Friday, 28 September 2012

शंकराचार्य का रचनाक्रम - समीक्षा



आधुनिक समय में जब दर्शन अपनी पुरातन सीमाएं लांघकर सुविकसित और सुसंगत हो चुका है, यह आवश्यक है कि भारतीय दर्शन की समीक्षा की जाए और इसमें उपस्थित बुद्धिवादी, वस्तुगत और तर्कपरक चिंतन और चिंतकों के विचारों को जनता के समक्ष रखा जाए जिससे कि वे इससे लाभान्वित हो सकें. भारतीय दर्शन की समीक्षा विज्ञान आधारित दृष्टि और तर्क के आधार पर करने पर हमें ज्ञात होता है कि यहाँ दर्शन का एक समृद्ध इतिहास रहा है और तार्किक चिंतन को प्रश्रय देने वाले कई मत और संप्रदाय रहे हैं. वहीं दूसरी ओर तर्कपूर्ण चिंतन और ज्ञान की निंदा करने वाले और विश्व की भ्रमपूर्ण व्‍याख्या करने वाले दार्शनिकों की भी कोई कमी नही रही है. इस लेख का विषय शंकराचार्य के रचनाकर्म की इसी दृष्टि से समीक्षा करने और तर्कपरक बुद्धिवादी चिंतन के प्रति उनके दृष्टिकोण की व्याख्या करना है.

शंकाराचार्य वेदांत के अद्वैत मत के व्याख्याकार थे. इनका जन्म केरल के मालबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर शिवगुरु नम्बूदरी के यहाँ हुआ था. बत्तीस वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हुई. शंकराचार्य ने महर्षि बादरायण के सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखने के अतिरिक्त ग्यारह उपनिषदों तथा गीता पर भी भाष्य रचे एवं इन्होंने बौद्ध महायानियों की रणनीति का अनुसरण करते हुए देश के चारो कोनों में चार मठ स्थापित किये.इन्‍होंने ब्रह्मसूत्र पर लिखे अपने प्रसिद्ध भाष्य में वेदान्त को नया विस्तार दिया एवं अद्वैत वेदान्त के पूर्व व्याख्याकार आचार्य गौड़पाद के दर्शन को सुविकसित रूप प्रदान किया.

शंकर और उनकी सामाजिक दृष्टि

हम जानते हैं की एक धर्म शास्त्र प्रणेता के रूप में मनु के विचार शूद्रों के प्रति विद्वेषपूर्ण थे. शंकर का निरपेक्ष मूल्यांकन उन्हें एक ऐसे दार्शनिक के रूप में सामने रखता है, जो मनु द्वारा प्रतिपादित उसी ब्राह्मणवादी विचारधारा के प्रतिनिधि विदित होते हैं. उनके दृष्टिकोण में सामान्य लोगों एवं उनके द्वारा भौतिकता को सम्मान देने की परम्परा के प्रति गहरे विद्वेष की भावना है. शूद्रों के तथाकथित ज्ञान प्राप्ति के अधिकार को ख़ारिज करने के लिए ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र-भाष्य के एक खंड में वे मनु के उस अनुच्छेद को उद्धृत करते हैं, जिसमे मनु ने शूद्रों के प्रति अपने घृणापूर्ण विचार व्यक्त किये हैं. शंकर उत्तर देते हैं कि शूद्र इस दार्शनिक गूढ़ ज्ञान के अधिकारी क्यों नही हैं, शंकर कहते हैं -

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः यदस्य स्मृतेः श्रवणाध्ययनार्थप्रति प्रतिषेधो
भवति। वेदश्रवणप्रतिषेधः , वेदाध्ययनप्रतिषेधः , तदर्थज्ञानानुष्ठानयो च
प्रतिषेधः शूद्रस्य स्मर्यते । श्रवणप्रतिषेधस्तावत् - ’अथ हास्य
वेदमुपश्रृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम् ’ इति: ’पद्यु ह वा
एतच्छमशनं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम् ’ इति च।

अत एवाध्ययनप्रतिषेधः। यस्य हि समीपेऽपि नाध्येतव्यं भवति, स
कथमश्रुतमधीयीत। भवति च -- वेदोच्चारणे जिह्वावाच्छेदः , धरणे शरीरभेद
इति । अत एव चार्थावर्थज्ञानानुष्ठानयोः प्रतिषेधो भ वति -- ’ न शूद्राय
मतिं दद्यात् ’ इति , द्विजातीनामध्ययनमिज्या दानम् इति च। 
(ब्रह्मसूत्र भाष्य ॥१.३.३८॥

अर्थात - शूद्र का इस कारण भी अधिकार नहीं है कि मनु स्मृति उन्हें वेद के अध्ययन, वेद-श्रवण और वैदिक विषयों के निष्पादन से भी वर्जित करती है. निम्नलिखित अवतरण के अनुसार उन्हें वेद श्रवण से वर्जित किया गया है.

- जो (शूद्र) वेदों को सुने, उसके कानों मे सीसा और लाख (पिधला हुआ) भर देना चाहिए.
- शूद्र श्मशान (के समान) हैं, इसलिए शूद्रों के निकट (वेदों का) पाठ नही करना चाहिए.

इस प्रकार एक शूद्र के लिए वेदाध्ययन वर्जित है, अतः जब शूद्रों के निकट वेदों का पाठ भी नही किया जा सकता तब भला वह वेदाध्ययन कैसे कर सकता है?(अर्थात नही कर सकता). आगे और भी..

- जो (शूद्र) वेदों का उच्चारण करे उसकी जीभ काट ली जानी चाहिए और जो वेदों को धारण करे उसका शरिर मध्य से चीर दिया जाना चाहिए.

इस प्रकार वेद श्रवण और वेदाध्ययन का निषेध वैदिक विषयों के ज्ञानार्जन का भी निषेध है.

- शूद्र को ज्ञान प्रदान नही किया जाना चाहिए - द्विजों को ही अध्ययन, और दान प्राप्ति का अधिकार है.

इस प्रकार शंकर सामान्य श्रमिको को दर्शन के अध्ययन से रोकने की मनु की व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए सत्ता पक्ष के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का उत्तम प्रमाण पाठकों के समक्ष रखते हैं. उन सभी अनुच्छेदों को यहाँ उद्धृत करने का कोई औचित्य नही है जिनमें शंकर ने मनु की प्रशंसा करते हुए उन्हें एक ऐसा स्मृतिकार बताया है जिस पर किसी वेदांती दार्शनिक को निर्भर रहना चाहिए. यहाँ इस बात को छोड़ भी दिया जाए कि इन नियमों की परिणति क्या होती होगी और इनका पालन किस हद तक किया जाता होगा तब भी इन्हें शंकर द्वारा उद्धृत किया जाना भर ही उनकी तथाकथित "मानवता दृष्टि" के सत्तापक्षीय विद्वानों द्वारा प्रायोजित भ्रम की धज्जियाँ उडाता है. हम स्पष्ट देख सकते हैं कि परोक्ष रूप से शंकर के दर्शन का ध्येय मनु के अमानवीय और विद्वेषपूर्ण समाजशास्त्र को बौद्धिक संरक्षण देना ही है. इसक एक ऊदाहरण तब देखने को मिलता है जब सांख्य जो एक भौतिकवादी हिन्दू दर्शन है का उल्लेख करते हुए शंकर कहते हैं कि ...

"मनुना च....सर्वात्मवदर्शनं प्रशंसता कापिलं मतं निन्द् यत इति गम्यते।
कापिलस्य तंत्रस्य वेद विरुद्धत्वं वेदानुसारिमनुवचनविरुद्धत्वं च...।"  
(ब्रह्मसूत्र भाष्य(स्मृत्य धिकरणम् ॥२.११॥))

अर्थात - जहाँ मनु ने ..सर्वात्मत्व दर्शन की प्रशंसा की है, वहीं अप्रत्यक्ष रूप से कपिल के मत की निंदा की है. कपिल का तंत्र वेदों और वेदों का अनुसरण करने वाले मनु के वचनों के विरुद्ध है. जाहिर होता है शंकर के मन में मनु के प्रति सम्मान और सहानुभूति की भावना है जो उन्हें भौतिकवादी दर्शनों की निंदा करने पर विवश करती है और वे निष्पक्ष नही रह पाते. यहाँ से एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि सांख्य दर्शन जिसके प्रणेता कपिल मुनि थे मूलतः एक अवैदिक दर्शन था. वे अपनी दार्शनिक कृति में लोकायतों के मत का भी खंडन प्रस्तुत करते हैं. पर इन भौतिकवादी दर्शनों के खंडन से पूर्व वे मनु को उद्धृत करना नहीं भूलते जिससे कि पाठक उनके दर्शन की श्रेष्ठता स्वीकारने के लिए तर्कपुर्ण चितंन के पुर्व ही विवश हो जाए.

