Sunday, 12 August 2012

अन्धविश्वास के नुमाइंदे

                         
अन्धविश्वास के नुमाइंदे

    कुदरती कहर में  सैकडो लोगों की जान  चली जाय ,बड़े पैमाने पर लोग बेघर हो जांय और बचे हुए लोगों के पास खाने के लिए कुछ न हो और वहाँ का मुख्यमंत्री पीड़ित जनता को प्राकृतिक आपदावों से बचने के लिए भजन कीर्तन करने की सलाह दे तो इसे  न सिर्फ अंधविश्वास को बढ़ावा देने की कोशिश ,बल्कि गैरजिम्मेदार रवैया कहा जायेगा |
   उत्तराखंड के उत्तरकाशी इलाके में बदल फटने के कारण हुई तबाही के बाद जहाँ राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को रहत कार्यों में तेजी लाने के निर्देश और जनता की तकलीफों को कम करने के उपाय करने चाहिए थे , उन्होने पीड़ितों को सलाह दी कि वे भजन कीर्तन करें | उनकी इस सलाह पर पीड़ितों में स्वाभाविक ही नाराजगी है | अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस सरकार के मुखिया प्राकृतिक संकट का सामना करने के लिए पूजा पाठ करने को एक मात्र उपाय मानते हों वहाँ  हर साल बरसात के मौसम में बदल फटने जैसी आपदावों की अशंका के वाबजूद आपदा प्रबंधन की तैयारी कैसे रही होगी |प्राकृतिक आपदाएं किसी को बता कर नहीं आती | इनसे निपटने के लिए बकायदा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है | यह राज्य की सामान्य व्यवस्था के अतिरिक्त प्रबंध है | लेकिन संबधित महकमों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के बजाय बेतुका सुझाव देकर मुख्यमंत्री ने दरअशल अपनी नाकामी का सबूत दिया है |
    यह अकेला उदहारण नहीं है , जब प्रकृति की मार का सामना करने के लिए किसी राज्य के मुख्यमंत्री के ऐसे अन्धविश्वास बढ़ाने वाले उपायों की सलाह दी या सरकारी स्तर पर ऐशे उपायों का प्रयाश किया | हा ल ही में कर्नाटक की सरकार ने सूखे का सामना करने के और रूठे हुए बादलों को मनाने के लिए मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना और यज्ञ कराने के मकसद से हर मंदिर को ५  हजार रूपये और इस मद में कुल १७ करोड़ रूपये की राशि मुहैया कराई ताकि पूजा करने में कोई अडचन न आये | इससे पहले राल्स्थान में वसुंधरा राजे के शासन कल में इसी तरह के विचित्र उपाय का सहारा लिया गया था |
    सवाल है कि किसी प्राकृतिक आपदा या मौसम की अनिश्चितता का सामना करने के लिए तंत्र -मंत्र पूजा -पाठ या भजन कीर्तन करने जैसी सलाहों पर अमल करना हो तो फिर राज्य या किसी देश में किसी सरकरी तन्त्र की क्या जरूरत है ?दरअसल अमर यहाँ के राजनीतिज्ञों में वैज्ञानिक नजरिये का घोर अभाव दीखता है | संसद या विधान सभा में पहुँचने के बाद जिन लोगों को समाज में वैज्ञानिक चेतना का प्रचार प्रसार के लिए कम करना चाहिए वे खुद अंधविश्वासों में जकड़े रहते या उसे फ़ैलाने में भूमिका निभाते हैं | समस्या है कि हमारे देश में शिक्षा और तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियां लोगों के सोचने के स्तर पर बदलाव लेन में बहुत मददगार साबित नहीं हुई है |इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव है |जिसके चलते अंध आस्थावों पर चोट करने का जोखिम उठाया जाता | जिस दौर में विज्ञानं के क्षेत्र में नित नै कामयाबी मिल रही है ,और दुनिया के वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड की गुत्थियां सुलझाने में आगे बढ़ रहें हैं ,इस तरह की राय जाहिर करने वाली सरकारों को शायद इस बात की कोई फिक्र नहीं है कि ऐसी कवायदों से देश आगे बढ़ने की बजाय पीछे ही जायेगा |उत्तराखंड में बदल फटने की ग्घत्नावों के पीछे की वजहें जाहिर हो चुकी हैं | पहाड़ों का अंधाधुन्ध कटाव और अतार्किक विकाश परियोजनाएं इसका बड़ा कारण है | क्या मुख्यमंत्री को इन तथ्यों पर ध्यान नाहिंन चाहिए |
                                                                                            साभार - जनसत्ता

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