी होगा. इस लम्बे आलेख को हम ४ किस्तों में यहाँ देंगे... ) 

http://www.alternet.org/files/styles/story_image/public/story_images/privatization.jpgसंयुक्त राज्य और विश्व में अन्य कई जगहों में भी सार्वजनिक शिक्षा में सुधार के लिए चले रूढि़वादी आंदोलनों का प्रचलित तौर पर मानना है कि सार्वजनिक शिक्षा आपातकलीन स्थिति में है और अपनी आंतरिक विफलताओं के चलते इसके पुर्नगठन की जरूरत है। इसके विपरीत मेरा कहना है कि सार्वजनिक शिक्षा में ह्रास उन बाहरी विरोधाभासों के चलते हैं जो पूंजीवादी समाज में स्कूली शिक्षा में अंतर्निहित हैं और हमारे समय में परिपक्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव और रूढि़वादी सुधार आंदोलनों के प्रभाव से ही बढ़ रहे हैं। जार्ज डब्लू बुश के नो चाइल्ड लेफ्ट बिहाइंड (एनबीसीएल) कानून में परिलक्षित छात्रों शिक्षकों और सार्वजनिक शिक्षण संस्थाओं का कार्पोरेट संचालित दमन अपने आप में स्कूलों की विफलता के रूप में उतना व्याख्यायित नहीं होता जितना कि पूंजीवादी व्यवस्था की बढ़ती हुई विफलताओं से, जो कि अपनी इस बड़ी समस्या का निदान सार्वजनिक षिक्षा के निजीकरण के रूप में देख रही है।
    

हम संरचनात्मक संकट के दौर में जी रहे हैं जो पूंजीवाद के एक चरण ‘वित्तीय पूंजी एकाधिकार’ के साथ जुड़ा है। इस चरण की विशेषता हैः (1) विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक ठहराव (2) वित्तीयकरण की ओर नाटकीय रूख, उदाहरण के लिए आर्थिक विस्तार के लिए अटकलबाजियां (3) वैश्विक स्तर पर पूंजी का तेजी से संकेन्द्रण (और एकाधिकारिता).
विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अंतर्निहित विकास की धीमी गति का परिणाम यह है कि आज की आर्थिक दुनिया में पूरी तरह हावी विशाल निगम (जायंट कार्पोरेशंस) निवेश के लिए अपनी पारंपरिक जगहों के बाहर नए बाजारों को ढूंढने के लिए मजबूर हैं। जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था के निर्णायक तत्वों का अधिग्रहण और निजीकरण हो रहा है। नवउदारवादी पुनर्गठन एकाधिकारवादी वित्तीय पूंजी का राजनीतिक साझीदार है जिसमें राज्य तेजी से निजी हितों की बलि चढ़ रहा है।

इन परिस्थितियों में हमें इस बात पर मुश्किल से ही आश्चर्य होगा कि संयुक्त राज्य की सार्वजनिक शिक्षा को वित्तीय हलकों द्वारा एक अनछुए बाजार के तौर पर देखा जा रहा है या निजी शिक्षा उद्योग खरबों डालर के दुनिया भर के सार्वजनिक शिक्षा के बाजार को पूंजी संकेंद्रण के लिए और भी खोलने के लिए जोर दे रहा है।  क्योंकि शिक्षा कार्यबल के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिए नवउदारवादियों का इसमें  पुनर्गठन के लिए जोर बढ़ता जा रहा है।

सार्वजनिक शिक्षा में आपातकालीन स्थिति और इसके पुनर्गठन और निजीकरण की मांग को प्राथमिक तौर पर वर्तमान दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता के उत्पाद के रूप में देखा जाना चाहिए। मोटे तौर पर पूंजी का ढांचागत संकट, शिक्षा के लिए संघर्ष के रूप में परिलक्षित होता है जो कि वर्तमान व्यवस्था में आपवादिक नहीं है और इसमें अंतर्निहित देखा जा सकता है। परिणाम स्वरूप निहित स्वार्थों की लम्बी होड़ पैदा होती है जिसमें बाजार केंद्रित स्कूल व्यवस्था की स्थापना पर जोर दिया जाता है। प्रत्येक तरीके को इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है जिसमें नस्ल और वर्गों के अंतर्विरोध, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अस्थिरता भी शामिल हैं।  

