कुछ समय पहले महिलाओं के लिए सेल्फ डिफेंस कार्यक्रम में महिला पत्रकारों का समूह बैठा था. इनमें से बहुत-सी पत्रकार राष्ट्रीय स्तर पर जाना-माना नाम थीं. कार्यक्रम की शुरुआत में इंस्ट्रक्टर ने सभी पत्रकारों से पूछा कि आप में से किन-किन महिलाओं को आपराधिक घटनाओं का सामना करना पड़ा है.
इस सवाल के जवाब में कुछ ही महिलाओं ने हाथ उठाए. पूछने पर किसी ने बताया कि बदमाशों ने उसका मोबाइल छीना तो किसी ने कहा कि उनकी सोने की चेन की झपटमारी हुई.
इंस्ट्रक्टर ने अचानक दूसरा सवाल पूछा कि आपमें से कितनी लड़कियां और महिलाएं कभी न कभी छेड़खानी की शिकार हुई हैं. इस सवाल के जवाब में हॉल में बैठी सभी पत्रकारों ने हाथ उठाए. प्रशिक्षक ने कहा कि हैरानी की बात यह है कि आप में कोई भी महिला छेड़खानी को अपराध नहीं मानती हैं, यानी अगर आपके साथ छेड़खानी हुई है तो आप उसे अपराध की तरह नहीं लेती हैं.
प्रशिक्षक का यह सवाल आंखें खोलने वाला था. यह हाल उन महिलाओं का है, जो चुनौतीपूर्ण नौकरी करते हुए खुद को प्रबुद्ध समाज का हिस्सा मानती हैं. खासतौर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को आम महिलाओं के मुकाबले थोड़ा सजग और बहादुर भी माना जाता है. लेकिन यौन उत्पीड़न के मसले पर उनकी भी मानसिकता आम महिलाओं से अलग नहीं थी.
आखिर "सशक्त" मानी जाने वाली महिलाओं की भी कंडीशनिंग ऐसी कैसे हो गई कि वे यौन उत्पीड़न की घटनाओं को अपराध के दरजे में नहीं गिनतीं और काफी हद तक उसे अपनी नियति समझने लगती हैं.
एक किशोरी के यौन-उत्पीड़न के मामले में जब स्वयंभू संत आसाराम को पकड़ा गया, तब जाकर पूरे देश की नजरें इस ओर गईं. एक मामला दर्ज होने के बाद ऐसे कई आरोप सामने आए. जयपुर में कई महिलाएं आसाराम के खिलाफ शिकायतें लेकर आईं.
एक सवाल यह उठ सकता है कि बच्ची के साथ जुल्म होने के बाद ही ये शिकायतें सामने क्यों आईं? निजी तौर पर मैं तमाम बाबाओं को संदिग्ध ही मानती हूं. लेकिन ऐसे कितने ही बाबा टाइप के पाखंडी हैं, जिनके खिलाफ खुल कर आरोप सामने आए या उन्हें पकड़ा भी गया, लेकिन उनके खिलाफ समाज में कोई आक्रोश या विरोध नहीं उभरा. तब भी, जब इन बाबाओं पर महिलाओं के उत्पीड़न या शोषण के आरोप लगे.
यह स्थिति तब है जब पिछले साल सोलह दिसंबर या कुछ समय पहले मुंबई शक्ति मिल में सामूहिक बलात्कार के मामले पर देश भर में गुस्से की लहर दौड़ पड़ी और यहां तक कि दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई. लेकिन इन बाबाओं के खिलाफ न केवल हालात की शिकार महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं, बल्कि कोई सामाजिक प्रतिरोध ठोस शक्ल अख्तियार कर पाता है.
बहरहाल, महिलाओं के चुप रह जाने की स्थितियां अलग होती हैं. यह उनकी कंडीशनिंग पर भी निर्भर हो सकती है. शायद दिल्ली में बैठी उन सशक्त पत्रकारों की तरह सामान्य महिलाओं को भी यह पता नहीं रहा होगा कि धर्म और आस्था के नाम पर साधु-संत उनके साथ जो कर रहे हैं, वह उनके खिलाफ किया गया अपराध ही है. एक पुख्ता कानून बन जाने के बाद भी हमारे देश में कितनी महिलाएं ऐसी हैं जो पति की मार-पिटाई को अपराध मानती हैं.
