आजकल टेलीविज़न पर रियलिटी शो की भरमार है | सन १९४८ में एलन फाँट नाम
के ब्यक्ति के दिमाग में रियलिटी शो बनाने का विचार आया और कैंडिड कैमरा नाम से
रियलिटी शो बना | इसके बाद कई शो बने | भारत में रियलिटी शो का इतिहास करीब दो दशक
पुराना है | ३ दिसंबर १९९३ को पहला रियलिटी शो अन्ताक्षरी शुरू हुवा जिसके ६००
एपिसोड प्रशारित हुए | १९९५ में संगीत पर आधारित कार्यक्रम सारेगामा आया और इस
कार्यक्रम से फिल्म उद्योग को कुछ अच्छे गायक भी मिले | २००० में एक नया रियलिटी
शो आया कौन बनेगा करोडपति जिसमे शदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने होस्ट की भूमिका
निभायी | यह शो एक अमेरिकी शो से प्रेरित था , इसके बाद तो सभी चैनलों में रियलिटी
शो प्रशारित करने की होड़ सी शुरू हो गयी और दस का दम,सवाल दस करोड़ का,इंडियन आयडल
आदि तमाम तरह के रियलिटी शो आने लगे |
एक समय था जब टेलीविजन पर मनोरंजन के नाम समाचार,चित्रहार,और सप्ताह में एक फिल्म दिखाई जाती थी और रात को १० बजे टीबी के कार्यक्रम बंद हो जाते थे | लेकिन अब चौबीसों घंटे कार्यक्रम चलते रहते हैं और चैनलों की भरमार हो गयी है |१९८४ से १९९१ तक टेलीविजन पर लगभग ठीक- ठाक प्रोग्राम दिखाए गए | १९९१ के बाद टेलीविजन ड्राइंगरूम से बेडरूम में घुस गया और निजी जीवन में ताकझांक करने लगा | सच का सामना,राखी का स्वयंबर,इमोशनल अत्याचार,बिग बॉस जैसे रियलिटी शो प्रसारित होने लगे और दर्शक उपभोक्ता में तब्दील हो गए | कर्यक्रमो में विविधता का दौर शुरू हो गया और सब कुछ बाजार के द्वारा तय होने लगा,जिसके फलस्वरूप टेलीविजन के कार्यक्रमों से मूल्य और नैतिकता गायब हो गयी |
अब सवाल पैदा होता है कि रियालिटी शो में क्या सब कुछ रियल होता है ?और ये रियलिटी शो किस सन्दर्भ में रियल हैं ? प्रेमचंद,शरदचंद,राहुल व अन्य प्रगतिशील लेखकों ने अपनी रचनावो के माध्यम से समाज का जो वास्तविक चित्रण किया है ये शो क्या इसी तरह की वास्तविकता दिखाते हैं ? ये रियलिटी शो कोई भी वास्तविकता नहीं दिखाते बल्कि पैसे के लिए लालच ये सन्देश परोसते है | जब असल ज़िंदगी में रियल कुछ नहीं रह गया तो इन रियलिटी शो में क्या होगा |
एक अध्ययन के अनुसार रियलिटी शो में दिखाई जाने वाली कहानी और बिषयबस्तु का युवावों के मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है | वे ग्लैमर से भरी चकाचौंध दुनिया को हकीकत समझ बैठते हैं जबकि हकीकत में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,फलस्वरूप वे कुंथाग्रष्त हो जाते हैं | वयस्कों के बाद चैनल की टीआरपी बढ़ने के लिए अब बच्चों के लिए भी रियलिटी शो बनने लगे हैं , जो बच्चों से उनका बचपना छीन रहे हैं व उनको कुंठाग्रस्त और स्वार्थी बना रहे हैं |गरीबी के चलते गरीब जनता के बच्चे बालशोषण और बालमजदूरी का शिकार होते थे | लेकिन अब इन रियलिटी शो के जरिये सभ्रांत परिवारों के बच्चों का भी शोषण हो रहा है | रातों रात अमीर बनने की ललक के चलते बच्चे माँ-बाप की कुंठा व असफल माँ-बाप की सफलता की सीढ़ी बन रहे हैं |