भौतिकता और प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रति शंकर का दृष्टिकोण

यथार्थ अथवा भौतिकता ही सैद्धान्तिकता की कसौटी होती है. प्रत्येक सैद्धांतिक स्थापना का परीक्षण उसके प्रति व्यावहारिक उपागम को अपनाकर ही किया जा सकता है. शंकर ज्ञान के सभी प्रमुख स्रोतों जैसे तर्क, प्रमाण, व्यावहारिक ज्ञान और कारणता को ख़ारिज करते हैं. ज्ञान के इन स्रोतों की अस्वीकृति उनके भौतिक विश्व और विज्ञान के प्रति उनकी तिरस्कारपूर्ण दृष्टि की एक बानगी उनके सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य में मिलती है. अपने शारीरक-भाष्य का आरम्भ वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कबुद्धि और प्रमाण की उपयोगिता के व्यंगपूर्ण खंडन और तिरस्कार से करते हैं। शंकर किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान की उपेक्षा करते हुए स्वप्न और भ्रम के आधार पर जगत की भौतिकता को असत्य प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं. इस प्रकार वे जगत के प्रति एक अवैज्ञानिक और उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण स्थापित करने का प्रयास करते दृष्टिगत होते हैं. इसी प्रकार तर्क के प्रति उनके रवैये में एक अजीब सा बेतुकापन है. ब्रह्मसूत्र भाष्य में तर्क के प्रति दिए गए उनके कथनों का निचोड़ यह है कि तर्क का कोई उचित आधार नही होता. हर विद्वान दूसरे विद्वान के तर्कों को काट कर नए तर्क स्थिर करता है. इस प्रकार यह क्रम चलता रहता है. नए तर्क दिए जाते हैं और अंततः वह भी गलत साबित होते हैं. यहाँ शंकर ज्ञान प्राप्ति में संशय की भूमिका को लगभग ख़ारिज करते हुए आस्था को जीवन का आधार बनाने की पूर्वपीठिका तैयार करते दृष्टिगत होते हैं.हम देखते हैं कि व्यावहारिक सत्य की जाँच के लिए तर्क की उपयोगिता को ख़ारिज करने के उपरांत भी वे उतने प्रबल तरीके से आस्था पक्षपोषण नही कर पाते जितने की अन्य भाववादी दार्शनिक करते हैं, वे मायावाद कि व्याख्या मे भी बहुत कुशलता नही दिखा पाते, जबकि यथार्थवादी चिंतन का भी भारत में समृद्ध इतिहास है जिसकी एक बानगी हमें वात्‍स्‍यायन के दार्शनिक ग्रन्थ न्याय-सूत्र में मिलती है. वात्‍स्‍यायन कहते हैं -

"बुद्ध् या विवेचनाद् भावानां याथात्म्योपलब्धिः, यदस्ति यथा च यत्नास्ति
यथा च तत्सर्व प्रमाणत उपलब्ध्या सिध्यति, या च प्रमाणत उपलब्धिस्तद्
बुद्ध् या विवेचनं भावानाम् , तेन सर्वशास्त्राणी सर्वकर्माणि सर्वे च
शरीरिणां व्यवहारा व्याप्ताः। परी़क्षमाणो हि बुद्ध् याऽध्यवस्यति
इदमस्तीति तत न सर्वभावानुपपतिः ।" 
(न्याय सूत्र (४) २/२७)

अर्थात - यह मानना होगा की बुद्धि के द्वारा परीक्षण करके ही वस्तुओं की वास्तविक प्रवृत्ति का बोध होता है. बुद्धि द्वारा परीक्षण और प्रमाण द्वारा वस्तुओं के संज्ञान के सिवा दूसरा कोई अर्थ नही है. प्रमाण द्वारा संज्ञान के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है कि कौन सी वस्तु अस्तित्वमान है और किस प्रकार अस्तित्वमान है या कौन सी वस्तु अस्तित्वहीन है और किस अर्थ में अस्तित्वहीन है. प्रमाणों द्वारा वस्तुओं का ज्ञान ही सभी शाखाओं और जीव धारियों की सभी गतिविधियों एवं व्यवहार का आधार है. सूक्ष्म रूप से वस्तुओं की जाँच पड़ताल करने वाला दर्शनवेत्‍ता बुद्धि के आधार पर ही वस्तु के अस्तित्व का निर्धारण करता है. अतः यह तर्क प्रस्तुत करना निरर्थक है कि बुद्धि से किसी वस्तु का ज्ञान नही होता फिर यदि ऐसा है भी, तो भी इस तर्क का कोई आधार नही है कि वास्तविक जगत अस्तित्व शून्य है.

यहां इस विषय पर चर्चा करना हमार उद्देश्य नहीं है जिन पठकों को इस विषय मे रूची हो वे न्याय सूत्र का पाठन कर सकते हैं, हम इसे यहीं छोडकर शंकर पर वापस लौटते हैं.

शंकर का मानना है की प्रत्यक्ष ज्ञान इन्द्रियों पर आधारित है इसलिए संवेदन के आधार पर निर्मित होता है, इसलिए यह भ्रम है. कारण तर्क विज्ञान के प्रति अपने मंतव्य रखते हुए शंकर उतने मजबूत तर्क पाठकों के आगे नही रख पाते अथवा नही रखना चाहते जितने कि अन्य भाववादी दार्शनिक जैसे नागार्जुन और बुद्धपालित आदि देते हैं. कहा जा सकता है कि उन्हें इस बात का संज्ञान तो है ही कि अगर वे तर्क से विरोधियों को पराजित नही भी कर पाए तो भी राज्य सत्ता तर्क विज्ञान के पक्षधरों का उपचार करने के लिए के लिए मनु द्वारा बताये मार्गों की व्यवस्था कर ही देगी. उनके तर्कबुद्धि और प्रमाण के अस्वीकरण के लिए दिए गए तर्कों में तथ्य कम व्यंग और पूर्वाग्रह युक्त तल्खी अधिक है. शंकर स्पष्ट घोषणा करते हैं कि तर्क बुद्धि का उपयोग केवल स्मृतिओं (वह भी मनु द्वारा रचित) में लिखे गए सूत्रवाक्यों को सही साबित करने के लिए किया जा सकता है.

शंकर और लोकायत का खंडन

शंकर के लोकायत के विरुद्ध तर्क बहुत ही लचर और बेसिरपैर की आपत्तियों से भरे पड़े है. शंकर लिखते हैं कि-

"नत्वेतदस्ति यदुक्तम- अव्यतिरेको देहादात्मन इति, व्यतिरेक एवास्य
देहाद् भवितुमर्हति, तद् भावाभावित्वात्। यदि देहभावे भावात् देह
धर्मत्वम् आत्मधर्माणां मन्येत -- ततो देहभावेऽपि अभावात् अतद्धर्मत्वमेव
एषां किं न मन्येत? देहधर्मवैलक्षण्यात् । ये हि देहधर्मा रुपादय: , ते
यावद्देहं भवन्ति; प्राणचेष्टादयस्तु सत्यपि देहे मृतावस्थायां न भवन्ति;
देहधर्माश् च रुपादयस्ते यावद् देहं भवन्ति। प्राणचेष्टादयस्तु सत्यपि
देहे मृतावस्थायां न भवन्ति; देहधर्माश्च रुपादयः परैरप्युपलभ्यन्ते, न
त्वात्मधर्माश्चैतन्यस्मृत्यादयः। 
( ब्रह्मसूत्र भाष्य ॥(३)३/५४॥)

स्वतंत्र अनुवाद की शैली में इसका अर्थ है कि - शरीर और आत्मा की अभिन्नता की बात तर्क संगत नही है. इसके विपरीत शरीर को आत्मा से भिन्न देखना सही है, कारण की अपनी उपस्थिति के बावजूद इसमें अनुपस्थित रहने का गुण विद्यमान है. शरीर के कथित गुण (यहाँ लोकायतियों के कथन की ओर इशारा है ) के रूप में चेतना स्वयं शरीर की उपस्थिति के बाद भी अनुपस्थित रहती है (यहाँ शंकर का तात्पर्य शव से हैं) इस प्रकार शरीर की उपस्थिति के समय आत्मा के जो लक्षण दृष्ट होते हैं उनके आधार पर यह माना जाता है कि ये शरीर के ही गुण हैं, (यह लोकायत मत का मूल आधार है जिसकी ओर शंकर इशारा कर रहे हैं) परन्तु यदि यह बात होती तब यह स्वीकार करने में क्या कठिनाई है कि शरीर की उपस्थिति के बाद भी (शव में) यह गुण (चेतना) अनुपस्थित है तब चेतना को शरीर से अलग क्यों न माना जाए? आत्मा (चेतना) के गुणों और शरीर के गुणों में जो भिन्न्नता दृष्ट होती है उसके आधार पर यह स्वीकार्य है. अतएव जब तक शरीर है तब तक शरीर के गुण रूप रंग आदि दिखाई देते हैं और मृत्यु के बाद शरीर में इच्छा शक्ति और प्राणशक्ति आदि नही दिखाई पड़ते हैं दूसरे लोग इन्हें नही देख पाते इसलिए शरीर के गुणों जैसे रूप रंग आदि के लिए कही गई बात चेतना और स्मृति के बारे में नही कही जा सकती.

