Friday, 27 July 2012

जिंदगी को
               वह गढ़ेंगे जो शिलाएं तोड़ते हैं
               लो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं|
               यज्ञ को  इस श्रम शक्ति के
                                    श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ |
जिंदगी को
               वह गढ़ेंगे जो खदाने खोदते हैं
               लौह के सोये असुर को कर्म रथ में जोतते हैं |
               यज्ञ को इस श्रम शक्ति के |
                                     श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ |
जिंदगी को
               वह गढ़ेंगे जो प्रभंजन हांकते हैं
               शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आंकते हैं |
               यज्ञ को इस श्रम शक्ति के
                                       श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ |
जिंदगी को
               वह गढ़ेंगे जो प्रलय रोकते हैं
               रक्त रंजित धारा पर शांति का पथ खोजते हैं |
               यज्ञ को इस श्रम शक्ति के
                                        श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ |
              मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूंगा
              खूबसूरत जिंदगी की नौजवानी भोग लूँगा
                                                                                 --केदारनाथ अग्रवाल 

Wednesday, 25 July 2012

साथियों        
            आज प्रत्येक  ब्यक्ति अलगा  वग्रस्त  है ,लोगों की जिंदगी में घुटन और ऊब है ,भीड़ में अकेलेपन के एहसास से वे बुरी  तरह ब्यथित हैं ,जिसके कारण सामाजिक मूल्यों-संबंधों का नकार ,निराशा और बेचैनी ,निराशा और आत्महत्या जैसी प्रवृतियाँ बढ़ रही हैं |समाज से कटा इंसान खुद में घुटकर जीने को अभिशप्त है |एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति जो लगाव और जुडाव होना चाहिए वह धीरे -धीरे खत्म होता जा रहा है |लोगों के आपसी दोस्ताना सम्बन्ध ,माँ -बाप ,भाई -बहन और पति -पत्नी के संबेदनशील रिश्ते निजी स्वार्थ की भेंट चढ़ते जा रहें हैं |इस प्रकार  की परस्थितियाँ  जब समाज मे पैदा होती हैं तो मनुष्य ऊब और घुटन महसूस करने लगता है और इसी को अलगाव कहते हैं |निर्जीव बस्तुवों और मालों के प्रति प्यार और अंधभक्ति रखने वाला इंसान अपने जैसे जीते-जागते इंसान के प्रति संवेदना रहित कैसे हो जाता है ?पड़ोस में क्या हो रहा है ,उसे इसकी जानकारी ही नहीं होती ;यहाँ तक कि बड़े शहरों में लोग अपने पड़ोसी को पहचानते तक नहीं |
               लोगों को आपस में जोड़ने के लिए विभिन्न धार्मिक संगठन और सत्संग बनाये गए लेकिन वो खुद ही अलगाव के शिकार हो गए |विविध तरह के धार्मिक संघटनों के बीच कभी न पाट सकने वाली खाई है |ये संघटन जोड़ने का कम तोड़ने का काम  ज्यादा कर रहे हैं |अलगाव बढती प्रकृति को लेकर समाज में कोई सार्थक बहस और हलचल नहीं है |विचारणीय प्रश्न ये है कि जिस रंगीन दुनिया में हम जी रहे हैं उसमे हम अजनवी होने के लिए क्यों अभिशप्त हैं ?अलगाव को समग्रता में समझने के लिए व्यापक बहस-मुबाहिसे की जरूरत है ,लेकिन संक्षेप में हम समझ सकते हैं कि इंसानी रिश्ते  ऐसे होने चाहिए कि एक ब्यक्ति की तकलीफ दूसरा भी महसूस करे |इस प्रकार के रिश्ते एक ऐसे समाज में ही पनप सकते हैं जिसकी बुनियाद स्वार्थ पर न टिकी हो |
            पुराने समुदाय परस्पर बंधन और एकजुटता की भावना पर आधारित लोगों का समूह होते थे ,जो स्वार्थपरता के बजाय परंपरागत मूल्यों-मान्यतायों द्वारा संचालित होते थे |पहले कुटुंब-कबीले में जो भाईचारे का रिश्ता था ,उसे धीरे-धीरे नयी उपभोगता वादी संस्कृति खत्म करती जा रही है ,जबकि आज शहरी और पूंजीवादी ढांचे के भीतर से पैदा हुए क्लब ,सामाजिक संस्थाये पेशागत संस्थांए और संस्थांए ब्यक्तिगत उद्देश्यों और लक्ष्यों की पूर्तिका साधन होने के चलते बनाये और कायम रखे जाते हैं ,इसमें लोगों का जुडाव सतही  ,एकांगी और स्वर्थारक होता है |इसे बनाये रखने के लिए लोगों की इच्छा के बजाय पुलिस प्रशासन और कानून जैसी  दमनकारी संस्थावों का सहारा लिया जाता है |इन संस्थावों  से जुड़े ब्यक्ति एक दूसरे से सम्पूर्णता में नहीं केवल एक पहलू से जुडते हैं जो उनके तात्कालिक स्वार्थ के अनुकूल हैं |इसलिए ये लोगों के अलगाव को दूर नहीं कर सकती |
           परिवार टूट रहें हैं ,लाखों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहें हैं ,करोडो नौजवान बेघर -बार नौकरी की तलाश में सडकों पर धक्के खा रहें हैं इतना सब होते हुए भी इन समस्यावों  से लढ़ने  के लिए लोंगों में एकजुटता  क्यों नहीं है ?आज हममे से ज्यादातर लोग सूवर से बेहतर जिंदगी नहीं गुजार रहे हैं ,जो अपनी बगल में दूसरे सूवर को काटते-मरते देखने के बावजूद मस्त होकर खता पीता रहता है  वास्तव में इस पूंजीवादी समाज ने इंसानी संवेदना के धरातल से लोगों को इतना नीचे गिरा दिया है कि खाने-पीने और सेक्स जैसे पशुवत कामों में ही ज्यादातर लोग आनंद महसूस करते हैं ,और जिंदगी गुजार  देते हैं |अपनापन प्यार ,त्याग और उच्च आदर्शों जैसे सच्चे मानवीय सा र तत्व से वे उम्र भर अनजान रहते हैं |
            अलगाव का शिकार बनाती इस ब्यवस्था को क्या हमें  यूं ही बर्दाश्त करते रहना चाहिए और खुद भी इस ब्यवस्था में घुटकर गुमनाम मौत मर जाना चाहिए ?नहीं हम मिलकर हालात बदल सकते हैं |आईये चलें ,कदम से कदम मिलकर ,एकजुट होकर ,एक ऐसे समाज की नींव रखें ,जहाँ सच्चा मानवीय रिश्ता पनप सके |जिस समाज में अजनबियत हावी न हो जहाँ सब एक दूसरे के साथ जियें,जहाँ मनुष्य के लिए जीनी के सभी साधन उपलब्ध हों |
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Tuesday, 24 July 2012