पूंजीवादी शिक्षा का राजनीतिक अर्थशास्त्र

1970 के मध्य में अर्थशास्त्री सैम्युअल बावेल्स और हर्बर्ट जिंटिस ने अपनी बहुमूल्य रचना ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विश्लेषण के लिए एक उपयोगी राजनीतिक-आर्थिक ढांचा दिया। यद्यपि शुरूआत में वामपंथी हलकों में लोकप्रिय रही ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’, अत्यधिक आर्थिक निर्णयवादी होने और व्यवस्था से छात्रों एवं शिक्षा प्रदाताओं के जटिल सांस्कृतिक संबोधनों पर ध्यान न देने के कारण 1980 तक वामपंथियों की पसंद नहीं रही। अन्य वामपंथियों ने बावेल्स और जिंटिस के तर्क की अत्यधिक प्रकार्यवादी और विश्लेषण में अद्वंद्ववादी होने के कारण आलोचना की है।  हांलाकि मेरा मानना है कि ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में वो आधार मौजूद है जहां से पूंजीवादी शिक्षण के राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझा जा सकता है जैसा कि हमारे नवउदारवादी दौर में है।

बावेल्स और गिंटिस के अनुसार यदि पूंजीवाद के दबाव वाली शिक्षा को शक्तिशाली लोकतांत्रिक प्रतिरोध आंदोलनों द्वारा चुनौती नहीं दी गई तो इससे पूंजीपति वर्ग की अधिकारिता का विकास होगा जो कि उत्पादन और संकेंद्रण की आवश्यकताओं के अनुसार इसके साथ रहेगी। लेखकों का संबद्धता सिद्धांत ए जिसके अनुसार पूंजीवादी समाज शिक्षा के सामाजिक संबंध सामान्यतया उत्पादन के सामाजिक संबंधों से संवाद करते हैं, अपने आप में प्रामाणिक है। इसलिए शिक्षा सेवा उत्पादन के लिए है और उत्पादन व्यवस्था के श्रेणीबद्ध श्रमविभाजन को और ज्यादा बढ़ाती है। इस प्रकार पूंजीवादी समाज में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के दोनों प्रभावी उद्देश्यों- 1.उत्पादन के लिए श्रमिकों या श्रम शक्ति का निर्माण और 2.शिक्षा में शिक्षाकर्मियों की श्रमप्रक्रिया, को मूल रूप से वृहद अर्थव्यवस्था में उत्पादन संबंधों के अनुरूप ढाला जा रहा है।
   
इस दृष्टि से पूंजीवादी शिक्षण वैसी ही चेतना और व्यवहार विकसित करता है जो पूर्वस्थापित वर्ग और समूहों को ही पुनर्स्थापित करते हैं और इस तरह समग्र रूप में पूंजीवादी समाज में उत्पादन के सामाजिक संबंधों को मजबूती और वैधता मिलती है। श्रमजीवी और श्रमजीवी होने के लिए अभिशप्त वर्गों के विद्यार्थियों को नियमों के अनुसार व्यवहार करना सिखाया जाता है जबकि उच्चमध्यवर्ग या/और व्यावसायिक एवं प्रबंधकीय स्तर के लिए ही बने छात्रों को समाज के मूल्यों को आत्मसात करना सिखाया जाता है। (इन दोनों के बीच के लोगों को नियमों को मानने के साथ ही विश्वस्त होना भी सिखाया जाता है।)
  
प्रारंभिक एवं माध्यमिक स्तर पर शिक्षा कुछ ही हद तक वास्तविक कौशल विकास पर केंद्रित रहती है और भविष्य में रोजगार के लिए आवश्यक ज्ञान पर तो और भी कम, जो कि काम करते हुए ही या उत्तरमाध्यमिक शिक्षण (व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान और कॉलेजों) में प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार विद्यालय, शिक्षा के लिए कम जबकि व्यवहार संशोधन के लिए अधिक काम करते हैं ताकि बहुसंख्यक विद्यार्थियों को एकरस और मानकीकृत जीवन के लिए तैयार किया जा सके जिसमें अधिकांश आवश्यक रूप से अकुशल श्रमिक के रूप में रोजगार पाएंगे। दरअसल एकाधिकारी पूंजीवादी समाज के गिरे हुए कार्य वातावरण में अधिकांश रोजगार यहां तक कि स्नातक अर्हता वाले रोजगारों में भी औरपचारिक शिक्षा की कम ही आवश्यकता होती है।

