Friday, 22 March 2013

भगत सिंह की जेल नोटबुक



जेल नोटबुक का दूसरा पन्ना
(जेल नोटबुक का दूसरा पन्ना)
भगत सिंह की ‘जेल नोटबुक’ खोलते ही पहले पन्ने पर अंग्रेज़ी में लिखा है :

“भगत सिंह के लिए
चार सौ चार (404) पृष्ठ...”

नीचे एक हस्ताक्षर है और 12-9-29 की तिथि दी गई है. यह जेल अधिकारियों द्वारा भगतसिंह को कापी देते समय लिखा गया था. उस समय ऐसा किया जाना सामान्य था.

इसके नीचे भगतसिंह के दो पूरे और दो लघु हस्ताक्षर हैं. पृष्ठ के ऊपरी किनारे पर भी अंग्रेज़ी में भगतसिंह का नाम लिखा है.

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पृष्ठ 11
एक अच्छी सरकार की परिभाषा : “अच्छी सरकार स्व-शासन का विकल्प कभी नहीं हो सकती”
“ हेनरी कैम्पबेल बैनरमैन”

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पृष्ठ 15

राजा और राजतंत्र : राष्ट्र ने लुई चौदहवें के विरुद्ध नहीं, बल्कि सरकार के निरंकुश सिद्धांतों के विरुद्ध विद्रोह किया था. ये सिद्धांत मूलत: उससे नहीं, बल्कि कई सदी पहले स्थापित आरंभिक व्यवस्था से पैदा हुए थे, और इतनी गहराई में जड़ जमा चुके थे कि खत्म नहीं किये जा सके थे, तथा परजीवियों एवं लुटेरों का गंदगी से भरा हुआ अस्तबल....कर सकती थी। जब कोई काम करना ज़रूरी हो जाता है, तो उसे दत्त चित्त होकर करना चाहिए, या उसे करने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए...राजा और राजतंत्र दो अलग-अलग भिन्न चीजें थीं; और पूर्वाक्त (यानी राजा) या उसके सिद्धान्तों के ही विरोध में यह विद्रोह हुआ और क्रांति की गई.

द राइट्स ऑफ़ मैन से

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पृष्ठ-16
मज़दूर का अधिकार
‘‘जो कोई भी कठिन श्रम से कोई चीज़ पैदा करता है उसे यह बताने के लिए किसी ख़ुदाई पैग़ाम की ज़रूरत नहीं कि पैदा गई चीज़ पर उसी का अधिकार है.’’

राबर्ट जी इंगरसोल
अमेरिकी वकील, वक्ता और लेखक (1832-1899)

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पृष्ठ-18-
ग़रीब मज़दूर
‘‘...और हम लोग, जिन्होंने इस काम को अंजाम देने का बीड़ा उठाया, इस दुनिया में कुजात ही रहे. एक अंधी किस्मत, एक विराट निर्मम तंत्र ने काट-छाँटकर हमारे अस्तित्व का ढाँचा निर्धारित कर दिया. हम उस वक़्त तिरस्कृत हुए, जब हम सबसे अधिक उपयोगी थे, हमें उस वक़्त दुत्कार दिया गया, जब हमारी ज़रूरत नहीं थी, और हमें उस वक़्त भुला दिया गया, जब हमारे ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूटा हुआ था. हमें बीहड़-बंजर साफ़ करने के लिए, उसकी सारी आदिम भयंकरदाताओं को दूर करने के लिए, तथा उसके विश्व-पुरातन अवरोधों को छिन्न-भिन्न कर डालने के लिए भेज दिया जाता. हम जहाँ भी काम करते, वहाँ एक दिन एक नया शहर जन्म ले लेता और जब यह जन्म ले ही रहा होता, तब यदि हममें से कोई वहाँ चला जाता, तो उसे ‘बिना निश्चित पते का आदमी’ कहकर पकड़ लिया जाता और सिरफिरा-आवारा कहकर उस पर मुकदमा चलाया जाता.’’

