Friday, 27 September 2013

महज देह है स्त्री ?

हमारे देश में बाबाओं का बढ़ता कारोबार और अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई कई तरह की कुंठाओं को जन्म दे रही है. धर्म और सेक्स का एक बाजार बन गया है, जहां कामनाएं हैं, और वंचना से उपजा हीनताबोध है. इसके बाद की विकृति से हम नफरत कर सकते हैं, लेकिन उसकी जड़ों पर गौर करना शायद ही कभी हमें जरूरी लगता है या शायद ध्यान भी नहीं जा पाता.

किसी भी अभिव्यक्ति के मूल में क्या छिपा है, अगर इस पर सोचना शुरू करें तो विश्लेषण आधारित एक स्थायी सामाजिक ढांचे की ओर बढ़ा जा सकता है. लेकिन यथास्थितिवाद से जिन्हें और जिनके समूचे वर्ग की सामाजिक-आर्थिक सत्ता बनी रहती है, वे इस बारे में क्यों सोचेंगे. किसी खास घटना पर सड़क पर उतरना और हल का एकमात्र उपाय फांसी पर लटकाने में ढूंढ़ना कई बार वर्गीय हितों से संचालित होता लगता है. दिल्ली और मुंबई की किसी संभ्रांत घर की महिला के बलात्कार की घटना पर हमें जितना दुख होता है, उससे ज्यादा होना चाहिए. लेकिन हरियाणा में जींद या दर्जनों जगहों पर दलित या गरीब तबके की महिलाओं के साथ जब इससे भी ज्यादा बर्बरता होती है, तो हमारी यह संवेदनशीलता क्यों नींद में चली जाती है?

कभी आसाराम कह देगा कि लड़कियों को बलात्कार से बचना है तो बलात्कारियों के सामने हाथ जोड़ लेना चाहिए, कभी कोई महिला मुख्यमंत्री कह देगी कि रात को एक बजे अकेली घर से क्यों निकलती हो, तो कोई महिला मुख्यमंत्री कहेगी कि यह बलात्कार बनावटी है, कभी कोई मंत्री कह देगा कि छोटे कपड़े क्यों पहनती हो...!!! ऐसे में अगर दिल्ली में सोलह दिसंबर सामूहिक बलात्कार के दोषियों का वकील कहता है कि अगर उसकी बेटी या बहन अकेले रात को किसी मर्द के साथ घूमेगी तो उसे पेट्रोल डाल कर जला दूंगा, तो वह दरअसल आसारामों, महिला मुख्यमंत्रियों के मूल में बैठी उसी कुंठित दुनिया के केंद्र पर अंगुली रखता है.

यह कोई मर्द और पितृसत्ता का प्रतिनिधि उदाहरण नहीं है, अगर स्त्री स्वतंत्र होने के लिए सोचेगी भी, थोड़ा-सा अपनी मर्जी से जीने के बारे में सोचेगी भी तो समूचा समाज ही उसे पेट्रोल डाल कर, तेजाब फेंक कर जला डालने के लिए तैयार खड़ा है. रोहतक में अपनी प्रेम करने वाली बेटी की हत्या कर और उसके प्रेमी को टुकड़े-टुकड़े में काट कर उस समाज ने जो किया है, क्या सबके भीतर कहीं न कहीं वही हत्यारा नहीं बैठा है?

दिल्ली या मुंबई के किसी शॉपिंग मॉल के बाहर एक लड़का चार आधुनिक लड़कियों के साथ घूम रहा है. वहीं पर एक प्रवासी मजदूर काम कर रहा होता है. वह अगर विवाहित भी है तो एक साल से अपने गांव नहीं जा पाया है. वह मजदूर अपनी शरीर की हड्डियों को मजबूत रखने के लिए रोज एक लीटर दूध नहीं खरीद सकता है. चार लड़कियों के साथ घूमने और किसी फाइव स्टार रेस्टोरेंट या होटल में जाकर मौज उड़ाने वाले उस लड़के की दुनिया के बारे में वह नहीं सोच सकता है, लेकिन अपने कई साथियों के साथ मिल कर वह महज दस रुपए खर्च कर अश्लील वीडियो जरूर देख सकता है, हनी सिंह के वीभत्स "बलात्कारी" गीत सुन सकता है. उसके सामने ये प्रत्यक्ष या प्रछन्न हालात उसके दिमाग को कहां ले जाकर छोड़ेंगे. क्या इस मूल पर सोचना हमें कभी जरूरी लगता है?

याद करें, मुंबई बलात्कार कांड का एक मुलजिम जब पुलिस के हत्थे चढ़ा, तो उस वक्त वह दो अश्लील फिल्में देख कर तीसरी देखने की तैयारी में था. सामूहिक बलात्कार को अंजाम देने के बाद पकड़े जाने के खौफ के बीच वह अश्लील फिल्म देख रहा था. इस तरह की फिल्मों में सेक्स का चित्रण किस तरह किया जाता है? एक हिंसक, विकृत और वीभत्स प्रदर्शन और स्त्री के शरीर को बर्बर तरीके से रौंदना पहले से ही कुंठित एक मर्द के दिमाग में कौन-सा जहर भरता है? और रोज-रोज ऐसे वीडियो देखने वाला, हनी सिंह टाइप अपराधियों के "बलात्कारी" गीत सुनने वाला व्यक्ति इसे फैंटेसाइज कर उसका मजा लेना चाहता है. उसके भीतर सिर्फ एक शासक और हिंसक मर्द होता है और स्त्री उसके लिए महज एक शरीर होती है. वर्ग का फर्क सुविधा और अपराध की अलग-अलग दुनिया की रचना करता है और अलग-अलग परिभाषाएं देता है.

संचार और इंटरनेट क्रांति ने दुनिया में बहुत से क्रांतिकारी काम तो किए, लेकिन इस पितृसत्तामक समाज ने इस सशक्त माध्यम को भी स्त्री के खिलाफ ही एक हथियार बना लिया है. प्राचीन धर्म हो या आधुनिक इंटरनेट, हर जगह ऐसी मानसिकता तैयार की जा रही है कि स्त्री का शरीर पुरुषों के लिए महज उपभोग की वस्तु है. क्या दुनिया भर की आधुनिकता हमारे यहां आकर कुंठित परंपरावाद का शिकार हो जाती है?

साभार-रविवार.कॉम

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