एक लड़की के पैदा होते ही उसे धार्मिक रूप से शिक्षित करना शुरू कर दिया जाता है. धीरे-धीरे यही धर्म के संदेश शिक्षा और कानून पर भारी पड़ने लगते हैं. घर में पिता-पति के खिलाफ कुछ नहीं बोलना और बाहर उन धर्मगुरुओं के खिलाफ नहीं बोलना, जिनकी शरण में वे भेजी जाती हैं. मानसिकता वही है कि एक शासक के रूप में पिता या पति आपके साथ जो भी करता है वह सही है तो उसी के अलग शक्ल के रूप में धर्मगुरु भी आपके साथ जो करेगा वह सही होगा. यही मानसिक कंडीशनिंग एक ऐसा भाव पैदा कर देती है कि जब धर्मगुरु, बाबा या तांत्रिक स्त्री का शारीरिक शोषण करता है तो वह उसे धर्म या खास तरह के उपचार का हिस्सा मानने लगती है.
एक बच्ची को आधुनिक स्कूल से हटा कर गुरुकुल में पढ़ने भेज दिया जाता है. आखिर इन गुरुकुलों में कौन अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए भेजता है? या तो अंधश्रद्धा या फिर गरीबी के कारण. छिंदवाड़ा वाला मामला अंधश्रद्धा का है. नहीं तो ज्यादातर गरीब घर के लोग ही अंधभक्ति से उपजे भरोसे के कारण ही अपने बच्चों को इन आश्रमों में भेजते हैं. यही वजह है कि उच्च-मध्यवर्ग को इस मामले में बापू के खिलाफ साजिश दिखाई देती है. गुरुकुल में पढ़ने वाली या आश्रम में रहने वाली बच्ची उन्हें अपनी नहीं लगती है, आसाराम उन्हें सवालों से ऊपर लगता है. तब भी, जब उसके खिलाफ आरोपों के सिलसिले हैं, बस उसे अदालतों में साबित होना था.
लेकिन वर्गीय वंचना के शिकार वर्गों की बच्चियों से कोई सहानुभूति नहीं दर्शाने वालों को क्या यह मालूम नहीं है कि आधुनिक कहे जाने वाले स्कूलों में उच्च मध्यवर्ग की बच्ची कितनी सुरक्षित है? ऐसे तमाम मामले हैं, जिनमें नामी-गिरामी स्कूलों में पढ़ने वाली बच्चियां यौन-शोषण से लेकर दूसरी तमाम तरह की प्रताड़नाओं की शिकार हुईं, लेकिन उसे या तो दबा दिया गया, या फिर उसे तूल नहीं दिया गया..........
इस सवाल के जवाब में कुछ ही महिलाओं ने हाथ उठाए. पूछने पर किसी ने बताया कि बदमाशों ने उसका मोबाइल छीना तो किसी ने कहा कि उनकी सोने की चेन की झपटमारी हुई.
इंस्ट्रक्टर ने अचानक दूसरा सवाल पूछा कि आपमें से कितनी लड़कियां और महिलाएं कभी न कभी छेड़खानी की शिकार हुई हैं. इस सवाल के जवाब में हॉल में बैठी सभी पत्रकारों ने हाथ उठाए. प्रशिक्षक ने कहा कि हैरानी की बात यह है कि आप में कोई भी महिला छेड़खानी को अपराध नहीं मानती हैं, यानी अगर आपके साथ छेड़खानी हुई है तो आप उसे अपराध की तरह नहीं लेती हैं.
प्रशिक्षक का यह सवाल आंखें खोलने वाला था. यह हाल उन महिलाओं का है, जो चुनौतीपूर्ण नौकरी करते हुए खुद को प्रबुद्ध समाज का हिस्सा मानती हैं. खासतौर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को आम महिलाओं के मुकाबले थोड़ा सजग और बहादुर भी माना जाता है. लेकिन यौन उत्पीड़न के मसले पर उनकी भी मानसिकता आम महिलाओं से अलग नहीं थी.
आखिर "सशक्त" मानी जाने वाली महिलाओं की भी कंडीशनिंग ऐसी कैसे हो गई कि वे यौन उत्पीड़न की घटनाओं को अपराध के दरजे में नहीं गिनतीं और काफी हद तक उसे अपनी नियति समझने लगती हैं.
एक किशोरी के यौन-उत्पीड़न के मामले में जब स्वयंभू संत आसाराम को पकड़ा गया, तब जाकर पूरे देश की नजरें इस ओर गईं. एक मामला दर्ज होने के बाद ऐसे कई आरोप सामने आए. जयपुर में कई महिलाएं आसाराम के खिलाफ शिकायतें लेकर आईं.