रियलिटी शो के नाम पर बच्चों से भद्दा डांस,घिनौने संबाद, द्विअर्थी गाने गवाए जाते हैं क्या ये सही तरीका उनकी प्रतिभा को आकाने का ? इस छोटी सी उम्र में दुनिया के सामने उनकी रैगिंग की जाती है | बचपन में ही उन पर असफलता का तमगा लगा दिया जाता है,जिस बोझ के साथ उसे जिन्दगी जीनी होती है | देशभर में लाखों बच्चे इस शो में हिस्सा लेते हैं और जीतने वाले दस से ज्यादा नहीं होते हैं | देखा जय तो ये एक प्रकार का लाट्रीशो है | ये शो बालश्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए खूब चल रहे हैं | असफलता के डर के कारण इन बच्चों में अनेक प्रकार के मनोविकार पैदा हो जाते हैं | अचानक मिली सफलता को ये कभी-कभी पचा नहीं पाते एक दो साल तक ये ग्लैमर की दुनिया में जगमगाते हैं परन्तु कुछ समय बाद गुम हो जाते हैं | बच्चों को यहाँ लम्बी अवधी तक अलग रखा जाता है,दबाव और चिंता के माहौल में रहने व आराम की कमी के कारण इनमे अनिंद्रा आदि की कमी हो जाती है | शिशुरोग विशेषज्ञों के अनुसार शूटिंग के दौरान तेज रोशनी का सामना करना पड़ता है जिसका उनके शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | बच्चो को सजाने सवांरने के दौरान उनके चहरे पर जो कॉस्मेटिक लगाया जाता है उससे उनकी कोमल त्वचा को नुकसान होता है |
जितने भी रियलिटी शो द्ल्खाये जाते हैं उनमे अपशब्द,गन्दी राजनीतिव अन्य हत्कंडे अपनाकर खूब दर्शक बटोरे जाते हैं और चैनल की टीआरपी बढ़ायी जाति है | दूसरी तरफ देखें तो इन कार्यक्रमों के पीछे बाजार अपना काम करता रहता है | हुनरमंदों को हुनर सिखाने के प्रदर्शन का मंच मुहैया कराते, रियलिटी शो में हिस्सा लेने की तैयारियों के प्रशिक्षण के बाज़ार महानगरों से कस्बों तक फ़ैल रहे हैं | एक अनुमान के अनुसार बीते दस सालों में दस हजार से भी ज्यादा प्रशिक्षण केंद्र खुले हैं जहाँ रियलिटी शो के लिए संभावित प्रतियोगी तैयार किये जाती हैं |रियलिटी शो के पीछे एक बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो रहा है | एक तरफ शो में हिस्सा लेने बावत तैयारियों से जुड़े कोचिंग संस्थान हैं तो किताब ,सीडी से लेकर कई दूससे उत्पाद भी | रियलिटी शो को अपने कुल राजस्व का ३० से ४० प्रतिशत मोबाइल एसएमएस से मिल जाता है | महत्वपूर्ण प्रशन ये है कि इन शो के नाम पर सिर्फ कारोबार हो रहा है बाकी कच्छ नहीं |टेलीविजन चैनलों को कम मेहनत में विज्ञापनों के बाजार में बड़ा हिस्सा बटोरने के लिए ये शो मुफीद लगते हैं |
एक समय था जब टेलीविजन पर मनोरंजन के नाम समाचार,चित्रहार,और सप्ताह में एक फिल्म दिखाई जाती थी और रात को १० बजे टीबी के कार्यक्रम बंद हो जाते थे | लेकिन अब चौबीसों घंटे कार्यक्रम चलते रहते हैं और चैनलों की भरमार हो गयी है |१९८४ से १९९१ तक टेलीविजन पर लगभग ठीक- ठाक प्रोग्राम दिखाए गए | १९९१ के बाद टेलीविजन ड्राइंगरूम से बेडरूम में घुस गया और निजी जीवन में ताकझांक करने लगा | सच का सामना,राखी का स्वयंबर,इमोशनल अत्याचार,बिग बॉस जैसे रियलिटी शो प्रसारित होने लगे और दर्शक उपभोक्ता में तब्दील हो गए | कर्यक्रमो में विविधता का दौर शुरू हो गया और सब कुछ बाजार के द्वारा तय होने लगा,जिसके फलस्वरूप टेलीविजन के कार्यक्रमों से मूल्य और नैतिकता गायब हो गयी |
अब सवाल पैदा होता है कि रियालिटी शो में क्या सब कुछ रियल होता है ?और ये रियलिटी शो किस सन्दर्भ में रियल हैं ? प्रेमचंद,शरदचंद,राहुल व अन्य प्रगतिशील लेखकों ने अपनी रचनावो के माध्यम से समाज का जो वास्तविक चित्रण किया है ये शो क्या इसी तरह की वास्तविकता दिखाते हैं ? ये रियलिटी शो कोई भी वास्तविकता नहीं दिखाते बल्कि पैसे के लिए लालच ये सन्देश परोसते है | जब असल ज़िंदगी में रियल कुछ नहीं रह गया तो इन रियलिटी शो में क्या होगा |