हम इस तर्क के आधार कितने सबल हैं इसे जांचने का प्रयत्न करते हैं. जैसा कि जाहिर होता है शंकर का मुख्य तर्क जो लोकयातिओं के प्रति है वह है कि अगर चेतना (जिसे शंकर कई बार स्मृति, इच्छाशक्ति और प्राणशक्ति भी कहते हैं) शरीर का गुण होती तब वह शव में क्यों नही उपस्थित रहती? यह लोकयातिओं के पक्ष का अतिसरलीकरण है जो शंकर कर रहे हैं, यह मूलतः न्याय-वैशेषिकों का तर्क है जो शंकर बिना किसी परिवर्तन के उनसे लेकर लोकायत का खंडन करना चाहते हैं. यह अलग बात है कि इस तर्क से खुद उनकी दार्शनिक विचारधारा जिसके अनुसार "विशुद्ध चित ही सत्य है और जगत भ्रम अथवा माया है" का भी खंडन हो रहा है, क्योंकि यह तर्क उपयोग करने के लिए शंकर को यह मानना होगा कि शरीर जैसी कोई भौतिक वस्तु है और रूप रंग उसका गुण अथवा लक्षण हैं. इस प्रकार स्वयं उनका प्रतिपादित भाववाद असंगतता के भंवर में फंसता नजर आता है, यहाँ उनकी असंगतता जांचना मेरा ध्येय नही है इसलिए मैं अपने मुख्य बिंदु पर लौटती हूँ जो लोकयातितों के प्रति उनके तर्क की सबलता की जाँच करना है ।

शंकर अपने विश्लेषण के आधार पर तर्क करते हैं कि शव में चेतना क्यों नही दिखाई देती. जहाँ लोकायत के अनुयायी चेतना को शरीर (देह) का गुण बताते हैं. वहीं शरीर की जगह शव को रखकर शंकर उनके दर्शन का विकृत रूप पाठकों के समक्ष रखकर लोकायतिओं को गंवार बताते हैं. कटाक्ष करने और प्रतिपक्षी की छवि विकृत करने के अपने उतावलेपन में शंकर इस तथ्य को पूर्णतः विस्मृत करते दृष्ट होते हैं कि लोकायत के विश्वोत्पत्ति विज्ञान में शरीर की परिभाषा क्या है. उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार लोकायत के अनुयायी चेतना की तुलना मद शक्ति से करते हुए अपना मत रखते थे. लोकायत मत के आधारभूत नियमो को समझने के लिए हम यहाँ इस उदाहरण की सप्रसंग व्याख्या करेंगे। जैसा की हम जनते है कि लोकायत मत के अनुसार केवल पदार्थ (भूत द्रव्य) सत्य है और विश्व की अन्य सभी वस्तुओं का उदय (चेतना का भी) पदार्थ से ही हुआ है. शरीर का निर्माण भी उन्ही चार प्रमुख भौतिक तत्वों अर्थात जल, पृथ्वी, वायु और अग्नि से मिलकर होता है. शरीर के निर्माण के लिए विशेष सहकारी कारण की आवश्यकता होती है जैसे की मद्य निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री जुटा कर एक साथ रख देने भर से उनसे मद शक्ति उत्पन्न नही हो जाती उसी प्रकार उपरोक्त चारों पदार्थों को एक साथ रख भर देने से चेतना उत्पन्न नही हो जाती. लोकायत मत के अनुसार यह एक प्रकार का असाधारण रूपांतरण है जो पदार्थ के स्वभाव और रूपांतरण के लिए आवश्यक परिस्थितिओं की अनुकूलता पर निर्भर है. लोकायत मत पदार्थ के असाधारण रूपांतरण की जिस व्याख्या के आधार पर शरीर को परिभाषित करता है उस आधार पर शव को शरीर की संज्ञा नही दी जा सकती. लोकायतिओं के अनुसार भली भांति पोषित शरीर में ही चेतना का विकास होता है. जिस असाधारण रूपांतरण की प्रक्रिया से शरीर में चेतना का निर्माण होता है, शव उस प्रक्रिया के विघटन का उदाहरण है. यह विस्मृत करते हुए शंकर लोकयातिओं के तर्क का अति सरलीकरण करते हैं जो एक दार्शनिक के लिए किसी प्रकार न्याय संगत नही माना जा सकता है. इस तर्क का एक हिस्सा जहाँ यह इंगित करता है कि जहाँ शरीर (लोकयातियों द्वारा उल्लेखित शर्तों के अनुसार) उपस्थित होता है, चेतना उपस्थित होती है वहीँ दूसरी और यह भी विदित होता है कि जहाँ शरीर उपस्थित नही होता वहां चेतना किसी प्रकार भी दृष्ट नही होती इसका कोई एक उदाहरण भी इस संसार में नही दृष्टिगोचर होता है. शंकर तर्क के दूसरे हिस्से पर क्या कहते हैं यह जानना रोचक होगा ..शंकर कहते हैं कि -

" पतितेऽपि कदचिदस्मिन्देहे देहन्तरसंचारेणात्मधर्मा अनुवर्तेरन् "
(ब्रह्मसूत्र भाष्य (३ ) ३/५४ )

अर्थात - देह का पतन होने पर कदाचित कदाचित आत्मा के गुण (जैसे चेतना, स्मृति, अनुभव क्षमता आदि) दूसरे शरीर में संचार से अनुवृत हो सकते हैं (यहाँ शंकर ऐसी संभावना व्यक्त कर रहे हैं). "कदाचित" शब्द यहाँ एक तथाकथित अपूर्व ब्रम्हज्ञानी की हिचकिचाहट का स्पष्ट परिचय दे रहा है. ध्यातव्य तथ्य यह है कि शंकर इसे ढृढ़ता के साथ क्यों नही स्वीकार रहे की मृत्यु के बाद चेतना के गुण दूसरे शरीर में संचारित होते हैं. इसका कारन यह है कि शंकर यह किसी प्रमाण के आधार पर प्रमाणित नही कर पाते इस लिए उन्होंने यह स्पष्ट तरीके से स्वीकार करने मे हिचकिचाहट दिखाई. दूसरी ओर इसी तर्क का दूसरा हिस्सा जिसे शंकर ने अछूता छोड़ दिया वह है शरीर की अनुपस्थिति में चेतना का दृष्टिगोचर होना. शंकर इस पक्ष को भी चालाकी से छोड़ते हुए अपना ध्यान लोकायतिओं को कोसने और अपमानित करने में लगाये रखते हैं. यह उनकी बौद्धिक दुर्बलता का ही परिचय देता है. इसी प्रकार कई जगह उनके तर्क बौद्ध दार्शनिकों से उधार लिए प्रतीत होते हैं. ध्यातव्य हो की शंकर, गौड़पाद के प्रशिष्य थे जिन्होंने अपना अदवैत वेदान्त दर्शन बौद्ध सम्प्रदाय के महायानियों से प्रेरित होकर रचा था. शंकर अपने शारीरक भाष्य में उन्हें "वेदान्तार्थसम्प्रदायविद् भिराचार्येः" (ब्रम्हसूत्र भाष्य ॥२.१.९॥ )कहकर संबोधित करते हैं. शंकराचार्य के तर्कों कि महायानिओं से साम्यता के कारण अनेक लोग शकंर को "प्रच्छन्न-बौद्ध" भी कहते हैं.