संयुक्त राज्य में उच्चतम गुणवत्तायुक्त प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा सार्वजनिक विद्यालयों की जद से बाहर और बहुत कम संख्या वाले अतिसंभ्रांत निजी स्कूलों में ही प्राप्त हो सकती है। जो कि बहुत धनाड्य लोगों के बच्चों को ही समर्पित है और जिसका उद्देश्य शासक वर्ग को पैदा करना है। जैसे एनडोवर मैसाचुसेट्स में फिलिप्स ऐकेडमी, जहां जार्ज एच. डब्ल्यू. बुश और जार्ज डब्ल्यू. बुश दोनों ही पढ़े हैं, में एक साल की सिर्फ ट्यूशन फीस ही 32,000 डालर है। यहां प्रति 5 बच्चों में 1 शिक्षक है और एक संपूर्ण पाठ्यक्रम के साथ 73 प्रतिशत शिक्षक उन्नत डिग्रीधारी हैं। ऐसे स्कूल आईवी लीग के लिए रेड कार्पेट के रूप में देखे जा सकते हैं। 

इस तरह शिक्षा व्यवस्था को कई तरह से उत्पादन व्यवस्था के भीतर रोजगार की उठा-पटक, बढ़ती हुई असमानता और अलगाव से जुड़ा हुआ देखा जा सकता है। ‘स्कूलिंग इन कैपिटलिस्ट अमेरिका’ में विकसित यह तर्क असल में निर्णायकवादी नहीं है बल्कि यह वर्गसंघर्ष के मुद्दे को उठाता है। बावेल्स और जिंटिस के अनुसार,‘वह सीमा जिसमें पूंजीवादी व्यवस्था वास्तव में अपने लक्ष्यों को पूरा करती है समयावधि के अनुसार बदलती जाती है.... अधिकतर पूंजीवादी संबंधों को बढ़ाने और विस्तृत करने के लिए स्कूलों को प्रयोग करने की कोशिशों का शिक्षा व्यवस्था की आंतरिक गतिकी और लोकप्रिय प्रतिपक्ष दोनों के ही द्वारा विरोध हुआ है।’

इनकी किताब का ऐतिहासिक भाग विस्तृत रूप से, स्कूली छात्रों के हित में व्यवस्था के भीतर स्वायत्तता बनाए रखने के लिए मुख्यतया शिक्षकों के संघर्ष के रूप में दिखाई देने वाली शिक्षा व्यवस्था की आंतरिक गतिकी और शिक्षा प्रदाताओं, अभिवावकों और नागरिकों के अधिपत्य विरोधी आंदोलनों के रूप में उभरने वाले उन आंदोलनों की चर्चा करता है जो पूंजीवादी शिक्षण के खिलाफ समय-समय पर पैदा हुए हैं। फिर भी दोनों रूपों में संघर्ष केवल सतही लगता है क्योंकि इनके द्वारा कभी भी पूंजीवादी शिक्षण के आधारभूत सिद्धांतों पर जोरदार हमले नहीं किए गए। परिणाम स्वरूप सभी जगह कॉरपोरेट ऐजेंडा हावी है।         

एकाधिकारवादी पूंजी और शिक्षा के कॉरपोरेट ढांचे का उदय-

सार्वजनिक शिक्षा के प्रति इस प्रकार के वृहत राजनैतिक आर्थिक दृष्टिकोण का महत्व इस बात में है कि इससे संयुक्त राज्य में या और कहीं भी पूंजीवादी शिक्षण के विकास को संचालित करने वाले तर्कों को समझा जा सकता है। संयुक्त राज्य में सार्वजनिक शिक्षा की शुरूआत 19वीं शताब्दी में हुई। लेकिन जिस शिक्षा व्यवस्था को हम आज जानते हैं वह 19वीं सदी के आंखिरी और 20वीं सदी के प्रारंभ में उभरी। इसका आधुनिक विकास विशाल निगम अधिपत्य वाली एकाधिकारी पूंजीवादी व्यवस्था के उभार से जुड़ा हुआ है। अनुमान है कि केवल 1898 और 1902 के बीच विनिर्माण में अमेरिकी पूंजी का ‘एक चैथाई से एक तिहाई भाग’ विलय और अधिग्रहण के माध्यम से समेकित हुआ। इनमें 1901 में 170 अलग-अलग इकाइयों के विलय से  बने यूएस स्टील का निर्माण सबसे बड़ा है। जो कि स्टील उद्योग के 65 फीसदी को नियंत्रित करने वाला पहला एक अरब डालर का निगम था। यह वृहत व्यापारिक पूंजीवाद को दर्शाने वाले कॉरपोरेट संकेंद्रण के दौर का उदाहरण है।