मुफलिसों की ईद

अहल -ए- दवल  में धूम की रोज-सा ईद
मुफलिस के दिल में थी ना किरण
भी उम्मीद की
इतने में और चर्ख ने मट्टी
पलीद की
बच्चे ने जो मुस्करा के खबर दी जो ईद की
वर्त-ए-मिहान से नब्ज की रफ़्तार
रुक गई
माँ बाप की निगाह उठी और
झुक गई
आँखे खुली कि दस्त-ए-तिही पर नजर गई
बच्चे के बलबलो की दिलों तक खबर गई
जुल्फ-ए-सबात गम की हवा से
बिखर गई
बरछी सी इक दिल से जिगर तक उतर गई
दोनों हुजूम-ए-गम से हम-आगोश हो गए
इक दुसरे को देख के खामोस हो गए
  

                                       -जोश मलीहाबादी
                                         --

Monday, 23 July 2012

दलित उत्पीडन

  • दलितों पर हो रहे लगातार अत्याचार को देखते  हुए संसद ने १६ अगस्त १९८९ में एक नया प्रभावी कानून बनाया जिसे आ.जा./अनु.जा अत्याचार निवारण अधिनियम १९८९ के नाम से जाना जाता है |इस अधिनियम में दंड का प्रावधान है |यह ३० जनवरी १९९० से भारत में लागू  है | इस अधिनियम के ला |गू होने के उपरांत दलितों पर अत्याचार रुके नहीं बल्कि दिन प्रतिदिन बढते ही जा रहें हैं |

    - ९-२- १९९१ १४ दलितों कि हत्या [किसान संघ द्वारा ] तिस्खोरा विहार
    -२३-६-१९९१ १४ दलितों कि हत्या [सामंती गुंडों द्वारा ] देव सहियारा विहार
    -२६-१२-१९९७ ९ '' '' '' '' '' '' '''' '' '' ''[सवर्ण फ्रंट द्वारा ]मीन बरसिया 
  • -२६-३-१९९७  १० '' '' '' '' '' '' '' '' '' ''[रणबीर सेना द्वारा ]हैबस्पुर
  • -१९९७            ६१ '' '' '' '' '' '' '' '' '' [रणबीर  सेना ]
    -२५-१-१९९७   २३ '' '' '' '' '' '' '' '' '' [रणबीर सेना ]  शंकर बिगहा
    १६-६-२०००    ३३ '' '' '' '' '' '' '' '' '' [रणबीर सेना ]मियांपुर 

  • आंकडो कि लिस्ट लंबी है \इन घटनावों से साफ जाहिर है कि कानूनी उपायों और सतही सुधारों से दलित उत्पीडन और अत्याचार का उन्मूलन संभव नहीं और ना अमीर  खान के जैसे प्रोगामों से |