आज के विज्ञान सम्मत युग में ज्ञानयुक्त तर्कपरक चिन्तन अपनी सबल उपस्थिति दर्ज करा रहा है, धीरे-धीरे अंधविश्वासों और अज्ञानता का उन्मूलन हो रहा है इन सब के मध्य एक पुनरुत्थानवादी आग्रही लेखकों का तबका ऐसा भी है जो पुरातन ज्ञान और दर्शन की आड़ लेकर अंधविश्वासों, अज्ञानता और व्यक्तिगत भाववादी अनुभवों के फलस्वरूप उत्पन हुए भ्रम को सत्य के रूप में स्थापित करने के कुत्सित प्रयास मे लिप्त हैं. इन लोगों की स्पष्ट मान्यता है कि विज्ञान को आंकड़ों की गणना और पूंजीपति वर्ग के हितों तक सीमित रहना चाहिए. विज्ञान कोई जीवन दर्शन नहीं देता उसे समकालीन समाज में फैली रुढियों/अंधविश्वासों से बचते हुए ही अपना कार्य करना चाहिए. समाज विरोधी पूंजीपति वर्ग के नुमाइंदे विज्ञान और वैज्ञानिक विचारधारा को दूषित करने के दो तरीके अपनातें हैं - प्रथम तो विज्ञान की रहस्यात्मक भ्रमपूर्ण व्याख्या और द्वितीय विज्ञान पर मानवता विरोधी होने का आरोप. वहीं दूसरी ओर अन्धविश्वास और जड़पंथी विचारधारा को समकालीन समाज में स्थापित करने के लिए वे इसी विज्ञान का सहारा लेते हैं और सदियों पूर्व भी जिन अंधविश्वासों को हमारे पूर्वज पूर्णतया ख़ारिज कर गए थे उनकी वैज्ञानिक व्याख्याएं करते हैं. इन दोनों प्रवृत्तियों के जवाब के लिए इतिहास की विज्ञानवादी विचारधारा का सामने आना जितना आवश्यक है, उतनी ही जरुरत इस बात की है कि वैसे दर्शन और दार्शनिक जो भ्रमपूर्ण चिन्तन और आस्था का प्रचार करते थे उनकी वास्तविकता जनता के समक्ष रखी जाए. आज आवश्यकता उन सम्प्रदायों की शिक्षा के प्रचार-प्रसार की है जिन्होंने जन-सामान्य का पक्ष लेते हुए शासक वर्ग द्वारा जबरदस्ती थोपे गए दर्शन को नकारा था. अन्धविश्वास और जड़मति विचारों की एकमात्र (और संभवतः सबसे मजबूत भी) जगह इतिहास ही है, अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी विचारधाराओं का पुनर्मूल्यांकन किया जाए जिससे विज्ञानवादी सोच को बढ़ावा दिया जा सके और भ्रमों को सत्य की तरह स्थापित करने की प्रवृत्ति को मुँह-तोड़ जवाब दिया जा सके. यह सच है की ऐसा करने के लिए अधिसंख्यक की आस्थाओं के विरुद्ध जाना होगा परन्तु यह ध्यान रखा जाना चहिए कि वस्तुगत सत्य जो भ्रम से मुक्त करने की कुव्वत रखता है, आस्थाओं के विपरीत ही होता है. अब तय मनुष्य को करना है कि उसे निरपेक्ष दृष्टि और सापेक्ष विश्लेषण जनित वास्तविकता का ज्ञान चाहिए या फिर भ्रम आच्छादित आस्था का फलक? आस्थाओं के चोटिल होने के भय के कारण अगर सत्य पर भ्रमों का पर्दा पड़ा रहा तो यह प्राचीन भारतीय विज्ञानियों के साथ अन्याय होगा. अधिसंख्यक जनता के मध्य भ्रमपूर्ण परिदृश्य के निर्माण को रोकने के लिए यह जितना आवश्यक है की भारतीय दर्शन की विज्ञानवादी धारा का प्रचार प्रसार किया जाए उतना ही आवश्यक यह भी है की भारत के बौद्धिक विकास में बाधक विचारों और विचारकों की समीक्षा विज्ञानवादी दृष्टि से की जाए. एवं उनके कुत्सित मंतव्यों को जनता के समक्ष रखा जाए.
लवली गोस्वामी

Wednesday, 26 September 2012

दबेगी कब तलाक आवाज-ए -आदम


दबेगी कब तलक आवाज़ -ए -आदम

दबेगी कब तलक आवाज़ -ए -आदम , हम भी देखेंगे
रुकेंगे कब तलक जज़्बात -ए -बरहम , हम भी देखेंगे
चलो यूं ही सही ये जौर -ए -पैहम , हम भी देखेंगे

दर -ए -ज़िन्दान से देखें या उरूज -ए -दार से देखें
तुम्हें रुसवा सर -ए -बाज़ार -ए -आलम हम भी देखेंगे
ज़रा दम लो माल -ए -शौकत -ए -जम हम भी देखेंगे

बा -जोम -ए -कुव्वत -ए -फौलाद -ओ -आहन देख लो तुम भी
बा -फ़ैज़ -ए -जज्बा -ए -ईमान -ए -मुहकम हम भी देखेंगे
जबीं -ए -काज -कुलाही ख़ाक पर ख़ाम हम भी देखेंगे

मुकाफ़ात -ए -अमल तारीख़ -ए -इंसान की रिवायत है
करोगे कब तलक नावक फ़राहम हम भी देखेंगे
कहाँ तक है तुम्हारे ज़ुल्म में दम हम भी देखेंगे

ये हंगाम -ए -विदा -ए -शब् है ऐ ज़ुल्मत के फ़रज़न्दो
सहर के दोश पर गुलनार परचम हम भी देखेंगे
तुम्हें भी देखना होगा ये आलम हम भी देखेंगे

Sunday, 16 September 2012

ऊर्जा की राष्ट्रीय हवस और आम जनता



रोहित जोशी

 "...हमारे देश में नीतियों के स्तर पर यह कितना त्रासद है कि हमारा 'राष्ट्रहित' जनता के हित से मेल नहीं खाता जब्कि कॉरपोरेट के हित 'राष्ट्रहितों' से एकदम मिलते हैं। ऐसा लगता है जैसे  कॉरपोरेट हित ही 'राष्ट्रहित' है और इसके लिए जनहितों की कुरबानी एक व्यवस्थागत् सत्य। इसलिए नदियों के जलागम में बसे समाजों की ओर से जबरदस्त प्रतिरोध का दमन करते हुए सरकारें देश भर की नदियों को बांध-बांध कर बांध परियोजनाऐं बनाती जा रही हैं।..."


उत्तकाशी में उफनती भागीरथी
लिए हम आंख मूंदकर मान लेते हैं कि अबके उत्तरकाशी में और पिछले कुछ सालों से पूरे उत्तराखंड में लगातार प्राकृतिक आपदाओं ने जिस तरह जानलेवा होकर कहर बरपाया है, इनमें प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बेतहाशा बनाई जा रही झीलों का कोई योगदान नहीं है। लेकिन जिस गति से पूरे प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाएं और इनके लिए झीलें बनाई जा रही हैं इसी गति से प्राकृतिक आपदाएं भी साल दर साल खतरनाक होती जा रही हैं। ऐसे में इनके प्रभाव से हम कब तक आंखें मूंदे रह पाऐंगे?

पिछले दिनों उत्तरकाशी से ऊपर के इलाके में बादल फटने से भागीरथी और असीगंगा का जलस्तर पांच मीटर बढ़ गया और इससे पूरे उत्तरकाशी में भयंकर तबाही हुई। इसमें 300 से अधिक घर तबाह हो गए, 31 लोग मारे गए। 7 मोटरपुल ध्वस्त हो गए। ज्योश्याड़ा का महत्वपूर्ण झूला पुल भी टूट गया। 30 किमी की मुख्य सड़क पूरी तरह टूट गई। बाजार, पुलिस स्टेशन, फारेस्ट का फायर स्टेशन सब तबाह हो गया। मनेरी भाली परियोजना के फेज 2 में नदी के साथ बह कर आई लकडि़यों का झुण्ड भर गया जिससे परियोजना भी ठप पड़ गई। इसके बाद तो पूरे प्रदेश की सारी परियोजनाओं को एक दिन के लिए बंद कर देना पड़ा था।
पहाड़ में अब ये कोई नई बात नहीं रही। पिछले सालों में पूरे प्रदेश में बादल फटने की घटनाओं और इससे हुई तबाही में इस कदर बढ़ोत्तरी हुई है कि बरसात का मौसम पहाड़ों में दहशत का मौसम लगने लगा है। पूरे प्रदेश में ऐसा कोई जिला नहीं बच रहा है जहां इस मौसम में कोई बड़ी तबाही ना आई हो।

बादल फटना और भूस्खलन आदि बेशक अप्राकृतिक नहीं हैं। लेकिन जिस तरह पिछले समय में इन प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी हुई है यह सिर्फ प्राकृतिक नहीं है। दुर्लभ मानी जाने वाली बादल फटने की घटनाऐं, तबाही के वीभत्स मंजर के साथ इतनी आम हो चलीं हैं कि इसकी वजहों की पड़ताल की ही जानी चाहिए। बेशक मानावीय दखल ने ही इन प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ाया है। कई हजार सालों से सिर्फ बहते रहने की अभ्यस्त हिमालयी नदियों को जगह-जगह जबरन रोक कर जलविद्युत परियोजनाओं के लिए जब झीलें बना दी गई हों तो यहां के भूगोल और मौसम की ओर से कुछ प्रतिक्रियाएं तो स्वाभाविक ही हैं। तो हम ये क्यों ना मान पाएं कि प्रदेश भर में बादल फटने की बढ़ी घटनाओं और इनसे हुई तबाही के पीछे इन जलविद्युत परियोजनाओं का भी बड़ा हाथ है। 

बरसात और बरसात के बढ़कर ‘बादल फट’ जाने की स्थिति पैदा हो जाने को समझना राॅकेट साइंस की तरह जटिल नहीं है। हम बहुत शुरूआती कक्षाओं में विज्ञान की किताबों से इसे समझ सकते हैं। पानी के वाष्पन से बादल बनता है और फिर ये बादल बरस जाता है। यही बरसात है। और पहाड़ों में बादलों का भारी मात्रा में एक जगह जमा हो कर एक निश्चित इलाके में बेतहाशा बरसना बादल का फटना है। चंद मिनटों में ही 2 सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश हो जाती है। बादल फटने की घटना पृथ्वी से तकरीबन 15 किमी की ऊंचाई पर होती है। भारी नमी से लदी हवा पहाडि़यों से टकराती है इससे बादल एक क्षेत्र विशेष में घिरकर भारी मात्रा में बरस जाते हैं। यही बादल का फटना है। क्या पहाड़ में अप्रत्याशित रूप से बादल फटने की बढ़ी घटनाओं में पिछले समय में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बनाई कई कृत्रिम झीलों से हुए वाष्पन और इससे पर्यावरण में आई कृत्रिम नमी का कोई योगदान नहीं समझ आता? 

