Sunday, 12 November 2017

ज्ञान का महाकुंभ या कुछ और

कौन बनेगा करोड़पति प्रोग्राम की सराहना तो जबसे यह पहली बार शुरू हुआ था तबसे कई लोगों के मुख से सुनी जा रही है। लोग कहते हैं कि देखिये यह है प्रोग्राम!! जो नौज़वानों में "ज्ञान" पाने के लिये "इच्छा" पैदा करता है। वैसे भी आजकल के स्कूलों और कालेजों में तो ज़यादा ज्ञान मिल नहीं पाता इसलिए बच्चों को टीवी के माध्यम से ही सामान्य ज्ञान देने का काम और ज्ञान पाने के प्रति "जिज्ञासा" पैदा की जा रही है!! कई पढ़े-लिखे मध्य वर्ग के माता-पिता यह कहकर इस प्रोग्राम सराहना करते हैं कि यह उनके बच्चों में "सामान्य ज्ञान" के प्रति "जागरुकता" ला रहा है। वैसे लोगों की बाते सुनकर थोड़ा विचार करने के बाद तो ऐसा लगता है कि यह प्रोग्राम ज्ञान पाने की जिज्ञासा से ज़्यादा, बिना कुछ किये मुफ्त में पैसा बनाने की जिज्ञासा को ज़्यादा बढ़ावा देता है।
आगे बढ़ने से पहले इसके द्वारा "ज्ञान" के प्रचार के पीछे जो पैसा टीवी चैनल वाले और प्रोग्राम के मेजबान कमा रहे हैं उसकी बात यहाँ नहीं करेंगे सिर्फ इसके द्वारा किये जा रहे प्रचार की बात ही करेंगे। इस प्रोग्राम के प्रशंसको की बातों को छोड़ देते हैं और कार्यक्रम के माध्यम से जिस तरह की बातों का अप्रत्यक्ष प्रचार मध्य वर्ग के लोगों में होता है उसकी थोड़ी संक्षिप्त चर्चा करते हैं। हर दिन की जिंदगी में टीवी-मनोरंचन-विलासिता में डूबे रहने वाले या एक सुखी जीवन के सपने देखने वाले मध्य-वर्ग के कई लोग मुख्य रूप से इस प्रोग्राम के प्रसंशक होते हैं। लोगों से सामान्य ज्ञान के सवाल पूँछकर हर सवाल के बदले में पैसे में बढ़ोत्तरी करने की जो रूपरेखा इस प्रोग्राम में तय की गई है और जिस तरह का पूरा प्रचार और माहौल इस शो के लिये तैयार किया जाता है वह अप्रत्यक्ष रूप से कई प्रकार से वर्तमान व्यवस्था के हित में एक काल्पनिक और झूठा विश्व दृश्टिकोंण लोगों के बीच स्थापित करने का काम करता हैं।
इसी क्रम में पहला सामान्य प्रचार जो इस प्रोग्राम के ताने-बाने के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में होता है वह है कि यदि आपके पास ज्ञान हो तो क्षरण-विघटन के शिकार सम्पत्ति केन्द्रित समाज में "पैसों" को बड़ी आसानी से एक कुर्सी (हाट सीट) पर बैठ कर सिर्फ सवालों का जबाव देकर कमाया जा सकता है। अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह के दृश्य और संवाद जिनमें अमिताभ बच्चन काफी प्रभावसाली ढंग से अपनी बात रखते हैं, और प्रत्याशी से सवाल करते हैं, वह वर्तमान समय की अमानवीय अंधी पूँजीवादी प्रतिस्पर्धा को सही सिद्ध करने का काम करते हैं, जिसका सामान्य असर लोगों के विचारों पर यह होता है कि जो लोग पैसे नहीं कमा पा रहे हैं, चाहे वे शारीरिक रूप से कितनी भी मेहनत करते हों, उन्हें बताया जाता है कि "ज्ञान" की कमीं के कारण वे इसी लायक हैं। मध्यवर्ग के कुछ असफल नौजवान भी इसके प्रभाव में हीन भावना से ग्रस्त देखे जा सकते हैं। यानि मध्यवर्ग के आम आदमी के दिमाग में यह बात गहरे स्तर तक बैठा दी जाती है कि यदि वह "ज्ञान" पाने के लिये मेहनत करे तो सफ़लता प्रप्त कर सकता है। इसलिये करोड़ों लोगों की बदहाली और बेरोजगारी का मुख्य कारण उनके पास "ज्ञान" का न होना है। यानि लोगों की सोच के दायरे को संकीर्ण तो किया ही जाता है, जो अपने आसपास से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था में अपनी स्थिति के बारे में कभी नहीं सोच पाता, कि पूरे समाज के मेहनत करने वाले लोग कुछ सम्पत्ति धारी लोगों के फायदे के लिये काम कर रहे हैं, साथ ही व्यवस्था के पक्ष में कुछ अवैज्ञानिक कूपमंडूक विचार भी उनके दिमागों में भर दिये जाते हैं।