संग्रहण के इस नए चरण के विकास और स्थितिकरण में एक निर्णायक तत्व इसमें निहित उस गुंजाइश में था जिसे मार्क्स ‘‘पूंजी के तहत श्रम के औपचारिक दोहन’’ के बजाय ‘‘वास्तविक दोहन’’ कहना पसंद करते थे।

19वीं शताब्दी के पूंजीवाद में श्रमिक इस स्थिति में थे कि वे कार्य किए जाने के तरीकों के ज्ञान के आधार पर अपने रेंक निर्धारित कर सकते थे और इस प्रकार श्रम प्रक्रिया में काफी हद तक उनका नियंत्रण था। इसलिए श्रमप्रक्रिया में मालिकों और प्रबंधकों का नियंत्रण औपचारिक अधिक था वास्तविक कम। एकाधिकारी पूंजीवाद के उदय के साथ निगम, कार्यबल और फैक्टरीयां बड़ी होती गई और यह संभव हुआ कि श्रम के विभाजन को बढ़ाया जा सके और इस प्रकार ऊपर से नीचे तक प्रबंधकीय नियंत्रण होने लगा। इसने संकेंद्रित उद्योग जगत में एक नए वैज्ञानिक प्रबंधन, ‘टेलरिज़्म’ का रूप ले लिया। श्रमप्रक्रिया में श्रमिकों का नियंत्रण व्यवस्थित ढंग से छिन गया और प्रबंधन द्वारा ही मनमाने ढंग से नियंत्रण किया जाने लगा। इस तरह प्रबंधकीय तर्क के अनुसार श्रमिक ऊपर से आने वाले आदेषों का पालन करने भर को रह गए और उनका प्रत्येक क्षण प्रबंधन द्वारा दिए गए छोटे-छोटे विवरणों से संचालित होने लगा।

अधिकतर श्रमिकों की कार्य करने की स्थितियों में हुए ह्रास को उद्योग जगत में वैज्ञानिक प्रबंधन की शुरूआत के मुख्य परिणाम के तौर पर हैरी ब्रेवरमैन ने 1974 में ‘लेबर एंड मोनोपोली कैपिटल’ में विश्लेषित किया है। एकाधिकरिक पूंजीवादी समाज मुख्य रूप से कौशल के ध्रुवीकरण के रूप में पहचाना जाता है जिसमें अधिक संख्या में अकुशल श्रमिकों की तुलना में कार्यकुशल श्रमिकों की कम मांग होती है।
   
कॉरपोरेट द्वारा बनायी गई शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य श्रमिकों का उत्पादन कर श्रम-बाजार के इन विभिन्न चरणों को भरना था। लेकिन साथ ही वैज्ञानिक प्रबंधन को भी श्रम प्रक्रिया को निर्देशित करने के लिए देखा गया ताकि स्कूलों के भीतर शिक्षक एक नए तरीके के कॉरपोरेट प्रबंधक बन जाएं।
संयुक्त राज्य में लूइस ब्रांडीस द्वारा 1910 में अंतर्राज्यीय कॉमर्स कमिशन में की गई उस पैरवी के बाद वैज्ञानिक प्रबंधन पहले पहल व्यापक तौर पर जाना गया जिसमें उन्होंने कॉरपोरेट लाभ बढ़ाने में कुशलता निर्माण की जादुई भूमिका की प्रशंशा की। इसे 1911 में फ्रैड्रिक विंस्लो की किताब ‘टेलर्स प्रिंसिपल्स ऑफ़ साइंटिफिक मेनेजमेंट’ ने विस्तार दिया जो कि शुरूआत में ‘अमेरिकन मैगजीन’ में किस्तों में छपी थी। वैज्ञानिक प्रबंधन और दक्षता विशेषज्ञ जल्द ही कॉरपोरेट कार्यकारियों के बीच और लोकाधिकारियों दोनों के बीच प्रसिद्ध हो गए और जल्द तेजी से सार्वजनिक स्कूलों के प्रबंधन तक पहुंच गए जहां मानक परीक्षण और टेलरीकृत स्कूल एक नए स्वप्नलोकीय कॉरपोरेट मॉडल स्कूल व्यवस्था के पारिभाषिक सिद्धांत बन गए।