न्यू टिहरी शहर
पिछले महीने, मैं उत्तरकाशी और टिहरी जिलों में घूम रहा था। ‘न्यू टिहरी शहर’, एक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक शहर ‘टिहरी’ को डुबोकर तैयार की गई कंक्रीट की घिच-पिच। न्यू टिहरी में जाकर समझ आता है कि- एक शहर सिर्फ इमारतों का जखीरा भर नहीं होता, ‘कुछ और’ होता है जो उसे जिंदादिल शहर बनाता है। टिहरी झील ने इस ‘कुछ और’ को डुबो दिया है। और पुरानी टिहरी का जो कुछ बच रहा है वे न्यू टिहरी की बचकानी इमारतों के भीतर कसमसाता हुआ दम तोड़ रहा है। एक ग्रामीण कस्बाई शहर या गांव को उठाकर दूसरी जगह रख देना किसी मैट्रोपोलिटन शहर में एक फ्लैट या अपार्टमैंट से दूसरे में शिफ्ट कर जाने सरीखी सामान्य घटना नहीं है। शहर/गांव को उठाने की कोशिश में उसकी चासनी वहीं निथर जाती है और नई जगह रसहीन लोथड़ा ही पहुंच पाता है। न्यू टिहरी ऐसा ही सूखा शहर है। 

न्यू टिहरी में बरसात बहुत है। पुराने लोग बताते हैं कि जब टिहरी शहर था, वहां झील नहीं थी, तो इस झील के बगल की पहाड़ी में, जहां अब न्यू टिहरी शहर बना दिया गया है, बरसात बहुत कम होती थी। लेकिन 40 किमी की झील के बनने के बाद वहां इससे हुए वाष्पन से बादल बनता है और बहुत बरसात होती है। इस घटना को स्थानीय बोलचाल में ‘लोकल मानसून’ का उठना कहते हैं। यूं ही ढेर सारी प्राकृतिक झीलों वाले जिले नैनीताल में भी इसी तरह ‘लोकल मानसून’ से बारिश बहुत होती है। बेशक झीलों का पहाड़ों में बरसात को लेकर अपना रोल है। प्राकृतिक झीलों का तो अपना व्यवहार है, जो अक्सर संतुलित रहता है। लेकिन कृतिम झीलों के साथ प्रकृति अपना व्यवहार संतुलित नहीं बना पा रही है। इसका प्रतिफल बादल फटने और बादल फटने से हुए भूस्खलनों के रूप में दिखता है जिससे हर साल भीषण तबाही हो रही है। हिमालय दुनिया के सबसे ताजा पहाड़ों में है जिसकी चट्टानें अभी मजबूत नहीं हैं। एक तो यह वजह है और दूसरी वजह, जलविद्युत परियोजनाओं के लिए टनल निर्माण में पहाड़ों को विस्फोटकों के प्रयोग से जिस तरह खोखला और कमजोर कर दिया गया है, इन दो वजहों से ना सिर्फ बादल फटने बल्कि सामान्य बरसात में भी भूस्खलन त्रासदी बन रहा है।

टिहरी जैसे दानवाकार बांध के साथ ही पूरे प्रदेश की 17 नदियों में तकरीबन 558 बांध प्रस्तावित हैं। इनमें से कुछ बन भी चुके हैं और कुछ निर्माणाधीन हैं। ये बांध अक्सर बड़े बांधों के निर्धारित मानक में ही आते हैं। इन बांधों के लिए पहाड़ों को खोखला कर 1500 किमी की सुरंगें बनाई जाएंगी। इन सुरंगों को बनाने में विस्फोटकों का प्रयोग होगा और इससे पहाड़ जितने कमजोर होंगे, सो अलग। 

जिस उत्तरकाशी में आज बादल फटने से भागीरथी उफान में आ गई है यहां मनेरी भाली बांध परियोजना (फेज-1 और फेज-2) की दो झीलें हैं (एक तो बिल्कुल शहर में और दूसरी इसी नदी में शहर से कुछ ऊपर)। इसी नदी के सहारे आप तकरीबन 25-30 किमी नीचे उतरें तो चिन्यालीसौड़ में ‘विकास की महान प्रतीक’, 40 किमी लम्बी ‘टिहरी झील’ भी शुरू हो जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले समय में इस पूरे इलाके में बरसात काफी बढ़ी है। और ऐसे ही अनुभव हर उस इलाके के हैं जहां विद्युत परियोजनाओं के लिए कृत्रिम झीलें बनाई गई हैं।

टिहरी झील
चलिए हम एक बार फिर आंख मूंद लेते हैं, और मानने की कोशिश करते हैं कि अब तक जो प्राकृतिक आपदाऐं हुई हैं ये अपने सहज स्वरूप में ही हुई हैं और इसमें ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का कोई हाथ नहीं है। लेकिन तो भी क्या भविष्य में बनने वाली 558 जल विद्युत परियोजनाओं की झीलें, हमारी उपरोक्त आशंकाओं पर हमें सोचने को मजबूर नहीं करती हैं? और यदि इस आशंका पर सोचना होगा तो स्वाभाविक ही इस बात पर भी सोचना होगा कि इन खतरनाक परियोजनाओं के लिए लालायित सरकारों और बांध बनाने वाली कंपनियों के वे कौन से हित हैं जो पहाड़ी समाज को इन तबाहियों मंे धकेलने को प्रेरित कर रहे हैं।  

पिछले दौर में पर्यावरण को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंताएं बढ़ी हैं और अंतराष्ट्रीय संगठनों के विविध सम्मेलनों में पर्यावरणीय चिंताएं ही केंद्र में रही हैं। इन सम्मेलनों में मुख्य फोकस अलग-अलग देशों द्वारा  CO2  और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने को लेकर दबाव बनाने का रहा है। खासकर कम औद्यौगीकृत और विकासशील, तीसरी दुनिया के देशों पर यह दबाव ज्यादा है। क्योंकि ये देश इन गैसों का उत्सर्जन अपने औद्यौगिक विकासरत् होने के चलते अधिक करते हैं। इन्हीं देशों के क्रम में भारत भी है। भारत सबसे अधिक CO2 उत्सर्जित करने वाले देशों में पांचवे स्थान पर है और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में यह स्थान सातवां है।

जल विद्युत परियोजनाओं के बारे में माना जाता है कि इसमें कार्बन का उत्सर्जन कम होता है और प्राकृतिक जलचक्र के चलते पानी की बरबादी किए बगैर ही इससे विद्युत ऊर्जा उपलब्ध हो जाती है। वहीं कोयले या अन्य ईधनों से प्राप्त ऊर्जा में मूल प्राकृतिक संसाधन बरबाद हो जाता है और कार्बन का उत्सर्जन भी अधिक होता है। इस कारण विश्व भर में पर्यावरणविद् ऊर्जा प्राप्त करने की सारी ही तकनीकों में से हाइड्रो पावर की वकालत करते हैं। यही कारण है कि भारत भी अन्तराष्ट्रीय स्तर पर  CO2 और ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित करने के मामले अपनी साख सुधारने के लिए हाइड्रो पावर की ओर खासा ध्यान दे रहा है। पिछले समय में ऊर्जा आपूर्ति की कमी ही भारत की विकासदर को तेजी से बढ़ाने के लिए सबसे बढ़ी रूकावट रही है। एक अनुमान के अनुसार पिछले दो दशकों में भारत की ऊर्जा जरूरत 350 प्रतिशत बढ़ी है। इसका मतलब यह है कि भारत को अपनी ऊर्जा उत्पादन की वर्तमान क्षमता से तीन गुना अधिक ऊर्जा की आवश्यकता है। सवाल यह है कि यह कहां से पूरी होगी? जब्कि यह आवश्यकता यहीं पर स्थिर नहीं है बल्कि लगातार बढ़ती जा रही है। 