कई लोग इस प्रोग्राम में हिस्सा लोने के लिए सामान्य ज्ञान की तैयारी तक करते हैं, और जो प्रत्याशी कुछ जीत कर जाते हैं उनको भी प्रोत्साहित किया जाता है कि वे अपने "ज्ञान" प्रप्त करने की कड़ी मेहनत का हवाला दर्शकों के सामने देकर ही जाएँ। कुछ माता-पिता जीतने वाले "ज्ञानी" व्यक्ति की तारीफ करके अपने बच्चों को भी पैसे कमाने के लिए ज्ञान प्रप्त करने का उत्साहन देते हैं। कुछ बच्चे खुद ही इतने मोटिवेट हो जाते हैं कि वह सफलता (यानि कि पैसा) पाने के लिए अपने "ज्ञान" को बढ़ाने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार ऐसे प्रोग्राम लोगों के सामने सम्पत्ति केन्द्रित व्यवस्था की अराजकता और इसमें हो रहे करोड़ों लोगों के शोषण और उनके साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार की सच्चाई को जनता की नज़रों से छुपाने का काम बखूबी निभाते हैं। और हर व्यक्ति को वर्तमान अमानवीय व्यवस्था में आजीविका कमाने के लिये मची प्रत्स्पर्धा की अन्धी दौड़ में सफलता पाने के लिये झपट पड़ने की सलाह देता है। इनके माध्यम सलोगों के सामने सिद्ध किया जाता है कि इस व्यवस्था में कोई गलती नहीं है, बल्कि मुख्य दोष गरीब लोगों में "ज्ञान" की कमी का है, जिसके कारण वे गरीब हैं। इस प्रकार यह प्रोग्राम समाज में मौज़ूद वर्गों की मानवद्रोही ऐतिहासिक सच्चाई को लोगों की नज़रों में धूमिल करने के साथ एक संदेश यह भी देता हैं जो लोग आराम से विलासिता का जीवन जी रहे हैं वे अपने ज्ञान के बल पर सफल होने के कारण ऐसा कर पा रहे हैं।
इसका एक और मैसेज लोगों के बीच यह भी पहुँचता है कि ज्ञान प्रप्त करने का मुख्य उद्धेश्य समाज के लिये किसी वैज्ञानिक कार्य या अनुसंधान या किसी टेक्नोलोजी का विकास नहीं, बल्कि व्यवस्था के अंदर अपने ज्ञान के बूते पर प्रतिस्पर्धा में सफल होकर अपने लिये कुछ हासिल करना होना चाहिये।
इन सभी मानव-द्रोही दृश्टिकोंणों का प्रचार मध्य वर्ग के आम लोगों और कई सिविल सर्विस, इंजीन्यरिंग या किसी अन्य प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले उन नौजवानो को काफ़ी प्रोत्साहित करता है जो विज्ञान, टेक्नोलाजी, डाक्टरी, और यहां तक कि सिविल सर्विस की तैयारी तक अपना कैरियर बनाने की मनोवृत्ति से करते हैं, जिनके लिये समाज की सर्विस करना कोई मायने नहीं रखता और जिनका उद्धेश्य सिर्फ एक व्यक्तिवादी सामाजिक पोजीसन और पैसा कमाना होता है। यह व्यक्तिवादी, समाज-द्रोही नैतिक मूल्य मध्य-वर्ग के खाये अघाये और मंदिरों-मस्जिदों में दीन पुण्य करने वाले लोगों के लिये ईश्वरीय प्रवचनों से कम नहीं होते हैं। वास्तव में यह मूल्य 1791 में हुई फ्रांसीसी क्रांति के उन पूँजीवादी मूल्यों से भी कोई मेल नहीं रखते जहाँ समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व का नारा दिया गया था। और आज कल के यह पैसा कमाने के नैतिकता के प्रचार करने वाले