| एक मामूली आदमी | |
प्रभा मजूमदार
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न मालूम कहाँ से
जुटा रखता है सम्बल तमाम विपरीत हालात में जिन्दा रह पाता है, एक मामूली आदमी, लड़ता है हर दिन छोटी छोटी लड़ाईयां करता है मुठभेड़ राशन और सब्जी की पेट्रोल और किराये की बढ़ती कीमत से रिजर्वेशन के लिये लाइन गैस की काला बाजारी बच्चों के एडमीशन और बुजुर्गों की दवाईयों के लिये देखता है छोटे छोटे सपने अक्सर टूटने के लिये कांच की तरह चटख जाने के लिये बालू के घरोन्दों की तरह बिखर जाने के लिये ताश के पत्तों की तरह ढह जाने के लिये फिर भी थमता नहीं है वह सच तो यह है कि उम्मीद ही जिलाये रखती है उसे एक न एक दिन सपनों के पूरा होने की। एक मामूली आदमी सुनता है महान और दिव्य लोगों के प्रवचन सफल, समृद्ध और यशस्वियों से गुरमंत्र उसे दिये जाते हैं हर दिन नये उदाहरण अनुकरण के लिये प्रेरक प्रसंग जनतंत्र का आधार स्तम्भ भी वही है संस्कारों, परम्पराओं और नियम विधानों को ढोता पीढ़ी दर पीढ़ी पुल भी वही है यह मामूली आदमी तंगी, बदनसीबी, बीमारी और हालात की मजबूरी के बावजूद मना ही लेता है पर्व और उत्सव, गुनगुना लेता है खास मौसम में दोस्तों के साथ लगा लेता है ठहाके छोटी छोटी खुशियों पर तमाम उम्र घर, बाहर, दफ्तर, समाज की तमाम जिम्मेदारियां बिना शोर निभाते हुए चुपचाप एक दिन मामूली मौत मर जाता है एक मामूली आदमी। | |
Tuesday, 23 October 2012
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