खैर! अंतर्राष्ट्रीय दबाव में भारत का फोकस अभी कार्बन का उत्सर्जन कम कर अधिकतम ऊर्जा प्राप्त कर लेने में है और इसके लिए हाइड्रो पावर परियोजनाएं ही मुफीद हैं। यही राष्ट्रहित में है। हमारे देश में नीतियों के स्तर पर यह कितना त्रासद है कि हमारा ‘राष्ट्रहित‘ जनता के हित से मेल नहीं खाता जब्कि  कॉरपोरट के हित ‘राष्ट्रहितों’ से एकदम मिलते हैं। ऐसा लगता है जैसे  कॉरपोरट हित ही राष्ट्रहित है और इसके लिए जनहितों की कुरबानी एक व्यवस्थागत् सत्य। इसलिए नदियों के जलागम में बसे समाजों की ओर से जबरदस्त प्रतिरोध का दमन करते हुए सरकारें देश भर की नदियों को बांध-बांध कर बांध परियोजनाऐं बनाती जा रही हैं। कार्बन के उत्सर्जन मामले में यह हाइड्रोपावर परियोजनाएं चाहे पर्यावरण पक्षधर दिखती हों लेकिन अनुभव और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए कई सर्वेक्षण बताते हैं कि इन बांध परियोजनाओं ने किस तरह से मानवीय त्रासदियों को तो जन्म दिया ही है साथ ही प्रकृति के साथ भी बड़ी छेड़छाड़ की है। इससे मानव सभ्यता के इतिहास में अहम रही कई नदियों के जलागम, पर्यावरण और जैवविविधताओं पर भी गहरा असर पड़ा है। इन नदियों के किनारे बसा इन्हीं पर निर्भर समाज भी अपने पूरे अस्तित्व के साथ संकट में घिर गया है। वल्र्ड कमिशन ऑफ डैम्स (डब्लु सी डी) की एक रिपोर्ट कहती है कि बांध जरूर कुछ ‘‘वास्तविक लाभ’’ तो देते हैं लेकिन समग्रता में इन बांधों के नकारात्मक प्रभाव ज्यादा हैं जो कि नदी के स्वास्थ, प्रकृति, पर्यावरण और लोगों के जीवन को बुरी प्रभावित करते हैं। इसी से प्रभावित करोड़ों लोगों की पीड़ा और तबाही के प्रतिरोध में बांधों के खिलाफ दुनिया भर में आंदोलन उभरे हैं। भारत में भी यह प्रतिरोध भारी है। खासकर पूरे हिमालय में जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तरपूर्व तक जनता इन बांधों के खिलाफ आंदोलित है। सरकारी दमन चक्र, प्रतिरोध की तीक्ष्णता के आधार पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तीव्रता से दमन चलाए हुए है। फिर भी अपने अस्तित्वसंकट से जूझ रही जनता का आंदोलन अनवरत् जारी है। 

सरकार द्वारा भारत में बांध परियोजनाओं को महत्ता देने की उपरोक्त वजह के अलावा पावर प्रोजेक्टों का बेहिसाब मुनाफा वह दूसरी महत्वपूर्ण वजह है जिसके लिए पहाड़ी/प्रभावित समाज की अनदेखी कर सरकारें और बांध बनाने वाली कंपनियां बांधों को लेकर इतनी लालायित हैं। विद्युत ऊर्जा की मांग असीम है और पूर्ति सीमित। मांग और पूर्ति के सिद्धांत के अनुसार विद्युत ऊर्जा की मांग अधिक और पूर्ति कम होने के चलते इसका मूल्य अधिक है। और यह स्थिति स्थाई भी है। ऐसा कभी नहीं होने जा रहा कि विद्युत ऊर्जा की पूर्ति ज्यादा हो जाए और मांग कम रहे। यानि विद्युत उत्पादन उद्योग में निवेश बाजार की स्थितियों के अनुरूप बिना किसी जोखिम के मुनाफे का सौदा है। यही वजह है कि कंपनियां इसमें निवेश को लालायित हैं और दलाल सरकारें उन्हें भरपूर मदद पहुंचा रही हैं।

भारत में शुरूआती दौर में बनी बांध परियोजनाओं का उद्देश्य सिर्फ विद्युत उत्पादन नहीं था। यह बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजनाएं थी। जिनका मकसद नदी के समग्र जलागम को, बाढ़ से बचाव, सिंचाई, मत्स्य पालन और जल पर्यटन आदि के लिए विकसित करना हुआ करता था। विद्युत उत्पादन इसका महज एक हिस्सा था। लेकिन पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में उदारीकरण के बाद से जिस तरह सभी क्षेत्रों में जनकल्याण की जगह मुनाफाखोरी ने ले ली है उसी तरह बांध परियोजनाएं भी इसकी ही भेंट चढ़ गई हैं। विद्युत उत्पादन ही बांध परियोजनाओं का एक मात्र मकसद हो गया है। बिना सरोकारों और सिर्फ मुनाफाखोरी के लिए बन रही इन परियोजनाओं का एक दूसरा संकट पर्यावरण संबंधी मानकों की अंदेखी कर काम की गुणवत्ता और सावधानियों के प्रति लापरवाही बरतना भी है। जिसके चलते कम जोखिम वाली मझोले और छोटे आकार की बांध परियोजनाएं भी खतरनाक हो गई हैं। क्योंकि सरकार और विपक्ष दोनों की ही ओर से इन परियोजनाओं को जैसा प्रश्रय मिला हुआ है उससे इस संदर्भ में किसी भी जांच और कार्यवाही का कोई सवाल ही नहीं उठता। रही बात कॉरपोरट  मीडिया की तो उसका चरित्र किससे छुपा है? इन कंपनियों के विज्ञापनों की बाढ़/आस में उसकी जुबान पहले से ही बंद है। लेकिन इधर हिमाचल हाईकोर्ट के, जेपी ग्रुप (जेपी एसोसिएट्स) के खिलाफ 100 करोड़ के हर्जाने के, लिए गए एक फैसले का संदर्भ इन कंपनियों की मुनाफा बटोरने के लालच की हद और धूर्तता को समझने के लिए लिया जा सकता है।

सोलन स्थित जेपी कंपनी का सीमेंट प्लांट और कॉलोनी
जेपी एसोसिएट्स, भारत की सीमेंट, हाइड्रो पावर और थर्मल पावर उत्पादन के क्षेत्र में प्रतिनिधि निजी कंपनी है। अलग-अलग परियोजनाओं में, हाइड्रो पावर में 1700 मेगावाट और थर्मल पावर में 5120 मेगावाट के लिए इसके द्वारा निर्माण कार्य कराया जा रहा है। साथ ही देश में सीमेंट उत्पादन में इसका चौथा स्थान है। हिमालयी राज्यों में भी जेपी के कई प्रोजेक्ट काम कर रहे हैं। हिमाचल हाईकोर्ट का यह फैसला एक जनहित याचिका के संदर्भ में आया है जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा कंपनी पर उसके सोलन स्थित सीमेंट प्लांट में पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। कंपनी ने इस प्लांट के लिए पर्यावरण संबंधी कोई भी क्लियरेंस यह कहते हुए नहीं लिया था कि इस प्लांट में 100 करोड़ से कम निवेश है जबकि क्लियरेंस की जरूरत 100 करोड़ से ऊपर के निवेश में पड़ती है। बकायदा इस संदर्भ में जेपी की ओर से एक फर्जी शपथपत्र भी दायर किया गया था जिसमें प्लांट में 100 करोड़ से कम का निवेश होने की बात कही गई थी। लेकिन याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट के सामने यह साबित कर दिया कि यह प्लांट 100 करोड़ का नहीं जबकि 400 करोड़ का है। इसी पर फैसला देते हुए हिमांचल प्रदेश हाईकोर्ट की ग्रीन बैंच ने जेपी को फर्जी शपथपत्र के लिए फटकार लगाते हुए उस पर 100 करोड़ का हर्जाना भरने का आदेश दिया। साथ ही कोर्ट ने सोलन में ही स्थित जेपी के थर्मल पावर प्लांट को अगले तीन महीनों में बंद कर देने के आदेश दिए हैं क्योंकि ये प्लांट भी बिना किसी मान्य पर्यावरणीय क्लीयरेंस के ही बनाया गया है। निजी कंपनियों के लिए इस तरह की धोखेबाजी करना आम बात है। पर अफसोस की बात तो ये है कि लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका और जनता के साथ स्पष्ट धोखा करने के बावजूद भी बाजार में इससे जेपी की साख पर कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला। चाहे न्यायालय ने इस सब के लिए जेपी को 100 करोड़ का हर्जाना भरने की सजा सुना दी हो। लेकिन क्या इस धोखेबाजी की भरपाई महज इस सजा से हो सकती है? 