मूल्य वास्तव में उन नैतिक मूल्यों से भी कोसों दूर हैं जो हमारे बचपन में नैतिक शिक्षा और पौराणिक कथाओं या धार्मिक ग्रन्थों में दिये जाते थे। वैसे आजकल जिस प्रकार का लूट-मार पूरी दुनिया की प्रतिक्रियावादी पूँजीवादी साम्राज्यवादी ताकतों ने मचा रही है उसमें इसी प्रकार के मूल्यो का प्रचार संभव है और व्यवस्था की आवश्यकता भी है। और इसमे 1791 में उठाये गये उन मानवतावादी मूल्यों की भी अपेक्षा नहीं की जा सकती जिसमे हर व्यक्ति के लिए समानता-स्वतंत्रता-बंधुत्व का नारा दिया गया था। वैसे सम्पत्ति आधारित समाज में यह संभव भी नहीं है कि मेनस्ट्रीम मीडिया, जो स्वयं पैसे वालों का भोपू है वह प्रगतिशील विचारों का प्रचार लोगों के बीच करेगा।
कुछ लोग कहेंगे कि यह मनगढ़ंत बाते हैं, लेकिन वास्तव में इन सभी मूल्यों का संप्रेषण करने के लिये प्रोग्राम में किसी संवाद या किसी दृश्य की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह प्रोग्राम देखने वाले व्यक्ति के स्वयं के विचारों के माध्यम से इस तरह का पूरा ताना बाना उसके सामने खड़ा कर देता है। नहीं तो ज्ञान के बदले में एक करोड़ का उपहार देकर आम लोगों के सामने क्या उदाहरण प्रत्तुत किया जा सकता है, यह इन सच्चाई को "मनगढ़ंत" कहने वाले लोगों से पूँछना चाहिये।
अब, इन मूल्यों के बीच पल रहे लोगों की बात करें तो पूरी व्यवस्था एक ओर इस तरह के मानवताद्रोही कूपमंडूक विचारों का प्रचार करके लोगों को प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे का दुश्मन और उसके विचारों के दायरे को सिकोड़कर पैसा कमाने की व्यक्तिवादी सोच तक सीमित करती है, और जब यही लोग भष्मासुर की तरह पैसा कमाने के लिये भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और सामाजिक व्यवस्था की जड़ों को खोदने लगते हैं तो पूँजीवाद के नीति-निर्माता, सामाजिक कार्यकर्ता और ए.जी.ओ. पंथी हाय तौबा मचाते-फिरते हैं, कि हमें इस व्यवस्था को साफ सुथरे लोगों की ज़रूरत है, सभी को एकजुट होकर खड़े होना चाहिए। और मजे की बात तो यह है कि यह लोग मध्यवर्ग के उन्हीं लोगों को साथ लेकर सफाई करने का सपना देखते हैं और कुछ नैतिकता की नसीहते देते हुए दिखते हैं, जो स्वयं किसी मौके की तलास में रहते हैं कि कैसे ज़्यादा सफ़ल बना जाये और कैसे करोड़ों रुपया किसी तरह कहीं से बिना काम के सिर्फ "ज्ञान" की बदौलत मिल जाये।
इस प्रकार के प्रोग्रामों का खूब प्रचार किया जाता है और मध्यवर्ग के लोगों में खूब सफलता इन्हें मिलती है। ऐसी परिस्थितियों में भेंड़चाल की मनोवृत्ति पैदा करने के लिये जिस तरह से लगातार प्रयास किये जा रहे हैं, उसके बीच कुछ संभावना संप्पन्न प्रगतिशील नौजवानो को समाज को परिवर्तन की दिशा में आगे ले जाने के लिये, और रूढ़िवादी विचारधारा का विरोध करने के लिए हमें विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है। वैसे यह व्यवस्था स्वयं ही अपने भष्मासुर इन व्यक्तिवादी लोगों के रूप में पैदा कर रही है जिनके खुले मानवद्रोही काम सभी के सामने पूरी व्यवस्था की पोल ख़ुद ही खोल देते हैं। और मंदी के माहौल में महंगाई, बेरोज़गारी और भविष्य कीअनिश्तचतता के बीच नौजवानों को स्वयं ही इस व्यवस्था का विकल्प तलासने की इच्छा पैदा कर देती है।

साभार :-स्पार्क आफ चेंज ब्लाग