पैट्रिक मैकगिल की कृति, चिल्ड्रेन ऑफ़ द डेड एंड,
स्रोत- अज्ञात


(नोटबुक का एक और पन्ना)
(नोटबुक का एक और पन्ना)
पृष्ठ 44

क्राँति और वर्ग
सारे के सारे वर्ग सत्ता पाने की कोशिश में क्राँतिकारी ही होते हैं और समानता की बातें करते हैं. और सारे के सारे वर्ग जब सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो संकीर्णतावादी हो जाते हैं और मान लेते हैं कि समानता सिर्फ़ एक रंगीन सपना भर है. सारे के सारे वर्ग, सिर्फ़ एक को – मज़दूर वर्ग को छोड़कर, क्योंकि जैसा कि आगस्त कॉम्ते (फ्रांसीसी विचारक) ने कहा है, ‘‘सच कहा जाए तो मज़दूर वर्ग एक वर्ग होता ही नहीं, बल्कि वह तो समाज के निकाय का संघटक होता है. लेकिन मज़दूर वर्ग का वक़्त, यानी सभी लोगों के एक हो जाने का वक़्त अभी भी नहीं आया है.’’

‘‘वर्ल्ड हिस्ट्री फॉर वर्कर्स’’ पृ 47, अल्फ्रेड बार्टन कृत

पृष्ठ-47-

क्राँति शब्द की परिभाषा

‘‘क्राँति शब्द की अवधारणा को इस शब्द की पुलिसिया व्याख्या के अर्थ में, यानी सशस्त्र विद्रोह के अर्थ में नहीं लेना चाहिए. यदि किसी पार्टी के पास दूसरे, कम खर्चीले, और अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित तरीके इस्तेमाल करने की गुंजाइश है, और तब भी वह सिद्धांत के नाते विद्रोह का ही तरीका अपनाती है, तो उसे पागल की कहा जाएगा. इस अर्थ में, सामाजिक जनवाद कभी भी सिद्धांत के नाते क्राँतिकारी नहीं रहा. ऐसा यह सिर्फ़ इसी अर्थ में है कि यह इस बात को मानता है कि जब इसे राजनीतिक सत्ता हासिल हो जाएगी, तो यह इसका इस्तेमाल वर्तमान व्यवस्था को टिकाए रखने वाली उत्पादन-प्रणाली को खत्म करने के अलावा और किसी मकसद के लिए नहीं करेगा.’’

कार्ल काउत्स्की
कार्ल काउत्सकी (1854-1938) जर्मन सामाजिक-जनवादी आंदोलन और दूसरे इंटरनेशलन के एक नेता.

पृष्ठ 47

अमरीका के बारे में कुछ तथ्य और आंकड़े
5 आदमी 1000 लोगों के लिए रोटी पैदा कर सकते हैं.
1 आदमी 250 लोगों के लिए सूती कपड़ा पैदा (कर सकता) है.
1 आदमी 300 लोगों के लिए ऊनी कपड़ा पैदा कर सकता है.
1 आदमी 1000 लोगों के लिए बूट और जूते पैदा कर सकता है.

आयरन हील (पृ-78)
जैक ग्रिफिथ लण्डन (1876-1916) का उपन्यास ‘आयरन हील’, जो 1908 में प्रकाशित हुआ.

15,000,000 लोग बेपनाह गरीबी (में) जी रहे हैं जो अपनी श्रम-दक्षता को भी बनाए नहीं रख सकते. 3,000,000 बाल श्रमिक.

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पृष्ठ 50
अवसरवाद का जन्म
क़ानून के दायरे में रहकर काम करने की संभावना ने ही दूसरे इंटरनेशनल के समय में मज़दूर पार्टियों के भीतर अवसरवाद को जन्म दिया.

लेनिन, द्वितीय इंटरनेशनल का पतन

गैरक़ानूनी काम
‘‘किसी देश में जहाँ बूर्ज़ुआ वर्ग या प्रतिक्राँतिकारी सामाजिक जनवाद सत्ता में है, कम्युनिस्ट पार्टी को अपने क़ानूनी और गैर क़ानूनी कामों के बीच एक तालमेल रखना अवश्य सीख लेना चाहिए और क़ानूनी काम को हमेशा और निश्चित रूप से ग़ैर क़ानूनी पार्टी के प्रभावी नियंत्रण में ही रहना चाहिए.’’

बुखारिन
निकोलाई अलेक्सांद्रोविच बुखारिन (1888-1938) रूसी सामाजिक-जनवादी मजदूर पार्टी के सदस्य, जो 1937 में कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण पार्टी से निकाले गए.