इस फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा है कि इतनी बड़ी अनियमितता बिना प्रशासनिक अधिकारियों की मिली भगत् के संभव नहीं हो सकती। कोर्ट ने इसकी जांच के लिए एक विशिष्ट जांच दल (एसआईटी) भी बिठाया है। देश भर में बांध परियोजनाएं ऐसी ही धोखेबाज कंपनियों के हाथों में हैं जो शासन और प्रशासन के लोगों को खरीद कर बिना किसी सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों के प्राकृतिक संसाधनों को सिर्फ अपने मुनाफे के लिए बुरी तरह लूट रही हैं। पर्यावरणीय नुकसानों के साथ ही इसकी कीमत स्थानीय जनता को अपने पूरे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अस्थित्व को दाव पर लगाकर चुकानी पड़ रही है।

अब सवाल यह उठता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर CO2 और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के दबावों और अपने विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की समस्या से भारत कैसे उबरे? इसके दो जवाब हैं, पहला कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के कम उपभोग की ओर कोई बहस करने को तैयार नहीं है। जब्कि हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति के पास सीमित संसाधन हैं, जिनका संभल कर उपयोग करना होगा। पूंजीकेंद्रित अर्थव्यवस्थाओं में मुनाफा कमाने की होड़ के चलते लगातार ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही हैं और इसके लिए दुनियाभर की सरकारें और औद्यौगिक घराने आंखमूंद कर हाथ पांव मार रहे हैं। इसकी चोट वर्तमान में प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न क्षेत्रों पर पड़ रही है जहां कि अक्सर आदिवासी या तथाकथित पिछड़ा समाज, प्रकृति से साम्य बना कर बसा हुआ है। विकास की पूंजीकेंद्रित समझदारी उसे तबाह करते हुए अपनी जरूरतें पूरी कर लेना चाहती हैं। ऐसे में भारत को, किसी भी कीमत पर ऊर्जा हासिल कर लेने की वैश्विक होड़ में शामिल हुए बगैर, मानवकेंद्रित रवैया अपनाते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों को सीमित करने की ओर बढ़ना होगा। दरअसल पूरे विश्व को यही करने की जरूरत है।

दूसरा जवाब यह है कि ऊर्जा जरूरतों को सीमित कर देने के बाद जिस ऊर्जा की जरूरत हमें है, उसे जुटा लेना भारत जैसे प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न देश के लिए मुश्किल नहीं होगा। वर्तमान परिदृश्य में हाइड्रो पावर के अलावा पर्यावरण सम्मत कोई विकल्प नजर नहीं आता (इसकी वजह यह भी है कि निहित स्वार्थों के चलते ऊर्जा के कई सुलभ, पर्यावरणपक्षीय और कम खतरनाक स्रोतों के क्षेत्र में कोई भी शोध/अध्ययन नही ंके बराबर हो रहे हैं)। ऐसे में यदि हमें हाइड्रोपावर से ही ऊर्जा जुटानी होगी तो, जरूरत है कि हाइड्रो पावर परियोजनाओं को अधिकतम् जनपक्षीय और पर्यावरणसम्मत् बनाया जाय। इस क्षेत्र को निजी कंपनीयों को मुनाफा कमाने के लिए खुली छूट के तौर पर नहीं दिया जा सकता। यह जरूर तय करना होगा कि हाइड्रो पावर उत्पादन में नदियों के किनारे बसा स्थानीय समाज, पहाड़ों का भूगोल और पर्यावरण तबाह ना हो जा रहा हो। इसके साथ प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक उस समाज का ही होना चाहिए जिसने कि इस भूगोल को उसकी सम-विषम परिस्थितियों के साथ, अपने जीने के लिए चुना है। ऐसे में पहाड़ों में किसी भी किस्म की जल विद्युत परियोजनाओं में पहाड़ी समाज की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। डब्लु सी डी की रिपोर्ट भी यही कहती है। बांधों के निर्माण के लिए बड़ी सामाजिक कीमत ना चुकानी पड़े इसके लिए डब्लूसीडी की रिपोर्ट में कुछ निर्देश दिए हैं जो कि बांध निर्माण संबंधी निर्णयों को कुछ विशिष्ठजनों द्वारा लिए जाने के बजाय प्रभावित जनता के साथ भागीदारी का रवैया बनाने की वकालत करती है। इसी तरह के कुछ प्रयोग, बड़ी और गैरजनपक्षीय बांध परियोजनाओं का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड में करने की कोशिश की है। यहां जनभागीदारी से छोटी जल विद्युत परियोजनाएं बनाने के क्षेत्र में काम किया जा रहा है। इन आंदोलनकारियों ने इन परियोजनाओं के लिए एक बजट मॉडल भी विकसित किया है। जिसके अनुसार 1 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना की लागत 4 करोड़ रूपये होगी। इस धन को आसपास के गांवों के 200 लोगों की सहकारी समिति बनाकर बैंक लोन आदि तरीकों से जुटाया जाएगा। इस सहकारी समिति के 200 सदस्य ही इस परियोजना के शेयरधारक होंगे। बजट के अनुसार 1 मेगावाट की विद्युत इकाई से यदि सिर्फ 800 किलोवाट विद्युत का उत्पादन भी होता है तो वर्तमान बिजली के रेट 3.90 रूपया प्रति यूनिट के हिसाब से एक घण्टे में 3120.00 रूपये, 24 घण्टे में 74,880.00 रूपये और एक माह में 22,46,400.00 रूपये की इन्कम होगी। इसी तरह यह आंकडा, सालाना 2,69,56,800.00 रूपये हो जाएगा। ढाई करोड़ से ऊपर की इस सालाना कमाई से इन गांवों की आर्थिकी सुदृढ़ हो सकती है। ये गांव स्वावलम्बी बन सकते हैं। बजट के अनुसार लोन की 4 लाख प्रतिमाह की किस्तों को भरने के अलावा, परियोजना के 10 से 15 लोगों के स्टाफ की 3.25 लाख प्रति माह तन्ख्वाह, मेंटेनेंस के 2.50 लाख के साथ ही 200 शेयर धारकों को 5000 से 8000 रूपया प्रतिमाह शुद्ध लाभ भी होगा। एक बार हाइड्रो पावर परियोजनाओं का निर्माण कार्य पूरा हो जाय तो उसके बाद इससे ऊर्जा प्राप्त कर लेना बेहद सस्ता होता है। नदियों में बहता पानी इसके लिए सहज प्राप्य कच्चा माल होता है। पहाड़ी गांवों में यदि इस तरह की परियोजनाएं जनसहभागिता से स्थापित हो जाएं तो यह विकास का स्थाई/टिकाऊ तरीका हो सकता है।

लेकिन इस तरह की परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने के कोई भी प्रयास ‘ऊर्जा प्रदेश’ की सरकार नहीं कर रही है। उसके सपनों में तबाही फैलाते बड़े डैम हैं और मध्य एशिया के देशों के ‘पैट्रो डॉलर’ की तर्ज पर इन डैमों से बरसता ‘हाइड्रो डॉलर’। उलटा सरकारें इन परियोजनाओं को हतोत्साहित करने में तुली हुई हैं। दो साल पहले उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सीमांत गांव रस्यूना में सरयू नदी में इसी तरह की एक मेगावाट की एक परियोजना के लिए शोध करने गए, गांधीवादी, आजादी बचाओ आदोलन से जुड़े इंजीनियर और एक कार्यकर्ता को पुलिस ने माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया। मार-पीट/पूछताछ के बाद कुछ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों की पहल पर उन्हें छोड़ा गया। यह उदाहरण है कि किस तरह कॉरपोरट के फायदे के इतर वैकल्पिक मॉडलों पर काम कर रहे लोग दमन का सीधा शिकार हो रहे हैं। इस तरह के वैकल्पिक मॉडल खड़े हो जाना सरकार और मुनाफाखोर निजी कंपनियों को मंजूर नहीं हैं।  