एक अध्ययन के अनुसार रियलिटी शो में दिखाई जाने वाली कहानी और बिषयबस्तु का युवावों के मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है | वे ग्लैमर से भरी चकाचौंध दुनिया को हकीकत समझ बैठते हैं जबकि हकीकत में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,फलस्वरूप वे कुंथाग्रष्त हो जाते हैं | वयस्कों के बाद चैनल की टीआरपी बढ़ने के लिए अब बच्चों के लिए भी रियलिटी शो बनने लगे हैं , जो बच्चों से उनका बचपना छीन रहे हैं व उनको कुंठाग्रस्त और स्वार्थी बना रहे हैं |गरीबी के चलते गरीब जनता के बच्चे बालशोषण और बालमजदूरी का शिकार होते थे | लेकिन अब इन रियलिटी शो के जरिये सभ्रांत परिवारों के बच्चों का भी शोषण हो रहा है | रातों रात अमीर बनने की ललक के चलते बच्चे माँ-बाप की कुंठा व असफल माँ-बाप की सफलता की सीढ़ी बन रहे हैं |
रियलिटी शो के नाम पर बच्चों से भद्दा डांस,घिनौने संबाद, द्विअर्थी गाने गवाए जाते हैं क्या ये सही तरीका उनकी प्रतिभा को आकाने का ? इस छोटी सी उम्र में दुनिया के सामने उनकी रैगिंग की जाती है | बचपन में ही उन पर असफलता का तमगा लगा दिया जाता है,जिस बोझ के साथ उसे जिन्दगी जीनी होती है | देशभर में लाखों बच्चे इस शो में हिस्सा लेते हैं और जीतने वाले दस से ज्यादा नहीं होते हैं | देखा जय तो ये एक प्रकार का लाट्रीशो है | ये शो बालश्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए खूब चल रहे हैं | असफलता के डर के कारण इन बच्चों में अनेक प्रकार के मनोविकार पैदा हो जाते हैं | अचानक मिली सफलता को ये कभी-कभी पचा नहीं पाते एक दो साल तक ये ग्लैमर की दुनिया में जगमगाते हैं परन्तु कुछ समय बाद गुम हो जाते हैं | बच्चों को यहाँ लम्बी अवधी तक अलग रखा जाता है,दबाव और चिंता के माहौल में रहने व आराम की कमी के कारण इनमे अनिंद्रा आदि की कमी हो जाती है | शिशुरोग विशेषज्ञों के अनुसार शूटिंग के दौरान तेज रोशनी का सामना करना पड़ता है जिसका उनके शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | बच्चो को सजाने सवांरने के दौरान उनके चहरे पर जो कॉस्मेटिक लगाया जाता है उससे उनकी कोमल त्वचा को नुकसान होता है |
जितने भी रियलिटी शो द्ल्खाये जाते हैं उनमे अपशब्द,गन्दी राजनीतिव अन्य हत्कंडे अपनाकर खूब दर्शक बटोरे जाते हैं और चैनल की टीआरपी बढ़ायी जाति है | दूसरी तरफ देखें तो इन कार्यक्रमों के पीछे बाजार अपना काम करता रहता है | हुनरमंदों को हुनर सिखाने के प्रदर्शन का मंच मुहैया कराते, रियलिटी शो में हिस्सा लेने की तैयारियों के प्रशिक्षण के बाज़ार महानगरों से कस्बों तक फ़ैल रहे हैं | एक अनुमान के अनुसार बीते दस सालों में दस हजार से भी ज्यादा प्रशिक्षण केंद्र खुले हैं जहाँ रियलिटी शो के लिए संभावित प्रतियोगी तैयार किये जाती हैं |रियलिटी शो के पीछे एक बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो रहा है | एक तरफ शो में हिस्सा लेने बावत तैयारियों से जुड़े कोचिंग संस्थान हैं तो किताब ,सीडी से लेकर कई दूससे उत्पाद भी | रियलिटी शो को अपने कुल राजस्व का ३० से ४० प्रतिशत मोबाइल एसएमएस से मिल जाता है | महत्वपूर्ण प्रशन ये है कि इन शो के नाम पर सिर्फ कारोबार हो रहा है बाकी कच्छ नहीं |टेलीविजन चैनलों को कम मेहनत में विज्ञापनों के बाजार में बड़ा हिस्सा बटोरने के लिए ये शो मुफीद लगते हैं |
इस प्रकार के कार्यक्रम जो अपसंस्कृति परोस रहें हैं इन्हें संगठित प्रयास करके रोकना होगा |
Very nicely and acuratelh written. Good job
ReplyDeleteVery nicely and acuratelh written. Good job
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