इस प्रकार दक्षता विशेषज्ञ हैरिंगटन एमर्सन ने 1911 में न्यूयार्क के हाईस्कूल टीचर्स एशोशिएशन को एक भाषण दिया जिसे उन्होंने ‘साइंटिफिक मेनेजमेंट एंड हाईस्कूल इफीसिएंसी’ नाम दिया। उनके बारह में से अंतिम सात सिद्धांत मानक रिकार्ड्स, योजना, मानक स्थितियां, मानकीकृत ऑपरेशन्स, मानक निर्देष, मानक और योग्यता पुरस्कार थे। 1913 में शिकागो यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्रशासन के विशेषज्ञ फ्रैंकलिन बॉबिट ने ‘द सुपरविजन ऑफ़ सिटी स्कूल्स’ में लिखा-
कार्यकर्ताओं को, किए जाने वाले कार्य के लिए विस्तृत दिशा निर्देश, लक्षित मानक, प्रयुक्त क्रियाविधियों और प्रयोग किए जाने वाले उपकरण के विषय में पूरी तरह परिचित किया जाना चाहिए..... अध्यापकों को कार्य में मौज उड़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जब कोई ऐसी विधि मिल जाए जो कि अन्य से स्पष्ट रूप से बेहतर है तो ऐसी ही विधि को प्रयोग में लाना चाहिए। इस क्रियाविधि की अनदेखी करना और अपनी उदासीनता को अध्यापकों की स्वतंत्रता के नाम पर जायज ठहरना शायद शुरूआती अनुभववाद के दौर में उचित था जब सर्वेक्षक अध्यापकों को केवल पदोन्नत करते थे और वस्तुगत् तौर पर वे मानकों और विधियों के विषय में पद और फाइलों से थोड़ी ही अधिक जानकारी रखते थे।

बॉबिट चाहते हैं कि मानकीकृत कुषल तरीकों की आवष्यकता के कारण,‘‘अध्यापकों की स्वतंत्रता आवष्य ही कुछ संकुचित की जानी चाहिए’’। बॉबिट तो ये सुझाव भी दे गए हैं कि इमला लेखन करते हुए विद्यार्थियों की स्टॉप वॉच से जांचना चाहिए ताकि लेखन सिखाने में प्रयुक्त साठ मिनट के समय को प्रयोग करने का सबसे बढि़या तरीका जाना जा सके।  इसी तरह एक प्रभावशाली शिक्षण प्रशासक और सेन फ्रैंसिस्को पब्लिक स्कूल के अधीक्षक एलवर्ट कबर्ले ने 1916 में पब्लिक स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन में लिखा ,‘‘एक तरह से हमारे स्कूल फैक्ट्रियां हैं जिनमें कच्चे माल (बच्चे) को आकार दिया जाता है और जीवन की विविध आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादों में बदला जाता है।’’
न्यूयार्क शहर में स्कूलों के जिला अधीक्षक, जोसफ एस टेलर ने 1912 में लिखाः
(1) एक नियोक्ता के तौर पर राज्य को शिक्षकों के साथ सहयोग करना चाहिए क्योंकि शिक्षक हमेशा ही शिक्षा के विज्ञान को नहीं समझता है। (2) राज्य उन विशेषज्ञों को उपलब्ध कराए जो कि शिक्षकों का पर्यवेक्षण कर पाएं और सर्वाधिक कुशल और किफायती प्रक्रियांओं के बारे में सुझाव दें। (3) व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह की कार्य प्रणाली स्कूलों में भी अपनाई जाय जिसमें दिया गया कार्य निश्चित शर्तों के साथ पूरा किया जाय। (4) जो अध्यापक दिए गए कार्य को पूर्ण करे उसे बोनस दिया जाय जो कि पैसे के रूप में ना होकर एक रेटिंग के रूप में हो जो पैसे के रूप में बदला जा सके। (5) कार्य में अक्षम लोगों को निकाल दिया जाए।
इस पद्यति में शिक्षकों की कार्यकुशलता को प्राथमिक रूप से उनके छात्रों के परीक्षण के माध्यम से मापी जानी थी। इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध से ठीक पहले मानकीकृत परीक्षणों के द्वारा मानक विकसित किए जाने पर बहुत अधिक जोर दिया गया। 1911 में नेशनल एजूकेशन एसोसिएशन (एनईए) ने स्कूलों में कुशलता की परीक्षा और मानकों पर एक कमेटी का गठन किया। जब आईक्यू टेस्टिंग और अन्य प्रच्छन्न नस्लवादी जांच के तरीकों के प्रचलन के समय ही हुआ।