सरयू घाटी के आंदोलित लोग
बारहवी पंचवर्षीय योजना, 2012-2017 के दौरान भारत ने अपनी ऊर्जा क्षमता में एक लाख मेगावाट का अतिरिक्त इजाफा करने का लक्ष्य रखा है। यह जनपक्षीय और पर्यावरणसम्मत् दृष्टि से बिल्कुल असंभव है। और 1 मेगावॉट सरीखी छोटी परियोजनाएं तो इस लक्ष्य को पाने में नगण्य भूमिकाएं ही अदा करेंगी। तो सरकारों का फोकस स्वाभाविक ही मझोली और बड़ी परियोजनाओं की ओर जाना तय है। ऐसे में मझोली परियोजनाएं तो बनेंगी ही साथ ही अतीत की चीज मान ली गई बड़ी बांध परियोजनाओं की दुबारा से भयंकर शुरूआत होगी। और यदि ऊर्जा उत्पादन के इस लक्ष्य को भारत को किसी भी कीमत पर पा ही लेना है तो इसका एकमात्र रास्ता प्रभावित समाजों के प्रतिरोधों का बर्बर दमन करते हुए मनमानी ऊर्जा परियोजनाओं को खड़ा करना ही होगा। भारत का विकास रथ जिस ओर बढ़ रहा है, प्राकृतिक संसाधन संपन्न क्षेत्रों की ओर उसका जो रवैया है ऐसे में यह बर्बर दमन अकल्पनीय नहीं है। जनता और आंदोलनकारियों को कमर कस लेनी चाहिए। 


                                                                              साभार पत्रकार praxis 

Saturday, 15 September 2012

वतन का गीत


हमारे वतन की नई ज़िन्दगी हो

नई ज़िन्दगी इक मुकम्मिल ख़ुशी हो
नया हो गुलिस्ताँ नई बुलबुलें हों
मुहब्बत की कोई नई रागिनी हो
न हो कोई राजा न हो रंक कोई
सभी हों बराबर सभी आदमी हों
न ही हथकड़ी कोई फ़सलों को डाले
हमारे दिलों की न सौदागरी हो
ज़ुबानों पे पाबन्दियाँ हों न कोई
निगाहों में अपनी नई रोशनी हो
न अश्कों से नम हो किसी का भी दामन
न ही कोई भी क़ायदा हिटलरी हो
सभी होंठ आज़ाद हों मयक़दे में
कि गंगो-जमन जैसी दरियादिली हो
नये फ़ैसले हों नई कोशिशें हों
नयी मंज़िलों की कशिश भी नई हो.


-गोरख पाण्डेय

Thursday, 6 September 2012

जातिवादी शोषण के नए केंद्र

समाज में अनुसूचित जाति,जनजाति तथा अल्पसंख्यक समुदायों के सन्दर्भ में सामाजिक न्याय पर आधारित समतामूलक समाज की जब बात की जाती है तो उम्मीद बंधती है कि इसकी स्थापना में उच्च शिक्षा     केंद्र अग्रणी भूमिका निभाएंगे | लेकिन इसके उलट हकीकत बहुत ही भयावह और समता मूलक समाज बनाये  जाने के प्रयासों पर चोट करने वाली है | हल ही में डा राममनोहर लोहिया इंस्टीटूयूट ऑफ मेडिकल साइंस लखनऊ में बंचित तबकों के साथ बड़े पैमाने पर देखने में आया है | सोलह विभागों के 44 पदों के लिए अनुसूचित जाति ,अनुसूचित जनजाति,अन्य पिछडा वर्ग के लिये कोई पद आरक्षित नहीं है |
     मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2011 में किये उच्च शिक्षा सर्वे से प्राप्त आंकड़ों के के अनुसार देश  के केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थिति का जायजा लेने पर स्तिथि भयावह नजर आती है | देश के प्रतिष्ठित जे एन यू में प्रोफ़ेसर के 485 पद हैं इनमे अ जजा के 14 अजा के 30 अपिजा के मात्र दो पद हैं | दिल्ली विश्वविद्यालय के 832 शिक्षक पदों में अजजा के 16,अजा के 49,अपिव के दस शिक्षक कार्यरत हैं | आरक्षण विरोधियों का  गढ़ कहे जाने वाले बनारस हिन्दू विवि में शिक्षक पदों की संख्या 1490 है | यहाँ अजजा के 21,अजा के 81,तथा अपिव का एक भी शिक्षक नहीं है | दिल्ली के एम्स में कुल शिक्षक पदों की संख्या 435 है लेकिन सर्वे के दौरान आंकड़े उपलब्ध नहीं कराये गए |जिनोमिकी एवं समवेत जीव विज्ञानं संसथान दिल्ली ने भी आंकड़े उपलब्ध नहीं कराये | भारतीय प्रौद्योगिकी संसथान कानपूर में शिक्षक पदों की संख्या 406 है जिसमे अजा के दो व अजजा एवं अपिव का कोई शिक्षक कार्यरत नहीं है |इसी प्रकार इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेश न दिल्ली में कुल 13 शिक्षक पदों में एक व्यक्ति अजजा का है तथा अजा एवं अपिव से कोई नहीं है | यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ मेडिकल साइंस दिल्ली में 184 शिक्षक पदों पर 151 कार्यरत हैं जिनमे अजजा से मात्र एक ,अजा से नौ ,अपिव से दो हैं |पंजाब विवि में 212 पदों में अजजा के 12,अजा के 6 तथा अपिव से कोई भी नहीं है |राजस्थान विवि में 900 शिक्षकों में अजजा से दो,अजा से दो,अपिव से बीस तथा मात्र तीन पदों पर गुर्जर समुदाय के व्यक्ति कार्यरत हैं |प्राप्त आंकड़ों की हकीकत बहुत कुछ बयां कर रही है |देश के बयालीस केन्द्रीय विवि में स्वीकृत प्रोफ़ेसर,एसोसिएट प्रोफ़ेसर असिस्टेंट प्रोफ़ेसर `के कुल शिक्षक पदों की संख्या 13514 हैं |जिन पर 8852 व्यक्ति कार्यरत हैं |इनमे अजा के 558,अजजा के 268,अपिव के 245,पीएच 45 तथा सवर्ण समुदाय के 7771 व्यक्ति कार्यरत हैं |कुल मिलाकर अजा,जनजाति तथा पिछडा वर्ग की प्रोफ़ेसर पद पर 1.5%,एसोसिएट प्रोफ़ेसर पद पर 3.8% तथा असिस्टेंट पद पर 3.7% हिस्सेदारी है |
      बीएचयू,दिल्ली विवि,कादी सर्व विवि गुजरात,जीनोमिक एवं समेकित जीव विज्ञानं संसथान दिल्ली ऐसे संसथान हैं जह्हन सवर्ण ही प्रोफ़ेसर व एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं | उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान न होने के कारण आदिवासी,दलित तथा अपिव से आने वाला व्यक्ति इन पदों पर पहुँच ही नहीं पाता |कभी-कभार कोई व्यक्ति यहाँ तक पहुँच भी जाता है तो जातिवादी मानसिकता के कारण उससे उच्च पदों पर बैठे लोग उसके सामने ऐसी परस्थितियाँ पैदा कर देतें हैं कि वाह किसी प्रकार का काम न कर सके |
        तथाकथित सवर्ण वर्ग से आने वाले बुद्धिजीवी समाज के द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में किया जाने वाला यह भेदभाव सबसे खतरनाक होता है | क्योंकि यह वर्ग जानता है कि यदि इन समुदायों को आगे आना है तो सबसे ज्यादा जरूरी है शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी | शिक्षा में बढ़ती हुई इनकी भूमिका रोक डी जाय तो कोई समुदाय कितना भी राजनीतिक अथवा आर्थिक रूप से सशक्त क्यों न हो वह शिक्षा के बिना तरक्की नहीं कर सकता | सवर्ण डोमिनेटेड उच्च शिक्ष के ये संसथान आदिवासी,दलित व् पिछड़े वर्ग के शोषण के नए केंद्र बनते जा रहें हैं |शिक्षक पदों में ही नहीं बल्कि छात्रों के साथ भेदभाव का भी सवर्ण वर्चस्व वाले उच्च शिक्षण संसथान लंबे समय से अपनाते चले आ रहें हैं |
        प्रवेश के मामले में भी  छात्रों से भेदभाव हो रहा है | मेडिकल,आईआईटी,आईआईएम जसे संस्थानों में तो जैसे होड लग गई है |इससे दलित,आदिवासी तथा पिछड़े वर्ग के छात्र आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं |पिछले चार वर्षों में आदिवासी तथा दलित समुदाय के बीस छात्र आत्महत्या कर चुके हैं | उत्तराखंड न्याया लय ने एक मामले में प्रोन्नति में आरक्षण देने पर रोक लगा दी जबकि संविधान में अजा,व अजजा को पदोन्नति  में आरक्षण संबधी अंकों में छूट है |यानी न्यायालयों से भी वंचित तबकों को निराशा ही हाथ लगती है |तमाम कोशिशॉन के बावजूद जातिवाद समाप्त नहीं हो पा रहा है |ऐसी स्तिथि में तो बिल्कुल नहीं जब उच्च शिक्षा केंद्र माने जाने वाले विवि में बैठा तथाकथित सवर्ण वर्ग निम्न मानी जाने वाली जातियों को बराबरी से आने का मौका प्रदान नहीं करता है |

जिटेंडर कुमार मीणा [जेएनयू]