एक सवाल यह उठ सकता है कि बच्ची के साथ जुल्म होने के बाद ही ये शिकायतें सामने क्यों आईं? निजी तौर पर मैं तमाम बाबाओं को संदिग्ध ही मानती हूं. लेकिन ऐसे कितने ही बाबा टाइप के पाखंडी हैं, जिनके खिलाफ खुल कर आरोप सामने आए या उन्हें पकड़ा भी गया, लेकिन उनके खिलाफ समाज में कोई आक्रोश या विरोध नहीं उभरा. तब भी, जब इन बाबाओं पर महिलाओं के उत्पीड़न या शोषण के आरोप लगे.
यह स्थिति तब है जब पिछले साल सोलह दिसंबर या कुछ समय पहले मुंबई शक्ति मिल में सामूहिक बलात्कार के मामले पर देश भर में गुस्से की लहर दौड़ पड़ी और यहां तक कि दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई. लेकिन इन बाबाओं के खिलाफ न केवल हालात की शिकार महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं, बल्कि कोई सामाजिक प्रतिरोध ठोस शक्ल अख्तियार कर पाता है.
बहरहाल, महिलाओं के चुप रह जाने की स्थितियां अलग होती हैं. यह उनकी कंडीशनिंग पर भी निर्भर हो सकती है. शायद दिल्ली में बैठी उन सशक्त पत्रकारों की तरह सामान्य महिलाओं को भी यह पता नहीं रहा होगा कि धर्म और आस्था के नाम पर साधु-संत उनके साथ जो कर रहे हैं, वह उनके खिलाफ किया गया अपराध ही है. एक पुख्ता कानून बन जाने के बाद भी हमारे देश में कितनी महिलाएं ऐसी हैं जो पति की मार-पिटाई को अपराध मानती हैं.
एक लड़की के पैदा होते ही उसे धार्मिक रूप से शिक्षित करना शुरू कर दिया जाता है. धीरे-धीरे यही धर्म के संदेश शिक्षा और कानून पर भारी पड़ने लगते हैं. घर में पिता-पति के खिलाफ कुछ नहीं बोलना और बाहर उन धर्मगुरुओं के खिलाफ नहीं बोलना, जिनकी शरण में वे भेजी जाती हैं. मानसिकता वही है कि एक शासक के रूप में पिता या पति आपके साथ जो भी करता है वह सही है तो उसी के अलग शक्ल के रूप में धर्मगुरु भी आपके साथ जो करेगा वह सही होगा. यही मानसिक कंडीशनिंग एक ऐसा भाव पैदा कर देती है कि जब धर्मगुरु, बाबा या तांत्रिक स्त्री का शारीरिक शोषण करता है तो वह उसे धर्म या खास तरह के उपचार का हिस्सा मानने लगती है.
एक बच्ची को आधुनिक स्कूल से हटा कर गुरुकुल में पढ़ने भेज दिया जाता है. आखिर इन गुरुकुलों में कौन अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए भेजता है? या तो अंधश्रद्धा या फिर गरीबी के कारण. छिंदवाड़ा वाला मामला अंधश्रद्धा का है. नहीं तो ज्यादातर गरीब घर के लोग ही अंधभक्ति से उपजे भरोसे के कारण ही अपने बच्चों को इन आश्रमों में भेजते हैं. यही वजह है कि उच्च-मध्यवर्ग को इस मामले में बापू के खिलाफ साजिश दिखाई देती है. गुरुकुल में पढ़ने वाली या आश्रम में रहने वाली बच्ची उन्हें अपनी नहीं लगती है, आसाराम उन्हें सवालों से ऊपर लगता है. तब भी, जब उसके खिलाफ आरोपों के सिलसिले हैं, बस उसे अदालतों में साबित होना था.
लेकिन वर्गीय वंचना के शिकार वर्गों की बच्चियों से कोई सहानुभूति नहीं दर्शाने वालों को क्या यह मालूम नहीं है कि आधुनिक कहे जाने वाले स्कूलों में उच्च मध्यवर्ग की बच्ची कितनी सुरक्षित है? ऐसे तमाम मामले हैं, जिनमें नामी-गिरामी स्कूलों में पढ़ने वाली बच्चियां यौन-शोषण से लेकर दूसरी तमाम तरह की प्रताड़नाओं की शिकार हुईं, लेकिन उसे या तो दबा दिया गया, या फिर उसे तूल नहीं दिया गया..........
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