Thursday, 6 September 2012

जातिवादी शोषण के नए केंद्र

समाज में अनुसूचित जाति,जनजाति तथा अल्पसंख्यक समुदायों के सन्दर्भ में सामाजिक न्याय पर आधारित समतामूलक समाज की जब बात की जाती है तो उम्मीद बंधती है कि इसकी स्थापना में उच्च शिक्षा     केंद्र अग्रणी भूमिका निभाएंगे | लेकिन इसके उलट हकीकत बहुत ही भयावह और समता मूलक समाज बनाये  जाने के प्रयासों पर चोट करने वाली है | हल ही में डा राममनोहर लोहिया इंस्टीटूयूट ऑफ मेडिकल साइंस लखनऊ में बंचित तबकों के साथ बड़े पैमाने पर देखने में आया है | सोलह विभागों के 44 पदों के लिए अनुसूचित जाति ,अनुसूचित जनजाति,अन्य पिछडा वर्ग के लिये कोई पद आरक्षित नहीं है |
     मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2011 में किये उच्च शिक्षा सर्वे से प्राप्त आंकड़ों के के अनुसार देश  के केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थिति का जायजा लेने पर स्तिथि भयावह नजर आती है | देश के प्रतिष्ठित जे एन यू में प्रोफ़ेसर के 485 पद हैं इनमे अ जजा के 14 अजा के 30 अपिजा के मात्र दो पद हैं | दिल्ली विश्वविद्यालय के 832 शिक्षक पदों में अजजा के 16,अजा के 49,अपिव के दस शिक्षक कार्यरत हैं | आरक्षण विरोधियों का  गढ़ कहे जाने वाले बनारस हिन्दू विवि में शिक्षक पदों की संख्या 1490 है | यहाँ अजजा के 21,अजा के 81,तथा अपिव का एक भी शिक्षक नहीं है | दिल्ली के एम्स में कुल शिक्षक पदों की संख्या 435 है लेकिन सर्वे के दौरान आंकड़े उपलब्ध नहीं कराये गए |जिनोमिकी एवं समवेत जीव विज्ञानं संसथान दिल्ली ने भी आंकड़े उपलब्ध नहीं कराये | भारतीय प्रौद्योगिकी संसथान कानपूर में शिक्षक पदों की संख्या 406 है जिसमे अजा के दो व अजजा एवं अपिव का कोई शिक्षक कार्यरत नहीं है |इसी प्रकार इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेश न दिल्ली में कुल 13 शिक्षक पदों में एक व्यक्ति अजजा का है तथा अजा एवं अपिव से कोई नहीं है | यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ मेडिकल साइंस दिल्ली में 184 शिक्षक पदों पर 151 कार्यरत हैं जिनमे अजजा से मात्र एक ,अजा से नौ ,अपिव से दो हैं |पंजाब विवि में 212 पदों में अजजा के 12,अजा के 6 तथा अपिव से कोई भी नहीं है |राजस्थान विवि में 900 शिक्षकों में अजजा से दो,अजा से दो,अपिव से बीस तथा मात्र तीन पदों पर गुर्जर समुदाय के व्यक्ति कार्यरत हैं |प्राप्त आंकड़ों की हकीकत बहुत कुछ बयां कर रही है |देश के बयालीस केन्द्रीय विवि में स्वीकृत प्रोफ़ेसर,एसोसिएट प्रोफ़ेसर असिस्टेंट प्रोफ़ेसर `के कुल शिक्षक पदों की संख्या 13514 हैं |जिन पर 8852 व्यक्ति कार्यरत हैं |इनमे अजा के 558,अजजा के 268,अपिव के 245,पीएच 45 तथा सवर्ण समुदाय के 7771 व्यक्ति कार्यरत हैं |कुल मिलाकर अजा,जनजाति तथा पिछडा वर्ग की प्रोफ़ेसर पद पर 1.5%,एसोसिएट प्रोफ़ेसर पद पर 3.8% तथा असिस्टेंट पद पर 3.7% हिस्सेदारी है |
      बीएचयू,दिल्ली विवि,कादी सर्व विवि गुजरात,जीनोमिक एवं समेकित जीव विज्ञानं संसथान दिल्ली ऐसे संसथान हैं जह्हन सवर्ण ही प्रोफ़ेसर व एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं | उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान न होने के कारण आदिवासी,दलित तथा अपिव से आने वाला व्यक्ति इन पदों पर पहुँच ही नहीं पाता |कभी-कभार कोई व्यक्ति यहाँ तक पहुँच भी जाता है तो जातिवादी मानसिकता के कारण उससे उच्च पदों पर बैठे लोग उसके सामने ऐसी परस्थितियाँ पैदा कर देतें हैं कि वाह किसी प्रकार का काम न कर सके |
        तथाकथित सवर्ण वर्ग से आने वाले बुद्धिजीवी समाज के द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में किया जाने वाला यह भेदभाव सबसे खतरनाक होता है | क्योंकि यह वर्ग जानता है कि यदि इन समुदायों को आगे आना है तो सबसे ज्यादा जरूरी है शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी | शिक्षा में बढ़ती हुई इनकी भूमिका रोक डी जाय तो कोई समुदाय कितना भी राजनीतिक अथवा आर्थिक रूप से सशक्त क्यों न हो वह शिक्षा के बिना तरक्की नहीं कर सकता | सवर्ण डोमिनेटेड उच्च शिक्ष के ये संसथान आदिवासी,दलित व् पिछड़े वर्ग के शोषण के नए केंद्र बनते जा रहें हैं |शिक्षक पदों में ही नहीं बल्कि छात्रों के साथ भेदभाव का भी सवर्ण वर्चस्व वाले उच्च शिक्षण संसथान लंबे समय से अपनाते चले आ रहें हैं |
        प्रवेश के मामले में भी  छात्रों से भेदभाव हो रहा है | मेडिकल,आईआईटी,आईआईएम जसे संस्थानों में तो जैसे होड लग गई है |इससे दलित,आदिवासी तथा पिछड़े वर्ग के छात्र आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं |पिछले चार वर्षों में आदिवासी तथा दलित समुदाय के बीस छात्र आत्महत्या कर चुके हैं | उत्तराखंड न्याया लय ने एक मामले में प्रोन्नति में आरक्षण देने पर रोक लगा दी जबकि संविधान में अजा,व अजजा को पदोन्नति  में आरक्षण संबधी अंकों में छूट है |यानी न्यायालयों से भी वंचित तबकों को निराशा ही हाथ लगती है |तमाम कोशिशॉन के बावजूद जातिवाद समाप्त नहीं हो पा रहा है |ऐसी स्तिथि में तो बिल्कुल नहीं जब उच्च शिक्षा केंद्र माने जाने वाले विवि में बैठा तथाकथित सवर्ण वर्ग निम्न मानी जाने वाली जातियों को बराबरी से आने का मौका प्रदान नहीं करता है |

जिटेंडर कुमार मीणा [जेएनयू]

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