दूसरे इंटरनेशनल के लक्ष्य के साथ विश्वासघात
समाजवाद और श्रम के इस विराट संगठन को ऐसी शांतिकालीन गतिविधियों के लिए अनुकूलित कर दिया गया, और जब संकट आया, तो बहुत से नेता और जनसमुदायों के भारी हिस्से अपने आपको इस नई स्थिति के अनुरूप बनाने में असमर्थ हो गए... यही वह अपरिहार्य स्थिति है जो बहुत हद तक दूसरे इंटरनेशनल के विश्वासघात का कारण है.

मार्क्स टु लेनिन, पृ 140 मारिस हिलक्वीट

(क्रमशः)

भूख
‘‘शासक के लिए उचित यही है कि उसके शासन में कोई भी आदमी ठंड और भूख से पीड़ित न रहे. आदमी के पास जब जीने के मामूली साधन भी नहीं रहते, तो वह अपने नैतिक स्तर को बनाए नहीं रख सकता.’’

कोंको होशी
जापान का बौद्ध भिक्षु,14वीं सदी, पृ 135

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पृष्ठ-31 में ये उर्दू में लिखा शेर है लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि किस शायर का है.

तुझे ज़बह करने की खुशी, मुझे मरने का शौक,
मेरी भी मर्ज़ी वही है, जो मेरे सैयाद की है.

(क्रमशः)

(नोटबुक का एक और पन्ना)
(नोटबुक का एक और पन्ना)
पृष्ठ 102

‘मार्क्सवाद बनाम समाजवाद’

(1908-12)
लेखक व्लादीमिर जी सिखोविच
पीएचडी कोलंबिया विश्वविद्यालय
वह एक-एक करके मार्क्स के सारे सिद्धांतों की आलोचना करते हैं और इन सभी को ख़ारिज करते हैं-
मूल्य का सिद्धांत
इतिहास की आर्थिक व्याख्या
संपदा का थोड़े से हाथों, अर्थात पूँजीपतियों के हाथों में संकेंद्रण, मध्यम वर्ग का पूरी तरह खात्मा और सर्वहारा वर्ग की बाढ़
बढ़ती गरीबी का सिद्धांत, जिसकी परिणति के तौर पर
आधुनिक राज्य और सामाजिक व्यवस्था का अपरिहार्य संकट.

वह निषकर्ष निकालते हैं कि मार्क्सवाद सिर्फ़ इन्हीं मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है, और उन्हें एक-एक करके ख़ारिज करते हुए, निष्कर्ष के तौर पर कहते हैं कि क्रांति के जल्दी फूट पड़ने की सारी धुंधली आशंकाएँ अभी तक निर्मूल ही साबित हुई हैं. मध्यम वर्ग घट नहीं, बल्कि बढ़ रहा है. धनी वर्ग संख्या में बढ़ रहा है, तथा उत्पादन और उपभोग की प्रणाली भी परिस्थितियों के अनुसार बदल रही है, अतः मज़दूरों की दशा में सुधार करके किसी भी प्रकार के संघर्ष को टाला जा सकता है. सामाजिक अशांति का कारण बढ़ती गरीबी नहीं, बल्कि औद्योगिक केंद्रों पर गरीब वर्गों का संकेंद्रण है, जिसके नाते वर्ग-चेतना पैदा हो रही है. इसीलिए यह सब चिल्ल-पों है.

भगत सिंह की नोटबुक में दर्ज टिप्पणी

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पृष्ठ 124

जीवन का उद्देश्य

‘‘जीवन का उद्देश्य मन को नियंत्रित करना नहीं बल्कि उसका सुसंगत विकास करना है, मरने के बाद मोक्ष प्राप्त करना नहीं, बल्कि इस संसार में ही उसका सर्वोत्तम इस्तेमाल करना है, केवल ध्यान में ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के यथार्थ अनुभव में भी सत्य, शिव और सुंदर का साक्षात्कार करना है, सामाजिक प्रगति कुछेक की उन्नति पर नहीं, बल्कि बहुतों की समृद्धि पर निर्भर करती है, और आत्मिक जनतंत्र या सार्वभौमिक भ्रातृत्व केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब सामाजिक-राजनीतिक और औद्योगिक जीवन में अवसर की समानता हो.’’

स्रोत अज्ञात

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