अहल -ए- दवल में धूम की रोज-सा ईद
मुफलिस के दिल में थी ना किरण
भी उम्मीद की
इतने में और चर्ख ने मट्टी
पलीद की
बच्चे ने जो मुस्करा के खबर दी जो ईद की
वर्त-ए-मिहान से नब्ज की रफ़्तार
रुक गई
माँ बाप की निगाह उठी और
झुक गई
आँखे खुली कि दस्त-ए-तिही पर नजर गई
बच्चे के बलबलो की दिलों तक खबर गई
जुल्फ-ए-सबात गम की हवा से
बिखर गई
बरछी सी इक दिल से जिगर तक उतर गई
दोनों हुजूम-ए-गम से हम-आगोश हो गए
इक दुसरे को देख के खामोस हो गए
-जोश मलीहाबादी
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मुफलिस के दिल में थी ना किरण
भी उम्मीद की
इतने में और चर्ख ने मट्टी
पलीद की
बच्चे ने जो मुस्करा के खबर दी जो ईद की
वर्त-ए-मिहान से नब्ज की रफ़्तार
रुक गई
माँ बाप की निगाह उठी और
झुक गई
आँखे खुली कि दस्त-ए-तिही पर नजर गई
बच्चे के बलबलो की दिलों तक खबर गई
जुल्फ-ए-सबात गम की हवा से
बिखर गई
बरछी सी इक दिल से जिगर तक उतर गई
दोनों हुजूम-ए-गम से हम-आगोश हो गए
इक दुसरे को देख के खामोस हो गए
-जोश मलीहाबादी
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बहुत बढ़िया नज़्म है. धन्यवाद.
ReplyDeleteशुक्रिया
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