कारपोरेट प्रभुत्व वाली मानकीकृत शिक्षाव्यवस्था के निर्माण के पहले प्रयास उस समय उभरे नए परोपकारी कर-मुक्त संगठनों द्वारा किए गए। एंड्रयू कार्नेगी, जॉन डी. राॅकेफेलर और हैनरी फोर्ड जैसे अरबपतियों ने निजी संगठन स्थापित किए जिनमें बड़े सामाजिक परिवर्तनों को गति देने के लिए सरकार की भूमिका को संकुचित करते हुए परोपकार के तौर पर वित्त की व्यवस्था की गई। कार्नेगी फाउण्डेशन टैस्टिंग एवं सुजननिकी दोनों में अग्रणी था। इसने 1954 के दौरान टैस्टिंग में 6,424,000 डालर का निवेश किया। 1965 में इसने नेशनल एसेसमेंट ऑफ़ ऐजूकेशनल प्रोग्राम के विकास की शुरूआत की। राॅकफेलर फाउण्डेशन ने 1930 और 1940 के दौरान ऐजूकेशनल टैस्टिंग सर्विस के निर्माण में भारी योगदान दिया।  

प्रारंभिक कॉरपोरेट शिक्षा आंदोलन की असफलता

लेकिन 19वीं शताब्दी में एकाधिकारी निगमों और परोपकारी फाउण्डेशनों के कठोर मानकों और टैस्टिंग वाले कॉरपोरेट मॉडल स्कूलों के विकास में किए गए अत्यधिक प्रयासों के बावजूद भी पब्लिक स्कूल कई तरीकों से उनके नियंत्रण के बाहर रहे। स्कूल अकसर ही प्रगतिशील शिक्षकों, अभिभावकों और समुदायों के बीच से उभरने वाले लोकतांत्रिक संघर्षों के केंद्र में रहे थे। शिक्षक काफी हद तक स्वायत्ता प्राप्त एवं स्वयं को कामगार तबके के बच्चों से जुड़ा पाने वाले और श्रम सघन क्षेत्र में कम वेतन पाने वाले पेशेवर थे। शिक्षकों के संगठन उभरे जिनके माध्यम से उन्होंने सार्वजनिक स्कूलों में वेतन और कार्यस्थितियों के बारे में न्यूनतम मोलभाव करने की स्थितियां बनाई।

पूंजीवादी शिक्षा की परिणामी व्यवस्था में बहुत गंभीर खामियां थी। एक गहरे रूप में बंटे हुए समाज के तौर पर संयुक्त राज्य संस्थागत रूप से नस्लवादी बना रहा। जैसा कि 2005 में आई जाॅनाथन कोजोल की किताब ‘द शेम ऑफ़ द नेशन’ में संयुक्त राज्य के स्कूलों में नस्लीय स्तरीकरण में दिखता है। 20  पाठ्यक्रम के स्तर को अकसर कॉरपोरेट्स के द्वारा की जाने वाली अकुशल और नम्य श्रमशक्ति की मांग के हिसाब से गिराया गया है। फिर भी, प्रगतिशील अध्यापक सभी बाधाओं के बावजूद बच्चों की वास्तविक जरूरतों के लिए व्यवस्था के बुरे पहलुओं के खिलाफ लडे़। अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ टीचर्स की पत्रिका ‘द अमेरिकन टीचर’ ने 1912 में स्कूलों में वैज्ञानिक प्रबंधन के खिलाफ एक आलेख छापा। जिसमें लिखा थाः
संगठनों और स्कूलों के तरीकों ने वाणिज्यिक उद्यमों का रूप ले लिया है जिनसे हमारा आर्थिक जीवन पहचाना जाता है। हमने ‘बड़े उद्योगपतियों’ के घमंड को स्वीकार लिया है, साथ ही उनके योग्यता के मानकों को भी बिना प्रश्न किए स्वीकारा है। हमने शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों के परिणाम का मानक ‘कीमत और उत्पाद’ के रूप में स्वीकार कर लिया है जैसे कि किसी फैक्ट्री या डिपार्टमेंट स्टोर में होता है। लेकिन चूंकि शिक्षा का वास्ता व्यक्तित्वों से है, इसलिए यह किसी मानकीकृत निर्माण प्रक्रिया की तरह नहीं है। शिक्षा की क्षमता को छात्रों के प्रति घंटे के वेतन के आधार पर नहीं बल्कि मानवतावाद, काम कर सकने और प्रोत्साहन करने को बढ़ाने की क्षमता के रूप में मापना चाहिए।

शिक्षा की साख बनी रही क्योंकि शिक्षक, अभिवावकों और समुदाय के सदस्यों के द्वारा अकसर ही पूंजीवादी शिक्षण के जोर का विरोध किया है। बदलती परिस्थितियों ने प्रगतिशील शिक्षा आंदोलनों की कड़ी को उभारा।  जैसे कि 1920 और 30 के दशक में जॉन डेवी से जुड़ा हुआ लोकतांत्रिक और प्रायोगिक शिक्षा आंदोलन, सिविल राइट आंदोलन के दौर में स्कूल अलगाव विरोधी आंदोलन, 1960 और 70 के दशक मुफ्त शिक्षा आंदोलन। 1916 में ‘डैमोक्रेसी इन ऐजूकेशन’ में कहा ‘शिक्षा, किसी बड़े दायरे की सीखने की प्रणाली की अधीनस्थ जैसी कोई विशेषीकृत प्रक्रिया नहीं है। शिक्षण का सर्वोत्तम रूप जीवन से ही सीखने की प्रवृत्ति और उन परिस्थियों का निर्माण है जिससे कि सभी लोग जीवन की प्रक्रिया में ही सीख सकें।’

1916 में रेडिकल न्यूयार्क टीचर्स यूनियन (टीयू) का अभ्युदय हुआ। अभिवावकों और समुदायों दोनों के साथ गठजोड़ बनाते हुए टीयू नस्लीयविभेद और गरीबी के खिलाफ, इन्हें विद्यार्थियों की सफलता में मुख्य बाधा मानते हुए लड़ा। इस प्रकार के शिक्षा दर्शन का लक्ष्य पूरे समाज के रूपांतरण की जरूरत पर जोर देना था। आज के ‘सामाजिक आंदोलन एकतावाद’ के समरूप शक्तिशाली विकल्प को प्रस्तुत करने वाले टीयू का अस्तित्व शीतयुद्ध के दौर में वामपंथियों के नाम पर खत्म कर दिया गया। इग्यारह सौ के करीब स्कूल कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया और चार सौ से ज्यादा लोगों को बाहर निकाल दिया गया। 1950 में न्यूयार्क बोर्ड ऑफ़ ऐजूकेशन ने स्कूलों में टीयू की गतिविधि को प्रतिबंधित करने के लिए कुख्यात टीमोन रिज्योल्युशन अपनाया।

हालांकि इन प्रगतिशील शिक्षा आंदोलनों में से कोई भी अमेरिका में प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा में वास्तविक उद्धार की दिशा में बदलाव करने में सफल नहीं हुआ और 20वीं शताब्दी के अंत में शिक्षा में व्याप्त असमानता, गरीबी, संस्थागत् नस्लवाद और आर्थिक मंदी के प्रभावों से शिक्षा को बचा पाने में सफल नहीं हुआ। लेकिन ये आंदोलन सार्वजनिक क्षेत्र में शिक्षा में बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने और भविष्य में समतावादी शिक्षा की संभावनाओं की उमींदों को संरक्षित रखने में सफल हुए। 

साभार-पत्रकार praxis